गुड्डी कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार
गांवों में जब किसी घर में बच्चे का जन्म होता है या कोई महिला गर्भवती होती है, तो सबसे पहले जिस सरकारी व्यवस्था का नाम सामने आता है, वह है आंगनबाड़ी केंद्र। यह केंद्र केवल ग्रामीण समाज के लिए पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य का पहला दरवाज़ा माना जाता है। वर्षों पहले जब समेकित बाल विकास सेवा योजना की शुरुआत हुई थी, तब इसका उद्देश्य स्पष्ट था गांव के छोटे बच्चों, गर्भवती और धात्री महिलाओं को कुपोषण से बचाना और उन्हें स्वस्थ जीवन की दिशा देना। आज बिहार में हजारों आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिनसे लाखों परिवार जुड़े हुए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन केंद्रों से मिलने वाली सुविधाएं हर गांव तक समान रूप से पहुंच पा रही हैं? वर्तमान समय में बिहार में लगभग 1,14,805 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिनमें से अकेले सीतामढ़ी जिले में करीब 3,783 केंद्र कार्यरत बताए जाते हैं। इनके माध्यम से बच्चों को पूरक पोषण, टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और गर्भवती महिलाओं को पोषण संबंधी सलाह जैसी सेवाएं प्रदान की जाती हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों में कुपोषण को कम करने, स्कूल छोड़ने की दर घटाने और माताओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाने जैसे कई महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। कई क्षेत्रों में इन प्रयासों का सकारात्मक असर भी देखने को मिला है। स्वास्थ्य विभाग और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, जहां आंगनबाड़ी सेवाएं नियमित रूप से मिल रही हैं, वहां बच्चों का वजन और ऊंचाई पहले की तुलना में बेहतर हुई है और गर्भवती महिलाओं में एनीमिया जैसी समस्याओं में भी कमी दर्ज की गई है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। राज्य के कई गांवों में लोग यह शिकायत करते हैं कि उन्हें आंगनबाड़ी से मिलने वाली सभी सुविधाएं समय पर नहीं मिलतीं। कुछ जगहों पर पोषण सामग्री का वितरण अनियमित है, तो कहीं बच्चों के लिए शिक्षा सामग्री या खेल सामग्री का अभाव देखा जाता है। यही स्थिति सीतामढ़ी जिले के रीगा ब्लॉक स्थित रामनगर गांव के वार्ड संख्या 11 और 12 में भी देखने को मिलती है। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्र से मिलने वाला पोषण समय पर नहीं मिलता, और कई बार महीनों तक राशन का वितरण रुक जाता है। जब ग्रामीण इस समस्या की शिकायत संबंधित अधिकारियों से करते हैं, तब भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। इससे लोगों का भरोसा इस व्यवस्था पर धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है। यह भी एक सच्चाई है कि सभी आंगनबाड़ी केंद्र एक जैसे नहीं हैं। कुछ केंद्र ऐसे हैं जहां बच्चों के लिए रंग-बिरंगे चार्ट, खिलौने, साफ-सुथरा वातावरण और नियमित भोजन की व्यवस्था होती है। इन केंद्रों में आने वाले बच्चे न केवल स्वस्थ दिखते हैं, बल्कि उनमें सीखने की उत्सुकता भी साफ नजर आती है। वहां की गर्भवती महिलाओं को समय-समय पर पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी दी जाती है, जिससे उनके और उनके बच्चों के स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है। ऐसे केंद्र इस बात का प्रमाण हैं कि यदि योजनाओं को सही ढंग से लागू किया जाए, तो बदलाव संभव है। दरअसल, पहले के समय में बच्चों का कुपोषण आम बात थी। कई बच्चे कमजोर पैदा होते थे और छोटी उम्र में ही बीमारियों का शिकार हो जाते थे। लेकिन आंगनबाड़ी केंद्रों की शुरुआत के बाद धीरे-धीरे स्थिति में सुधार देखने को मिला। अब कई गांवों में बच्चों का नियमित वजन मापा जाता है, टीकाकरण समय पर होता है और गर्भवती महिलाओं को आयरन और कैल्शियम की गोलियां भी दी जाती हैं। इन सुविधाओं ने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में काफी बेहतर किया है। फिर भी, यह सुधार हर गांव तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है। इसका एक बड़ा कारण निगरानी व्यवस्था की कमजोरी और संसाधनों का असमान वितरण माना जाता है। कई बार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर काम का बोझ इतना अधिक होता है कि वे सभी जिम्मेदारियों को समय पर पूरा नहीं कर पातीं। read more:https://pahaltoday.com/chief-minister-naidu-held-a-review-meeting-on-the-fuel-crisis-in-andhra-pradesh/दूसरी ओर, कुछ जगहों पर भ्रष्टाचार और लापरवाही भी इस व्यवस्था को कमजोर बना रही है। यदि पोषण सामग्री समय पर नहीं पहुंचेगी, तो बच्चों का विकास कैसे सुनिश्चित होगा? सीतामढ़ी के रामनगर गांव जैसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि योजनाओं का लाभ तभी प्रभावी हो सकता है, जब उनकी निगरानी मजबूत हो और शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई की जाए। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर पोषण सामग्री और अन्य सुविधाएं मिलें, तो उनके बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है। लेकिन जब बार-बार शिकायत करने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं होती, तो लोगों के मन में निराशा घर कर जाती है। यह भी जरूरी है कि सरकार के साथ-साथ समाज भी इस व्यवस्था को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभाए। यदि अभिभावक नियमित रूप से आंगनबाड़ी केंद्रों में जाएं, बच्चों को वहां भेजें और किसी भी समस्या की जानकारी समय पर दें, तो स्थिति में सुधार संभव है। इसके साथ ही, प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि हर केंद्र में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हों और किसी भी प्रकार की लापरवाही पर सख्त कार्रवाई की जाए।आज बिहार के गांवों में आंगनबाड़ी केंद्र एक उम्मीद की तरह खड़े हैं एक ऐसी उम्मीद, जो बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और माताओं के स्वस्थ जीवन से जुड़ी है। लेकिन यह उम्मीद तभी पूरी हो सकती है, जब हर केंद्र में सुविधाएं समान रूप से उपलब्ध हों और किसी भी गांव को इस अधिकार से वंचित न रहना पड़े। प्रश्न यह उठता है कि जब सरकार ने लाखों बच्चों और महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए इतनी बड़ी व्यवस्था बनाई है, तो फिर आज भी कुछ गांवों में बच्चे कुपोषण का शिकार क्यों हैं? क्यों कुछ माताओं को वह पोषण और देखभाल नहीं मिल पा रही, जो उनका अधिकार है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या हम सच में अपने भविष्य, यानी अपने बच्चों के स्वास्थ्य और विकास को लेकर इतने गंभीर हैं, जितना हमें होना चाहिए?