चीन और अमेरिका के बीच कोल्ड वॉर की शुरुआत हो चुकी है

स्नेहा सिंह -ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई वार्ता विफल रही है। हॉर्मुज की खाड़ी को लेकर ईरान ने शर्तों के साथ जहाजों को गुजरने देने की बात कही थी, लेकिन अमेरिका ने इन शर्तों को खारिज कर दिया। उसने अपने युद्धपोत इस क्षेत्र में भेज दिए हैं और खाड़ी को नियंत्रित करने तथा जहाजों की जांच करने की घोषणा कर दी है।अमेरिका की इस कार्रवाई से पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति भी गरमा गई है।अमेरिका के इस कदम का असर ईरान के साथ-साथ उसके सहयोगी देशों पर भी पड़ेगा, जिसमें सबसे ज्यादा प्रभाव चीन पर दिखाई दे रहा है। चीन ने अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब देने की चेतावनी दी है। यदि चीन के जहाज रोके जाते हैं, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।हालांकि फिलहाल चीन सीधे युद्ध में शामिल होता नहीं दिख रहा, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़कर कोल्ड वॉर जैसी स्थिति बनाता नजर आ रहा है।अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि केवल ईरान से जुड़े जहाजों की ही जांच की जाएगी। अन्य खाड़ी देशों के जहाजों को रास्ता दिया जाएगा। लेकिन इस निर्णय से समुद्री व्यापार बाधित हो रहा है और चीन-ईरान के बीच व्यापार पर व्यापक असर पड़ सकता है।महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है। इस व्यापार से ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी सहारा मिलता है। ईरान के कुल बजट का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा तेल व्यापार से आता है।चीन को ईरान से सस्ता तेल मिलता है, जिससे उसे प्रति बैरल लगभग 10 डालर का लाभ होता है। पिछले वर्ष चीन ने प्रतिदिन लगभग 14 लाख बैरल तेल खरीदा, जो उसकी कुल आयात का लगभग 12 प्रतिशत था।अमेरिका को यह बात खटक रही है कि चीन और ईरान दोनों इस व्यापार से लाभ उठा रहे हैं। उसका आरोप है कि चीन वास्तविक आंकड़े छुपा रहा है। 2025 में आधिकारिक व्यापार आंकड़े 9.96 अरब डालर बताए गए, लेकिन वास्तविक व्यापार इससे कहीं अधिक होने का दावा किया जा रहा है।read more:https://pahaltoday.com/consumers-booked-for-gas-refill-booking/ विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका के कदम से ईरान और चीन दोनों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा। यही कारण है कि चीन आक्रोशित है।दूसरी ओर अमेरिका का आरोप है कि चीन ईरान को ड्रोन और हथियारों के लिए तकनीक उपलब्ध करा रहा है। इसके अलावा शेल कंपनियों के माध्यम से भी सहयोग किया जा रहा है।अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी देश ईरान को सैन्य मदद देगा, उस पर 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा। यह संकेत चीन की ओर भी माना जा रहा है। चीन पर यह भी आरोप है कि वह ईरान से खरीदे गए तेल को अन्य देशों के नाम से दिखाकर प्रतिबंधों से बचता है। इसके लिए पुराने जहाजों और बदले हुए झंडों का उपयोग किया जाता है।विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल चीन सीधे युद्ध में नहीं उतरेगा, लेकिन अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए कूटनीतिक कदम जरूर उठाएगा। जरूरत पड़ने पर वह अमेरिका का मुकाबला भी कर सकता है।गौरतलब है कि कोरोना महामारी के समय से ही चीन और अमेरिका के बीच तनाव बना हुआ है। अमेरिका ने वायरस के प्रसार के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया था, जिससे दोनों देशों के संबंध बिगड़े।इसके अलावा चीन की आक्रामक व्यापार नीति, वैश्विक विस्तार और तकनीकी क्षेत्रों में बढ़ती पकड़ से भी अमेरिका चिंतित है।अमेरिका की कार्रवाई पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। चीन के रक्षा मंत्री डोंग जुन ने कहा कि हम शांति के पक्षधर हैं, लेकिन अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करेंगे। हॉर्मुज की खाड़ी हमारे लिए महत्वपूर्ण है और हम अपने समझौतों का सम्मान करते हैं। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने भी अमेरिका के आरोपों को बेबुनियाद बताया और कहा कि चीन जिम्मेदार तरीके से हथियार निर्यात करता है और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करता है।

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