महिला के शारीरिक और भावनात्मक दमन को दर्शाता नाटक ‘बेबी’ का मंचन

नई दिल्ली। राजधानी में प्रतिबिंब कला दर्पण की ओर से प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर के मूल मराठी नाटक ‘बेबी’ का हिन्दी रूपांतरण मंचित किया गया। इस नाटक का हिन्दी अनुवाद वसंत देव ने किया है, जबकि निर्देशन सौरभ त्रिपाठी ने संभाला। प्रस्तुति ने समाज के हाशिए पर खड़ी महिलाओं के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण को बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। नाटक ‘बेबी’ एक गहन यथार्थवादी कथा है, जो एक युवा लड़की के जीवन के माध्यम से समाज की कड़वी सच्चाइयों को उजागर करता है। कहानी की मुख्य पात्र बेबी एक स्वप्नदर्शी लड़की है, जो उपन्यासों की दुनिया से प्रभावित होकर एक खुशहाल जीवन का सपना देखती है। वह किताबों के पात्रों की तरह प्रेम, सम्मान और बेहतर जीवन की उम्मीद करती है, लेकिन उसकी वास्तविकता बेहद कठोर और दर्दनाक है।बेबी झुग्गी में रहने वाली एक युवती है, जिस पर झुग्गी का मालिक शिवप्पा पूरी तरह नियंत्रण रखता है। किराए के बदले वह उसे अपनी यौन दासी बनाकर रखता है। बेबी फिल्म उद्योग में एक एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में काम करती है, लेकिन उसकी मेहनत की कमाई पर भी शिवप्पा का अधिकार रहता है। वह न केवल उससे पैसे लेता है, बल्कि उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित भी करता है। बेबी को उसकी इच्छाओं के विरुद्ध शराब पिलानी पड़ती है और उसकी हिंसा सहनी पड़ती है। कहानी में मोड़ तब आता है जब शिवप्पा, बेबी के भाई राघव को चालाकी से मानसिक अस्पताल भिजवा देता है, ताकि वह बेबी का और अधिक शोषण कर सके। करीब डेढ़ साल बाद जब राघव वापस लौटता है, तो अपनी बहन की हालत देखकर टूट जाता है, लेकिन खुद को असहाय और कमजोर पाता है।इसी दौरान बेबी की मुलाकात कर्वे नाम के एक सहायक फिल्म निर्देशक से होती है, जो उसे फिल्मों में बड़ी अभिनेत्री बनाने का सपना दिखाता है। बेबी उसे अपना उद्धारकर्ता समझ बैठती है और उसकी बातों में आ जाती है। उसे लगता है कि अब वह शिवप्पा के चंगुल से मुक्त हो सकेगी। हालांकि, कर्वे की नीयत भी साफ नहीं होती और वह भी बेबी का शोषण करना चाहता है। नाटक का चरम उस समय आता है जब शिवप्पा, बेबी और कर्वे को साथ देख लेता है और बेबी पर अत्याचार करता है। इसके बावजूद बेबी खुद को ही दोषी मानती है और अपनी बदकिस्मती को स्वीकार कर लेती है। वह यह मान लेती है कि उसने समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया है और अपने भाई के साथ झोपड़ी छोड़ने का निर्णय लेती है।निर्देशक सौरभ त्रिपाठी ने नाटक के माध्यम से महिला शोषण, गरीबी और सामाजिक असमानता को बेहद सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया। शिवप्पा के किरदार में उनका अभिनय प्रभावशाली रहा। बेबी की भूमिका में अनुशिका शुक्ला ने संवेदनशील और जीवंत अभिनय किया। छोटी बेबी के रूप में तनिशी श्रीवास्तव, कर्वे के रूप में अर्जुन भारद्वाज और राघव के किरदार में कमल रेकस्वल ने भी सराहनीय प्रदर्शन किया।यह नाटक मानवीय संवेदनाओं, मजबूरी और शोषण की भयावहता को उजागर करते हुए दर्शकों को अंत तक झकझोर कर रख देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *