सब्सिडी वाला प्यार 

 डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा –कानपुर के उस कटीले और कुतूहलपूर्ण कूचे में, जहाँ काकादेव के कयासों और किदवई नगर की किंवदंतियों का संगम होता है, फेसबुक के फरेबी फलक पर एक ऐसा ‘मायावी मुसाफिर’ अवतरित हुआ जिसने सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने का साक्षात स्वांग रचा। इस ‘हवाबाज़ हुनरमंद’ ने पहले अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों की चाशनी से एक भोली-भाली कन्या के हृदय में सेंध लगाई। उसने बड़ी नफासत से कहा— “सुनो, मुझे ये सार्वजनिक जगहों की भीड़भाड़ और शोर-शराबा कतई पसंद नहीं, मैं तो तुम्हारे घर की गरिमापूर्ण दहलीज पर ही अपनी शराफत का सार्टिफिकेट देना चाहता हूँ।” यानी शिकार ने खुद ही शिकारी के लिए अपने घर का मुख्य द्वार खोल दिया और उसे ‘संस्कारी दामाद’ की श्रेणी में पहले ही रख दिया।दोपहर की उस दग्ध और तपती दुपहरी में, जब कानपुर के कर्मठ नागरिक कचौड़ी-रायता चापकर खर्राटों की खेती कर रहे थे, यह ‘पढ़ाई-लिखाई का ढोंगी’ अपनी साख और एक संदिग्ध बोरा संभालकर रंगमंच पर हाजिर हुआ। घर में घोर सन्नाटा था और मौका एकदम मनचाहा। उसने अपनी जुबान की जादूगरी से जो मायाजाल बुना, उसमें लड़की का विवेक ऐसा उलझा कि उसे सामने खड़ा ठग कोई ‘अवतारी पुरुष’ लगने लगा। तभी उस धूर्त ने अपनी जेब से वह ‘नशीली निलांजली’ यानी एक रहस्यमयी चॉकलेट निकाली। लड़की ने पूछा— “यह क्या है?” उस ‘सफेदपोश जालसाज’ ने गंभीरता से कहा— “यह बड़े शहरों का विशेष प्रसाद है, इसे चखते ही जीवन की सारी परेशानियाँ और तनाव गायब हो जाएंगे।” जैसे ही उसने उस ‘मीठे कुचक्र’ का रसास्वादन किया, उसकी पलकें पस्त होने लगीं और वह सोफे पर इस तरह ढेर हुई जैसे भारी भरकम टैक्स लगने के बाद मिडिल क्लास की उम्मीदें धड़ाम से गिरती हैं।अब हमारे इस ‘बहरूपिये बाजीगर’ ने अपनी असलियत का आईना दिखाया और सीधे अंदरूनी कमरों की ओर कूच किया। अमूमन ऐसे खूंखार अपराधी तिजोरियों के ताले तोड़ते हैं, पुश्तैनी गहनों की पोटली बांधते हैं या अलमारी में रखे नगद नारायण पर हाथ साफ करते हैं। पर इस विचित्र विलेन का विजन तो कुछ और ही था। उसने कीमती आभूषणों की चकाचौंध को ऐसे ठुकराया जैसे कोई डायटिंग करने वाला रसगुल्ले को दुत्कारता है। वह किसी गुप्त खजाने की तलाश में ऐसी जगह घुसा जहाँ अमूमन मेहमानों का प्रवेश वर्जित होता है। उसके चेहरे पर पसीना और आंखों में एक अजीब सी चमक थी, मानो वो दुनिया की सबसे बेशकीमती वस्तु को हासिल करने के करीब हो।उसने अपने झोले से कुछ औजार निकाले और किसी कुशल कारीगर की तरह बड़ी फुर्ती से अपने ‘मिशन’ को अंजाम देने लगा। उसके लिए उस क्षण उस घर की सबसे बड़ी ‘संपत्ति’ वही थी जिसे वह अपने कंधे पर लादने की तैयारी कर रहा था। वह रहस्यमयी लुटेरा जिस सरगर्मी से गलियों से ओझल हुआ, उसे देखकर यमराज भी अपनी भैंस की रफ्तार पर शर्मिंदा हो जाते। मोहल्ले वाले उसे भारी बोझ के साथ भागते देख कयास लगाते रहे कि शायद दहेज का सामान वापस जा रहा है या कोई भारी मशीन चोरी हुई है। सस्पेंस का गुब्बारा तब फूटा जब उस तंद्रा-ग्रस्त तरुणी की चेतना लौटी और उसने रसोई के उस सूने सिंहासन को देखा जहाँ उसकी सुबह की चाय का आधार विराजता था।पुलिस स्टेशन में जब रिपोर्ट दर्ज हुई, तो दरोगा ने चश्मा नाक पर टिकाते हुए मुंशी से कहा— “लिखो मुंशी, शहर में एक ऐसा आशिक आया है जो दिल की जगह चूल्हा ठंडा कर गया।” मुंशी ने तपाक से जवाब दिया— “हुजूर, ये कलयुग का नया मोड़ है, अब आशिक लैला के घर से खत नहीं, सीधा ‘सब्सिडी’ और ‘सप्लाई’ का संगम उड़ा ले जाते हैं।” दरोगा ने ठग की फाइल बंद करते हुए टिप्पणी की— “ये चोरी नहीं है मुंशी, ये बढ़ती महंगाई के खिलाफ एक ‘साइलेंट प्रोटेस्ट’ है। इसे ‘रसोई-क्रांति’ के तहत दर्ज करो।”पकड़े जाने पर जब उस ‘झोलाछाप ठग’ से पूछा गया कि उसने गहने क्यों नहीं छुए, तो उसने बड़े ही दार्शनिक लहजे में कहा— “साहब, जेवर तो सिर्फ़ प्रदर्शन की वस्तु हैं, असली ताकत तो उस लाल लोहे के संदूक में थी। सोना पहनकर कोई चाय नहीं बना सकता, पर वह साथ हो तो इंसान आत्मनिर्भर बन जाता है।” दरोगा ने अपना सिर पकड़ लिया और बोला— “बेटे, तूने भले ही इंजीनियरिंग न की हो, पर ‘गृहस्थी के गणित’ में गोल्ड मेडल हासिल कर लिया है।” मोहल्ले के बुज़ुर्गों ने भी इस पर अपनी राय दी कि अब लड़के को घर बुलाने से पहले उसकी डिग्री नहीं, बल्कि उसका ‘कनेक्शन’ चेक करना चाहिए।शहर के हर नुक्कड़ पर अब लोग अपनी रसोई के दरवाजों पर बड़े-बड़े ताले लटका रहे हैं। सबक साफ़ है—सोशल मीडिया पर ‘बड़ा आदमी’ देखकर पिघलने वाली कन्याओं, याद रखना कि तुम्हारी आँखों की चमक से ज्यादा उसे तुम्हारी रसोई के उस ‘रेगुलेटर’ की चमक में दिलचस्पी हो सकती है। कानपुर का वह ‘गैस-गैंगस्टर’ आज भी फरार है, शायद किसी दूसरी गली में ‘रिश्ते’ के बहाने अपना ‘रिफिल’ भरने का इंतजाम कर रहा हो। पूरी घटना का सार यही निकला कि आज के दौर में प्यार की आंच से ज्यादा उस ‘आंच’ की कीमत है जो पाइप के रास्ते आती है।मुंशी ने डायरी बंद करते हुए आखिरी सवाल किया— “साहब, इस जुर्म को किस कैटेगरी में डालें? प्यार में धोखा या कुछ और?” दरोगा ने खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा— “इसे डालो— ‘पेट्रोलियम रोमांस’ के तहत, जहाँ प्यार की मंजिल शादी नहीं, बल्कि वह 14 किलो का ‘लाल चमत्कार’ है जिसने चाय का पूरा स्वाद ही बदल दिया।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *