भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर दिल्ली के लाल किले में आयोजित होने वाली जनजातीय सांस्कृतिक समागम के संदर्भ में वनवासी कल्याण आश्रम, रायपुर केंद्र की अखिल भारतीय सह-महिला प्रमुख ललिता मुर्मू से विशेष बातचीत की पत्रकार डॉ. सुभाष गौतम एवं युवा पत्रकार हिमांशु nभगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर देशभर में जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा और अस्मिता को केंद्र में रखकर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में एक विशाल जनजातीय सांस्कृतिक समागम का आयोजन किया जा रहा है जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से लाखों वनवासी बंधुओं के शामिल होने की संभावना है। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि जनजातीय समाज के अस्तित्व, उनकी परंपराओं और उनके संघर्षों को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने का प्रयास माना जा रहा है। आज जब आधुनिकता और बाजारवाद के बीच आदिवासी समाज अपनी भाषा, संस्कृति, पूजा पद्धति और पारंपरिक जीवन मूल्यों को बचाने की चुनौती से जूझ रहा है, ऐसे समय में यह समागम एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बनकर उभर रहा है। इन्हीं विषयों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुभाष गौतम और युवा पत्रकार हिमांशु ने वनवासी कल्याण आश्रम की अखिल भारतीय सह महिला प्रमुख ललिता जी से विस्तार से बातचीत की। बातचीत के दौरान उन्होंने जनजातीय समाज की वर्तमान स्थिति, संस्कृति संरक्षण, स्वावलंबन, शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्मांतरण और घर वापसी जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी बात रखी।प्रश्न–भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर आयोजित इस विशाल जनजातीय सांस्कृतिक समागम का मुख्य उद्देश्य क्या है? उत्तर–भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जन्म जयंती वर्ष चल रही है और यह केवल एक स्मृति का अवसर नहीं बल्कि पूरे जनजातीय समाज के आत्मसम्मान और जागरण का पर्व है। हमें लगा कि इस अवसर पर ऐसा कार्यक्रम होना चाहिए जो केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहे बल्कि पूरे देश और विश्व तक भगवान बिरसा मुंडा जी का संदेश पहुंचाए। हमारा उद्देश्य यह है कि देशभर में रहने वाले जनजातीय भाई-बहन एक मंच पर आएं, एक-दूसरे को समझें, अपनी संस्कृति को साझा करें और यह अनुभव करें कि वे अकेले नहीं हैं। आज तक इतना बड़ा आयोजन नहीं हो पाया था इसलिए यह समागम हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस कार्यक्रम के माध्यम से हम यह संदेश देना चाहते हैं कि जनजातीय समाज केवल जंगलों और पहाड़ों में रहने वाला समाज नहीं है बल्कि उसकी अपनी समृद्ध संस्कृति, लोककला, संगीत, वेशभूषा, पूजा पद्धति और जीवन दर्शन है, जिसे बचाना पूरे देश की जिम्मेदारी है। प्रश्न–इस समागम में कितनी जनजातियों की भागीदारी रहने वाली है? महिलाओं की सहभागिता को आप किस तरह देखती हैं? उत्तर–देश में 700 से अधिक जनजातियां हैं। सभी का आ पाना संभव नहीं है लेकिन हमारा प्रयास है कि अधिक से अधिक समाज इसमें शामिल हों। विशेष रूप से उन क्षेत्रों तक पहुंचने का प्रयास किया गया है जहां अब तक बहुत कम संपर्क हो पाया था। जहां तक महिलाओं की बात है तो जनजातीय समाज में संस्कृति को बचाने और आगे बढ़ाने में बहनों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक रीति-रिवाज और परिवार की सांस्कृतिक संरचना को सबसे अधिक महिलाएं ही संभालती हैं। इसलिए इस समागम में बड़ी संख्या में जनजातीय बहनों की सहभागिता रहेगी। हम चाहते हैं कि यह आयोजन केवल पुरुषों का कार्यक्रम न होकर पूरे समाज का उत्सव बने जिसमें युवा, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी समान रूप से सहभागी हों। प्रश्न–किन राज्यों से सबसे अधिक लोग इस समागम में आने वाले हैं? उत्तर–सबसे अधिक संख्या छत्तीसगढ़ से आने की संभावना है क्योंकि वहां जनजातीय समाज की बड़ी आबादी है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड और पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में वनवासी बंधु आ रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत से भी अलग-अलग जनजातीय समुदायों की भागीदारी होगी। खासी और अन्य कई समाजों के लोग इसमें शामिल होंगे। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है क्योंकि अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले और अलग-अलग परंपराओं में रहने वाले लोग पहली बार इतने बड़े स्तर पर एक साथ मिलेंगे।read more:https://pahaltoday.com/serving-the-common-people-is-the-true-religion-viraj-sagar-das/प्रश्न–वनवासी कल्याण आश्रम जनजातीय क्षेत्रों में आजीविका और स्वावलंबन को लेकर किस प्रकार कार्य कर रहा है?उत्तर–हमारा सबसे बड़ा प्रयास यह है कि जनजातीय समाज आत्मनिर्भर बने और गांवों के लोग अपने ही क्षेत्र में सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। गांवों में स्वयं सहायता समूह बनाए जाते हैं और महिलाओं को अलग-अलग प्रकार के रोजगार से जोड़ा जाता है। सिलाई-कढ़ाई, बकरी पालन, मुर्गी पालन, सूअर पालन, गाय पालन जैसे कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है। जहां जो संसाधन आसानी से उपलब्ध हैं उसी आधार पर लोगों को रोजगार दिया जाता है। कहीं पत्तल बनाए जाते हैं, कहीं झाड़ू और चटाई बनाई जाती है, तो कहीं हाथ से कपड़ा बुनने का काम किया जाता है। हमारा उद्देश्य केवल रोजगार देना नहीं बल्कि लोगों में स्वाभिमान और आत्मविश्वास पैदा करना भी है। प्रश्न–स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में क्या प्रयास किए जा रहे हैं? उत्तर–दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों में सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य सुविधाओं की होती है क्योंकि वहां अस्पताल और डॉक्टर आसानी से उपलब्ध नहीं होते। इसलिए स्थानीय युवाओं को प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे गांव में छोटी-मोटी चिकित्सा सहायता दे सकें। समय-समय पर मेडिकल कैंप लगाए जाते हैं और शहरों के डॉक्टरों को गांवों तक ले जाकर लोगों का उपचार कराया जाता है। जिन लोगों की स्थिति गंभीर होती है उन्हें जिला केंद्र तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी हम बच्चों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। गांव के मेधावी बच्चों को शहरों में लाकर अच्छी शिक्षा दिलाई जाती है ताकि वे आगे चलकर अपने समाज के लिए काम कर सकें और अपने गांव के लोगों को जागरूक बना सकें। प्रश्न–पारंपरिक ‘गोटुल’ व्यवस्था आज किन क्षेत्रों में देखने को मिलती है?उत्तर–गोटुल परंपरा आज भी कुछ क्षेत्रों में जीवित है। कर्नाटक, बिहार के कुछ हिस्सों और छत्तीसगढ़ में यह व्यवस्था देखने को मिलती है। गोटुल केवल रहने की जगह नहीं थी बल्कि वह जनजातीय समाज का पारंपरिक ज्ञान केंद्र था जहां बच्चे खेती, जीवन शैली, सामाजिक व्यवहार, लोक परंपराएं और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति सीखते थे। वहां सामूहिक जीवन और अनुशासन की शिक्षा दी जाती थी और संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता था। प्रश्न–अलग-अलग जनजातीय भाषाओं और सरकारी योजनाओं के बीच संवाद की समस्या को लेकर क्या प्रयास हो रहे हैं?उत्तर–यह बहुत बड़ी चुनौती है क्योंकि कई क्षेत्रों में अलग-अलग बोलियां हैं और लोग एक-दूसरे की भाषा भी नहीं समझ पाते। ऐसे में सरकारी योजनाएं गांव तक पहुंच तो जाती हैं लेकिन लोग उन्हें ठीक से समझ नहीं पाते। इसीलिए स्थानीय बच्चों को शिक्षा देकर आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता है ताकि वही अपने समाज के बीच जाकर योजनाओं और अधिकारों की जानकारी दे सकें। गर्मियों में प्रशिक्षण शिविर भी लगाए जाते हैं जहां युवाओं को सामाजिक और शैक्षणिक विषयों पर प्रशिक्षित किया जाता है। प्रश्न–इस समागम को लेकर वनवासी समाज में किस तरह का उत्साह देखने को मिल रहा है? उत्तर–बहुत अधिक उत्साह है। कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने आज तक ट्रेन तक नहीं देखी लेकिन पहली बार दिल्ली आने वाले हैं। उनके लिए यह केवल यात्रा नहीं बल्कि अपने समाज को बड़े स्तर पर देखने और समझने का अवसर है।read more:https://pahaltoday.com/shastrarth-foundation-organised-a-feast-at-hotel-majestic/सबसे बड़ी बात यह है कि वे अपनी संस्कृति को बचाने के लिए बहुत गंभीर हैं। वे चाहते हैं कि उनका पहनावा, लोकनृत्य, संगीत, वाद्य यंत्र और पूजा पद्धति सुरक्षित रहे। उनका मानना है कि अगर संस्कृति बची रहेगी तभी उनकी पहचान भी बची रहेगी। इसलिए इस समागम को लेकर उनमें गर्व और उत्साह दोनों दिखाई देता है। प्रश्न–जनजातीय समाज में धर्मांतरण की समस्या को आप किस रूप में देखती हैं? उत्तर–धर्मांतरण की समस्या आज की नहीं है बल्कि भगवान बिरसा मुंडा जी के समय से ही यह संघर्ष चलता आ रहा है। गांवों में जाकर ही पता चलता है कि कहां क्या हो रहा है। जब लोग अपनी पारंपरिक पूजा-पद्धति से दूर होने लगते हैं तब समाज को धीरे-धीरे इसका एहसास होता है। कई बार लोग बीमारी, शिक्षा या आर्थिक लालच के कारण धर्मांतरण की ओर चले जाते हैं। भगवान बिरसा मुंडा जी भी लोगों से कहते थे कि अपने स्वधर्म और परंपराओं को बचाकर रखें। आज भी वही संघर्ष जारी है। हम लोगों को समझाने का प्रयास करते हैं कि अपनी जड़ों और पूर्वजों से जुड़े रहना कितना आवश्यक है। प्रश्न–क्या घर वापसी की घटनाएं भी सामने आती हैं? उत्तर–हां, कई लोग बाद में यह महसूस करते हैं कि धर्म बदलने के बाद भी जीवन की कठिनाइयां वैसी ही रहती हैं और वे अपने समाज से कट जाते हैं। तब वे वापस अपने समाज में लौटना चाहते हैं। गांव के लोग और समाज के प्रमुख ऐसे लोगों को दोबारा स्वीकार भी करते हैं। हमारा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी परंपराओं और समाज में वापस लौटना चाहता है तो उसके लिए रास्ता खुला रहना चाहिए। प्रश्न–क्या यह समागम जनजातीय समाज के लिए कोई नया रास्ता खोल सकता है? उत्तर–बिल्कुल।अभी तक बहुत से लोग अलग-अलग जगहों पर बिखरे हुए थे और कई बातें भूल चुके थे। लेकिन जब इतने बड़े स्तर पर लोग एक साथ आएंगे तो उन्हें एहसास होगा कि वे अकेले नहीं हैं। इससे समाज में आत्मविश्वास बढ़ेगा और लोग अपनी संस्कृति को दोबारा मजबूती से अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। जो बातें लोग भूल चुके हैं उन्हें फिर से याद करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलेगा। यही इस समागम की सबसे बड़ी सफलता होगी।