हमारे देश में ऋतुएँ अब केवल प्रकृति नहीं तय करतीं। समाज भी अपनी सुविधानुसार ऋतुएँ बना लेता है। कभी चुनाव की ऋतु आती है, कभी उद्घाटन की, कभी शिलान्यास की और इन सबसे ऊपर सम्मान की ऋतु। यह ऐसी ऋतु है जिसमें पेड़ों पर पत्तियाँ कम और लोगों के गले में मालाएँ अधिक दिखाई देती हैं।एक समय था जब सम्मान किसी व्यक्ति के पीछे भागता था। अब व्यक्ति सम्मान के पीछे भागता है। पहले लोग अपने काम में इतने डूबे रहते थे कि उन्हें पता ही नहीं चलता था कि समाज उन्हें कब पहचानने लगा। आज लोग पहले अपनी पहचान छपवाते हैं, फिर उसके अनुरूप कोई काम खोजते हैं।सम्मान समारोहों का अपना अलग ही दर्शन है। मंच पर बैठे लोग इतने गंभीर दिखाई देते हैं जैसे अभी देश की अर्थव्यवस्था पर निर्णय लेने वाले हों। किंतु पाँच मिनट बाद वही लोग यह तय करने में व्यस्त हो जाते हैं कि पहले किसे शॉल ओढ़ाई जाए और किसे श्रीफल दिया जाए। राष्ट्र की दिशा कुछ देर के लिए शॉल की तहों में छिप जाती है।मुझे एक सज्जन मिले। चेहरे पर संतोष ऐसा था जैसे उन्होंने हिमालय की सबसे ऊँची चोटी जीत ली हो। बोले, इस महीने मेरा सातवाँ सम्मान हुआ है। मैंने उत्सुक होकर पूछा, किस उपलब्धि के लिए। वे मुस्कुराए और बोले, उपलब्धि बाद में बताऊँगा, पहले फोटो देखिए। मैंने समझ लिया कि अब उपलब्धि तस्वीर में रहती है और परिश्रम एल्बम के बाहर खड़ा रह जाता है।आज सम्मान का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र सोशल मीडिया है। समारोह समाप्त होने से पहले ही तस्वीरें उड़कर दुनिया भर में पहुँच जाती हैं। नीचे लिखा रहता है, अत्यंत विनम्रता के साथ सम्मान ग्रहण किया। मुझे हमेशा यह वाक्य पढ़कर आश्चर्य होता है। विनम्रता जितनी अधिक लिखी जाती है, उतनी ही कम दिखाई देती है। सच्ची विनम्रता को कभी घोषणा की आवश्यकता नहीं पड़ती।समाज ने एक नया गणित खोज लिया है। आदमी की योग्यता उसके विचारों से नहीं, उसके सम्मान पत्रों की संख्या से मापी जाती है। दीवार पर जितने अधिक फ्रेम, उतना बड़ा विद्वान। किसी ने यह नहीं पूछा कि उन फ्रेमों के भीतर विचार भी हैं या केवल रंगीन कागज।कुछ संस्थाएँ तो सम्मान बाँटने में ऐसी दक्ष हो गई हैं कि लगता है मानो उनके पास सम्मान की खेती हो। हर सप्ताह नई फसल तैयार हो जाती है।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/ पुरस्कारों की ऐसी वर्षा होती है कि बादलों को भी ईर्ष्या होने लगे। फर्क केवल इतना है कि बादल खेतों को सींचते हैं और ये सम्मान कई बार अहंकार को।सबसे अधिक दया उन लोगों पर आती है जो सचमुच काम कर रहे हैं। विद्यालय में चुपचाप पढ़ाने वाला शिक्षक, रात भर अस्पताल में सेवा करने वाली नर्स, सड़क पर धूप में खड़ा सफाईकर्मी, खेत में पसीना बहाता किसान। इनके हिस्से में सम्मान कम और जिम्मेदारियाँ अधिक आती हैं। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे हर मंच पर समय से पहले पहुँच जाते हैं।अब तो परिचय भी अद्भुत हो गया है। नाम से पहले इतने विशेषण लगा दिए जाते हैं कि नाम तक पहुँचते पहुँचते श्रोता थक जाता है। विश्वविख्यात, अंतरराष्ट्रीय, बहुआयामी, युगद्रष्टा, चिंतक, समाजसेवी, शिक्षाविद, साहित्य मनीषी। मुझे लगता है यदि विशेषणों पर कर लग जाए तो देश का बजट घाटे से बाहर आ जाए।समारोहों में एक और अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। मंच पर बैठे सभी लोग एक दूसरे का सम्मान करते हैं। आज आपने मुझे सम्मानित किया, कल मैं आपको कर दूँगा। परसों तीसरे सज्जन हम दोनों को कर देंगे। सम्मान का यह चक्र इतना पवित्र है कि इसमें काम का प्रवेश वर्जित है। काम कहीं बाहर खड़ा सोचता रहता है कि शायद अगली बार मेरी भी बारी आएगी।कभी कभी मुझे लगता है कि भविष्य का इतिहासकार जब हमारे समय का अध्ययन करेगा तो लिखेगा कि यह वह युग था जिसमें लोग अपने परिचय से अधिक अपने अभिनंदन पत्रों का भार उठाते थे। समाज बदलने की गति धीमी थी, लेकिन स्मृति चिह्न बनाने की गति अद्भुत थी। विचारों पर बहस कम होती थी, मालाओं की लंबाई पर अधिक।सम्मान बुरा नहीं है। सम्मान तो समाज की कृतज्ञता का सबसे सुंदर रूप है। लेकिन जब सम्मान कर्म का परिणाम न रहकर प्रचार का साधन बन जाए, तब वह सम्मान नहीं, सजावट बन जाता है। सजावट आँखों को कुछ देर के लिए आकर्षित कर सकती है, इतिहास को नहीं।जिस दिन समाज फिर से काम को मंच से बड़ा मानेगा, उस दिन सम्मान अपने आप पवित्र हो जाएगा। तब किसी को अपने परिचय में सम्मानों की सूची नहीं पढ़नी पड़ेगी। उसका काम ही उसका परिचय होगा। और शायद वही दिन होगा जब सम्मान फिर से सम्मान कहलाएगा, आयोजन नहीं।