अरुणाचल प्रदेश भारत का वह सुदूर पूर्वी मुकुट है, जिसकी भौगोलिक स्थिति और सामरिक महत्व हमेशा से देश की सुरक्षा नीति के केंद्र में रहे हैं। हाल ही में सोशल मीडिया और कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक हलकों से उठी चीनी सेना की ‘धीमी घुसपैठ’ की खबरों ने एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श को गरमा दिया है। एक ऐसे दौर में जब सीमा पर दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण शांति बनी हुई है, घुसपैठ की ऐसी खबरें न केवल रणनीतिक रूप से संवेदनशील हैं, बल्कि आंतरिक मोर्चे पर भी असमंजस पैदा करती हैं। हालांकि, इस बार सरकार और भारतीय सेना ने न केवल इन दावों को पूरी तरह से निराधार और अफवाह करार दिया, बल्कि असाधारण सक्रियता दिखाते हुए स्थिति को तुरंत स्पष्ट किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में नई दिल्ली में हुई उच्च स्तरीय बैठक इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि केंद्र सरकार सीमा सुरक्षा और उससे जुड़ी सूचनाओं के प्रति कितनी सजग और एक्शन मोड में है। अख़बारों और मुख्यधारा के विमर्श के लिए यह केवल एक तात्कालिक घटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का गंभीर विश्लेषण करने का अवसर है कि आधुनिक दौर में सीमा सुरक्षा केवल अग्रिम चौकियों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सूचना युद्ध और मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर भी लड़ी जा रही है।सोशल मीडिया पर वायरल हुई खबरों की जड़ें ‘पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल’ की एक तथाकथित फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में खोजी जा सकती हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ऊपरी सुबनसिरी जिले के तक्सिंग सेक्टर में चीनी सैनिकों ने भारतीय चरवाहों और शिकारियों के पारंपरिक रास्तों पर कब्जा कर लिया है। इस दावे को हवा तब मिली जब सोशल मीडिया पर कुछ धुंधले और असत्यापित वीडियो प्रसारित होने लगे, जिनमें चीनी बुनियादी ढांचे और सैनिकों की उपस्थिति का दावा किया गया था। इस प्रकार की सूचनाएं जैसे ही सार्वजनिक पटल पर आईं, वैसे ही भारतीय सेना के शीर्ष कमान और देश के नीति-नियंताओं ने मोर्चा संभाल लिया। सेना ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि सीमा पर भारत ने अपनी एक इंच जमीन भी नहीं खोई है। ऊपरी सुबनसिरी के दुर्गम इलाकों में स्थित सभी अग्रिम चौकियां पूरी तरह से भारतीय बलों के नियंत्रण में हैं। सेना ने स्पष्ट किया कि जिसे ‘घुसपैठ’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वह असल में चीन द्वारा अपनी सीमा के भीतर किया जा रहा बुनियादी ढांचा विकास हो सकता है, जिसे जानबूझकर भारतीय क्षेत्र के भीतर दिखाकर सनसनी फैलाने का प्रयास किया गया। सरकार का यह त्वरित और पारदर्शी रुख सराहनीय है, क्योंकि अक्सर सीमावर्ती मुद्दों पर आधिकारिक सूचनाओं में देरी अफवाहों को खाद-पानी देने का काम करती है।इस विवाद की पृष्ठभूमि को समझने के लिए भारत और चीन के बीच हालिया कूटनीतिक और भौगोलिक घटनाक्रमों पर नजर डालना जरूरी है। भारत सरकार ने पिछले दिनों एक बड़ा कदम उठाते हुए आधिकारिक मानचित्रों पर अरुणाचल प्रदेश की 27 प्रमुख जगहों के नाम पूरी तरह से भारतीय पहचान के अनुरूप दर्ज किए थे। यह कदम चीन के उस पुराने पैंतरे का सीधा जवाब था, जिसके तहत वह अरुणाचल के विभिन्न स्थानों का बार-बार ‘पुनः नामकरण’ कर उन्हें अपनी संप्रभुता का हिस्सा बताने की कोशिश करता रहा है। भारत के इस संप्रभु अधिकार और कड़े रुख से बीजिंग निश्चित रूप से असहज हुआ था। विदेश मंत्रालय ने इस मोर्चे पर हमेशा की तरह यह दोहराया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा; चीन की किसी भी कृत्रिम नामावली या काल्पनिक दावों से यह ऐतिहासिक और जमीनी हकीकत नहीं बदलने वाली है। इसलिए, जब भारत ने कूटनीतिक स्तर पर अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली हो, तब देश के भीतर से ही सीमा सुरक्षा पर इस तरह के असत्यापित और कमज़ोर दावे उठना पूरी रक्षा रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि सरकार ने इसे केवल स्थानीय स्तर का मामला नहीं माना, बल्कि देश की राजधानी में संसद भवन परिसर में रक्षा और विदेश मंत्रियों की आपात बैठक बुलाकर साफ संदेश दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर सरकार की चौबीसों घंटे पैनी नजर है।आज की दुनिया में सीमा की रक्षा केवल बंदूकों और मिसाइलों से नहीं होती, बल्कि यह हाइब्रिड वॉरफेयर के युग में प्रवेश कर चुकी है। चीन इस रणनीति का पुराना खिलाड़ी है, जहां वह बिना एक भी गोली चलाए, भ्रामक सूचनाओं और मनोवैज्ञानिक दबाव के जरिए अपने विरोधी को रक्षात्मक मुद्रा में लाने की कोशिश करता है।read more:https://pahaltoday.com/mobile-court-visits-ballia-to-hear-grievances-of-persons-with-disabilities-state-commissioner-issues-strict-directives/अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील क्षेत्र में चरवाहों के रास्तों को रोके जाने या धीमी घुसपैठ की अफवाहें इसी सूचना युद्ध का हिस्सा हो सकती हैं। सीमा पर रहने वाले नागरिकों और देश के आम मानस में डर और अविश्वास पैदा करना इस तरह की अफवाहों का मुख्य उद्देश्य होता है। भारतीय सेना ने इस खतरे को भांपते हुए नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी सोशल मीडिया नैरेटिव का शिकार न हों। सीमा पर तैनात भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और थल सेना के जवान न केवल आधुनिकतम हथियारों से लैस हैं, बल्कि वे निगरानी के लिए उपग्रहों, ड्रोनों और अत्याधुनिक रडार प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में यह लगभग असंभव है कि कोई बड़ी या छोटी घुसपैठ हो और वह भारतीय रक्षा तंत्र की नजरों से बच जाए। सरकार का एक्शन इस बात का संकेत है कि वह इस सूचना युद्ध में बैकफुट पर रहने के बजाय आक्रामक तरीके से सच को सामने रखने के लिए प्रतिबद्ध है।इस पूरे घटनाक्रम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को लेकर भारत की नीति में पिछले एक दशक में क्रांतिकारी बदलाव आया है। अतीत की सरकारें अक्सर इस रक्षात्मक सोच के साथ काम करती थीं कि यदि सीमा के करीब बेहतर सड़कें और बुनियादी ढांचा बनाया गया, तो युद्ध की स्थिति में चीनी सेना उसका लाभ उठाकर भारतीय क्षेत्र में तेजी से प्रवेश कर सकती है। मौजूदा सरकार ने इस पुरानी और पराजयवादी नीति को पूरी तरह से पलट दिया है। ‘वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम’के तहत अरुणाचल प्रदेश सहित पूरे वास्तविक नियंत्रण रेखा के सीमावर्ती गांवों का कायाकल्प किया जा रहा है। सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है, रणनीतिक सुरंगे बनाई जा रही हैं और दूरदराज के इलाकों तक बिजली तथा इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचाई जा रही है। सीमावर्ती क्षेत्रों का यह विकास केवल सेना के आवागमन को सुगम नहीं बनाता, बल्कि स्थानीय आबादी के पलायन को भी रोकता है। सीमा पर रहने वाले नागरिक हमारे ‘प्रथम रक्षक’ हैं। जब उनके पास बेहतर जीवन स्तर और सुरक्षा होगी, तो वे किसी भी विदेशी पैंतरेबाज़ी का पहला और सबसे मजबूत प्रतिरोध बनेंगे। सरकार की इस चौतरफा विकास नीति ने चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीति पर लगाम लगाने का काम किया है, जिससे बौखलाकर वह अक्सर सीमा पर तनाव पैदा करने या अफवाहों को हवा देने की कोशिश करता है।गौरतलब है कि इस घटना से मीडिया, राजनीतिक दलों और आम नागरिकों के लिए कुछ गहरे सबक मिलते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसे दलीय राजनीति और चुनावी लाभ-हानि से ऊपर रखा जाना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल या क्षेत्रीय संगठन को बिना किसी ठोस और आधिकारिक प्रमाण के संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ के दावे करने से बचना चाहिए। ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान न केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को कमजोर करते हैं, बल्कि शून्य से नीचे के तापमान में देश की रक्षा कर रहे जवानों के मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे ‘सनसनी’ और ‘क्लिकबेट’ की दौड़ से बाहर निकलकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी खबरों का कड़ा फैक्ट-चेक करें। सरकार ने इस मामले में जिस तरह से तत्परता दिखाई, वह भविष्य के लिए एक मानक तय करती है। गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बीच का यह समन्वय ही भारत को एक मजबूत वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है। अरुणाचल प्रदेश में शांति और सुरक्षा पूरी तरह से कायम है, और सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि नए भारत की सीमाओं की सुरक्षा अभेद्य है और किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार को पनपने की अनुमति नहीं दी जाएगी।