परिसीमन को लेकर साउथ में हो रहा विरोध, सरकार को मिला चंद्रबाबू का सहारा

नई दिल्ली। महिला आरक्षण को लेकर गुरुवार को संसद का तीन दिनों का सेशन शुरू हुआ।इस सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया ताकि इसे 2029 के आम चुनाव में लागू किया जा सके। आरक्षण को लेकर किसी भी दल ने आपत्ति नहीं जताई, लेकिन साउथ के दलों ने परिसीमन का सवाल उठाए। इसके अलावा कांग्रेस भी यही तर्क देते हुए खिलाफ जाने की बात कर रही है कि परिसीमन में सरकार मनमानी करना चाहती है। वहीं सरकार को आंध्र प्रदेश से बड़ा सहारा मिला है। यहां के सीएम चंद्रबाबू नायडू ने 100 फीसदी साथ देने की बात कही है। उनकी पार्टी टीडीपी सत्ताधारी एनडीए गठबंधन का हिस्सा भी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि हर राज्य में लोकसभा एवं विधानसभा की सीटों को दोगुना कर दिया जाएगा। सीट और आबादी का कोई तालमेल नहीं रहेगा। अब जो फॉर्मूला केंद्र सरकार ने तय किया है, वह पूरी तरह सही है और सभी के हित में है। नायडू का यह बयान है क्योंकि वह खुद भी साउथ की आबादी नॉर्थ के राज्यों के मुकाबले कम होने को लेकर चिंता जताते रहे हैं। ऐसी स्थिति में उनकी सीटों की संख्या कम नहीं होनी चाहिए। उनका कहना था कि किसी भी सीट पर आबादी का अनुपात वाली व्यवस्था ठीक नहीं है।read more:https://pahaltoday.com/the-person-who-complained-about-the-kidney-issue-is-now-being-investigated-for-cyber-fraud/  इसलिए जनगणना के साथ परिसीमन को जोड़ने की जरूरत नहीं है। नायडू ने कहा कि विपक्ष कह रहा है कि मौजूदा जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन होना चाहिए। मेरा कहना है कि इसकी जरूरत ही क्या है। परिसीमन को जनगणना से जोड़ना ही नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ किया तो फिर दक्षिण भारत के राज्यों का अनुपात कम होगा और उन्हें आबादी नियंत्रित करने की सजा मिलेगी। उन्होंने ऐसे आरोपों को खारिज कर दिया कि केंद्र सरकार परिसीमन का इस्तेमाल करके साउथ के राज्यों का शेयर घटाना चाहती है। इस बीच तमिलनाडु में राजनीति तेज हो गई है। सीएम स्टालिन ने तो विधेयक को काला कानून ही बता दिया। उनकी पार्टी डीएमके पूरे राज्यों में प्रदर्शन कर रही है। स्टालिन ने आरोप लगाया कि परिसीमन का काला कानून तमिल लोगों को उनकी ही धरती पर शरणार्थी बना देगा। इसी तरह ओडिशा के पूर्व सीएम नवीन पटनायक ने भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि ओडिशा की सीटें जरूर बढ़ेंगी, लेकिन दूसरे राज्यों के मुकाबले ये कम होंगी। सीधा अर्थ है कि ओडिशा का अनुपात कम हो जाएगा।

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