सहारनपुर। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के लोकार्पण अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सहारनपुर दौरा इस बार पारंपरिक जनसभा से अलग पूरी तरह रणनीतिक अंदाज में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा ऐसी बनाई गई, जिसमें मंचीय भाषण की बजाय तय कार्यक्रमों और जनसंपर्क गतिविधियों पर अधिक जोर दिया गया। राजनीतिक जानकार इसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों राज्यों को साधने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का यह दौरा कई मायनों में विशेष माना जा रहा है। गणेशपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मंच पर नहीं आए, बल्कि हेलीपैड से सीधे डाट काली मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे देहरादून के लिए रवाना हो गए। देहरादून में आयोजित उनकी जनसभा का सीधा प्रसारण सहारनपुर के गणेशपुर में बड़ी एलईडी स्क्रीन के माध्यम से दिखाया गया। इस दौरान मंच की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभाली।प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में एक्सप्रेसवे लोकार्पण, मंदिर दर्शन और सीमित रोड शो को प्रमुखता दी गई। गणेशपुर से कुछ दूरी तक खुली गाड़ी में यात्रा और रास्ते में पुष्प वर्षा के माध्यम से जनता से सीधे जुड़ाव का संदेश दिया गया। हालांकि सहारनपुर में मंच से संबोधन न होना इस दौरे की सबसे खास बात रही, जिसे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति माना जा रहा है।read more:https://pahaltoday.com/shrimad-bhagwat-katha-started-with-kalash-yatra/ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कार्यक्रम के जरिए एक साथ दो राज्यों को संदेश देने का प्रयास किया गया। सहारनपुर में आयोजन के माध्यम से उत्तर प्रदेश को साधने के साथ-साथ देहरादून में जनसभा के जरिए उत्तराखंड के मतदाताओं तक पहुंच बनाई गई। देहरादून की जनसभा का सीधा प्रसारण सहारनपुर में दिखाना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सक्रिय भूमिका को क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल है और राज्य नेतृत्व भी जनता के बीच प्रभावी भूमिका निभा रहा है।गौरतलब है कि इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान सहारनपुर आए थे और दिल्ली रोड पर आयोजित जनसभा को संबोधित किया था। इस बार का दौरा उससे बिल्कुल अलग रहा, जिसमें पारंपरिक रैली के बजाय रणनीतिक कार्यक्रमों के जरिए जनसंपर्क और राजनीतिक संदेश देने पर जोर दिया गया।कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा नजर आया, जिसके माध्यम से विकास, आस्था और जनसंपर्क के जरिए दोनों राज्यों में मजबूत संदेश देने का प्रयास किया गया।