राष्ट्रपति का चयन सर्वसम्मति से होना राष्ट्रहित में जरूरी।

 राष्ट्रपति का चयन सर्वसम्मति से होना राष्ट्रहित में जरूरी।

डॉ. भरत मिश्र प्राची
देश के सर्वोपरि पद प्रथम नागरिक वर्तमान राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है। इस पद पर नये व्यक्ति के चयन हेतु राजनैतिक दलों के बीच सरगर्मियां तेज हो चली है। देश का यह गैर राजनीतिक सर्वोपरि पद राष्ट्रहित एवं जनहित की दृष्टि में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। जिसकी निष्पक्ष भूमिका देश को संकटकालीन स्थिति से बाहर निकालते हुए अस्मिता एवं गौरव की रक्षा में सहायक पृष्ठभूमि निभाती है। इस पद पर आसीन व्यक्ति से देश को काफी आशाएं होती हैं। लोकतंत्र में भटके नेतृत्व को दिशा निर्देश एवं संकटकाल की स्थिति में महत्वपूर्ण निर्णय की पृष्ठभूमि इस पद की सार्थकता को दर्शाती है। परन्तु तत्कालीन बदलते राजनीतिक परिदृश्य में इस महत्वपूर्ण पद की गरिमा दिन पर दिन धूमिल एवं उपेक्षनीय पृष्ठभूमि से जुड़ती चली जा रही है। जहां स्वहित में उभरते टकराव एवं तनावमय स्थिति इस गरिमापूर्ण पद को भी संदेह के कटघरे में खड़ा कर बदनाम कर डालते हैं। ऐसे हालात में देश का सर्वोपरि यह पद प्रथम नागरिक होने का गौरव भी खो देता है। इस पद पर इस तरह के व्यकित को आसीन होना चाहिए जो निष्पक्ष भाव से सर्व एवं राष्ट्रहित में महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सके।
जब-जब भी राष्ट्रपति चुनाव की यहां सरगर्मियां तेज हुई है देश के समस्त राजनीतिक दल सक्रिय हो उठते हैं। इस पद पर अपने मन मुताबिक व्यक्ति को बैठाने की प्रक्रिया में प्राय देश के सभी प्रमुख दल सक्रिय हो जाते हैं। सत्ता पक्ष की भूमिका तो इस प्रक्रिया में सबसे तेज गति से देखी जा सकती है। आपातकालीन परिस्थितियों में इस पद पर बैठे व्यक्ति से सत्ताधारी को देश के अपेक्षा स्वहित में सबसे ज्यादा सहयोग की अपेक्षाएं रहती है और जब उनकी यह मुराद पूरी होती नहीं दिखाई देती, वहीं से टकराव की प्रवृति शुरू हो जाती है। इस तरह के हालात पूर्व में कई बार उभर चुके हैं जहां इस पद पर बैठे व्यक्ति से सत्ता पक्ष की अपेक्षाएं पूरी नहीं होने की स्थिति में तनावमय वातावरण को जन्म मिला है। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह का कार्यकाल विवादास्पद रहा है, उससे पूरा देश भलीभांति परिचित है। एक चर्चित विधेयक को पारित करने के संदर्भ में तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से सत्ता पक्ष की होते होते टकराव की स्थिति को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है जहां राष्ट्रपति ने तत्कालीन विधेयक को पुर्नविचार हेतु दो बार संसद को वापिस कर दिया था। इस तरह के परिवेश में राष्ट्रपति ने स्वविवेक का प्रयोग कर बौद्धिकता का परिचय देने का प्रयास तो अवश्य किया परन्तु आंतरिक दबाव एवं बढ़ते टकरावपूर्ण हालात ने राष्ट्रपति को नीतिगत रूप से कमजोर बना दिया। भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति को स्वतंत्र नहीं रखे जाने की प्रवृत्ति शुरू से ही यहां पनाह लेती रही है। जिसके कारण इस पद पर चुने जाने वाले व्यक्ति के चयन स्वरूप में राजनीतिक दलों की स्वार्थमय पृष्ठभूमि सर्वोपरि देखी जा सकती
राष्ट्रपति देश का सर्वोपरि पद होता है जिसके साथ किसी भी तरह की राजनीतिक चाल राष्ट्रहित में कदापि नहीं हो सकती। हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जहां राष्ट्रपति का चुनाव सीधे तौर पर जनता द्वारा न होकर जनता के चुने जनप्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। इस तरह की प्रक्रिया में यहां राजनीति ऐनकेन प्रकारेण हावी हो ही जाती है जिससे यह पद सर्वोपरि होते हुए भी पराधीन सा लगता है। राष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पक्ष की भूमिका सदैव से हावी रही है। जिस दल का बहुमत होता है वह अपने पसंद का राष्ट्रपति चुनता रहा है। देश में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव में अभी से सभी राजनैतिक दल अपने अपने पसंद का राष्ट्रपति चुनने की प्रक्रिया में सक्रिय हो चले है। इसके लिये मंथन एवं सहयोगी की तलाश भी शुरू हो गई है। इस तरह के परिवेश में स्वहित राष्ट्रहित से सर्वोपरि साफ - साफ झलकता है। ऐसा परिवेश कहीं से नजर नहीं आता कि इस महत्त्वपूर्ण पद पर होने वाले चुनाव में देश के सभी राजनीतिक दल सर्वसम्मति एकजूट होकर एक ऐसे व्यक्ति का चयन करें जो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर निर्विवाद राष्ट्रहित में सोचे, विचारे व पहल करे। पर ऐसा भारतीय लोकतंत्र के परिवेश में कतई संभव नहीं दिखता जहां राष्ट्रपति का चयन स्वहित में संकटमोचक के रूप में किया जाता रहा हों। इसी कारण विगत कुछ कालों से यह पद पूर्णरूपेण राजनीतिक परिवेश से जुड़ा दिखाई देने लगा है। चुनाव उपरान्त किसी एक दल को बहुमत न मिलने की स्थिति में राष्ट्रपति की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे समय में बहुमत के करीब आया दल राष्ट्रपति से अपने पक्ष में सहयोग पाने की भरपूर कोशिश करता है, संकट के दौरान राष्ट्रपति से सहयोग की अपेक्षाएं रखता है, इस तरह के हालात राष्ट्रपति के निष्पक्ष भूमिका में बाधा बनते है।
आज देश आतंकवाद से वाह्य एवं भीतरी तौर पर सर्वाधिक रुप से ग्रसित है। पड़ोसी राष्ट्र पाक एवं चीन का रवैया ठीक नहीं है। जम्मू - कश्मीर सहित देश के भीतर अपने ही लोगों से अशान्त वातावरण बना हुआ है। इस तरह के हालात में राष्ट्रपति पद पर बैठे व्यक्ति की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। वैसे राष्ट्रपति देश का सर्वोपरि पद होता है इसलिये जरूरी है कि इस पद के लिये जो भी नाम तय हो निर्विवाद एवं सर्वसम्मति से गैर राजनीतिक, कानूनविद्, शिक्षाविद्, प्रवीण, साहित्य, कला विज्ञान का मर्मज्ञ विद्वान वर्ग से हो । इस दिशा में सभी राजनीतिक दलों को राष्ट्रहित में सोचना चाहिए एवं एकमत होकर राष्ट्रपति का चयन करना चाहिए।

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