लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तिरुवनंतपुरम, केरलम में आयोजित दो दिवसीय Conference of Chairpersons of Public Accounts Committees of Parliament of India and State/UT Legislatures के उद्घाटन समारोह को संबोधित किया। मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि सांस्कृतिक वैभव और प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध केरलम की इस पावन धरती पर, जिसकी लोकतांत्रिक परंपराएं सदैव गौरवशाली रही हैं, संसद एवं विभिन्न राज्य विधानमंडलों की लोक लेखा समितियों (PACs) के सभापति और सदस्य एकत्रित होकर “Audit, Accountability and Good Governance – The Evolving Role of the PAC” जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं।भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में *Public Accounts Committee (लोक लेखा समिति)* का स्थान अत्यंत विशिष्ट और ऐतिहासिक रहा है। स्वतंत्रता से पूर्व स्थापित इस समिति ने आजादी के बाद भी संसदीय लोकतंत्र की एक सशक्त और विशिष्ट परंपरा को आगे बढ़ाया है। विपक्ष के वरिष्ठ सदस्य को समिति का सभापति बनाए जाने की परंपरा इस बात का प्रमाण है कि सार्वजनिक धन की निगरानी किसी राजनीतिक पक्ष का विषय नहीं, बल्कि समूचे लोकतंत्र की साझा जिम्मेदारी है। यह परंपरा संसदीय निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त करती है।संसद और राज्य विधानमंडल कानूनों के निर्माण के साथ-साथ जनहित में बजट पारित करते हैं। इसी बजट के माध्यम से जनता का धन आधारभूत संरचना के विकास, सामाजिक कल्याण योजनाओं और जनहित के विविध कार्यों के लिए आवंटित किया जाता है। इस सार्वजनिक धन का निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप, पारदर्शी और विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने में लोक लेखा समिति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।मेरा दृढ़ विश्वास है कि सामाजिक कल्याण की योजनाओं की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितना बजट आवंटित हुआ अथवा कितनी धनराशि खर्च की गई। वास्तविक कसौटी यह है कि उस व्यय से समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया, योजनाओं का लाभ लक्षित वर्गों तक किस सीमा तक पहुंचा और जनकल्याण के उद्देश्यों की कितनी सार्थक पूर्ति हुई। अतः लोक लेखा समिति का दायित्व केवल वित्तीय व्यय की जांच तक सीमित न रहकर उसके परिणामों और सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन करना भी है।read more:https://pahaltoday.com/sdm-holds-public-meeting-in-bambhiva-all-three-cases-resolved-on-the-spot/इस महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करते हुए लोक लेखा समिति दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर संसदीय निष्पक्षता और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना के साथ कार्य करती है। यहां सभी राजनीतिक दलों का उद्देश्य एक ही होता है—शासन व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करना, कार्यपालिका की पारदर्शिता को सुदृढ़ करना और यह सुनिश्चित करना कि जनता की गाढ़ी कमाई का प्रत्येक रुपया जनहित में सार्थक परिणाम दे।बदलते समय और उभरती चुनौतियों के संदर्भ में मैंने देश के विभिन्न राज्यों से पधारे लोक लेखा समितियों के सभापतियों एवं सदस्यों से आग्रह किया कि वे समिति के कार्यों को अधिक प्रभावी, आधुनिक और परिणामोन्मुख बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग करें। *Data Analysis और Artificial Intelligence* जैसे आधुनिक साधनों के माध्यम से विशाल वित्तीय आंकड़ों का गहन विश्लेषण, सार्वजनिक व्यय के रुझानों की पहचान, संभावित जोखिमों का पूर्वानुमान तथा वित्तीय अनियमितताओं की समय रहते पहचान और रोकथाम अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है।हालांकि, तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय संवेदनशीलता, नैतिक उत्तरदायित्व और संस्थागत जवाबदेही का समन्वय भी उतना ही आवश्यक है। हमारा उद्देश्य केवल सरकारी धन के व्यय की निगरानी करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि प्रत्येक योजना और प्रत्येक सार्वजनिक निवेश समाज के व्यापक कल्याण तथा आम नागरिकों के जीवन में सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन का माध्यम बने।मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस दो दिवसीय सम्मेलन में संसद और राज्य विधानमंडलों की लोक लेखा समितियां अपने अनुभवों, विचारों और कार्यप्रणालियों को साझा करेंगी तथा एक-दूसरे की श्रेष्ठ कार्यपद्धतियों (Best Practices) से सीखने का सार्थक अवसर प्राप्त करेंगी। इस विचार-मंथन से निकले उपयोगी सुझाव और सामूहिक संकल्प हमारी लोक लेखा समितियों को और अधिक सशक्त, सक्षम तथा परिणामोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।*आइए, हम सब मिलकर संसदीय जवाबदेही की इस गौरवशाली परंपरा को और अधिक सुदृढ़ करें, ताकि सार्वजनिक धन का प्रत्येक व्यय पारदर्शिता, सुशासन और जनकल्याण के उद्देश्यों को समर्पित हो तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास निरंतर और गहरा होता रहे।*