March 3, 2024
Jyotishapeeth Badarikaashram's description of Shankaracharya Shri Avimukteshwaranand ji as misleading and false - Shri Bharat Dharma Mahamandal Kashi

Jyotishapeeth Badarikaashram's description of Shankaracharya Shri Avimukteshwaranand ji as misleading and false - Shri Bharat Dharma Mahamandal Kashi

ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम का शंकराचार्य श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी को बताया जाना भ्रामक व असत्य- श्री भारत धर्म महामंडल काशी
सोनभद्र। ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य का पद पूर्णत: रिक्त है और श्री अविमुक्तेश्वरानन्द जी को शंकराचार्य बताया जाना भ्रामक और असत्य है। यह बातें प्रोफेसर श्रद्धानंद जी अध्यक्ष, आल इंडिया कौंसिल श्री भारत धर्म महामंडल काशी एवं जनरल सेक्रेटरी प्रोफेसर शंभू उपाध्याय, आल इंडिया कौंसिल श्री भारत धर्म महामंडल काशी ने प्रेस को जारी संयुक्त बयान में कहा है। उन्होँने कहा है कि, भारत के सभी धर्माचार्यों, हिंदू समाज के द्वारा स्वीकृत सनातन धर्मियों की अखिल भारतीय विराट धर्म सभा “श्री भारत धर्म महामंडल” की स्थापना जगतगुरु स्वामी श्री ज्ञानानंद जी के सानिध्य में सन 1901 में हुई थी। ज्योतिषपीठ बदरिकाश्रम पीठ लगभग 168 वर्षों से लुप्त थी। वर्ष 1936 में तत्कालीन तीन पीठों के शंकराचार्यों के अनुरोध पर स्वामी ज्ञानानंद जी द्वारा इस पीठ के पुनरोद्धार हेतु एक शिष्ठ मंडल का गठन किया गया। शिष्ठ मंडल के अथक प्रयास, भगवान आदि शंकराचार्य के ग्रंथों में वर्णित चिन्हों के आधार पर ज्योतिष्पिठ बदरिका आश्रम के स्थान का पता लगा लिया गया और शिष्ठ मंडल द्वारा प्रदत जानकारी के आधार पर श्री भारतधर्म महामंडल के संस्थापक अनंत विभूषित पूज्यपाद महर्षि ज्ञानानंद जी द्वारा टिहरी (गढ़वाल) के डी.एम.जिलाध्यक्ष सर ‘जेम्स क्ले’ के सहयोग से उक्त भूमि काश्तकारों से क्रय कर ली गई तथा जो भूमि पूर्व में ज्योर्तिमठ के नाम से सरकारी कागजों में दर्ज थी उसे भी सर जेम्स क्ले के माध्यम से प्राप्त किया। इस कार्य के होने के बाद स्वामी श्री ज्ञानानंद जी ने श्री भारतधर्म महामंडल के तत्वावधान में तीन शंकराचार्यों, महाराजाओं एवं विभिन्न विद्वानों के सहयोग से तत्कालीन परम विद्वान मनीषी, तपस्वी एवं योगी श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती महाराज को आध्य शंकराचार्य के महाम्नाय और महानुशासन में उल्लिखित सिद्धांतों और लक्षणों से युक्त पाकर सर्वसम्मति से ज्योर्तिमठ के जगतगुरु शंकराचार्य की गद्दी पर सन 1941(14-05-1941) में अभिषिक्त कर दिया गया। श्री ज्ञानानंद जी महाराज ने जो भूमि भारत धर्म महामंडल महामंडल के धन से खरीदी थी तथा जो स्थान सर जेम्स क्ले से प्राप्त हुआ था, उनका उल्लेख करते हुए 1941 में ही एक न्यास पत्र/नियमावली बनाकर ज्योर्तिमठ के पक्ष में रजिस्टर कर दिया। स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का गोलोकगमन 1953 में हुआ एवं उनके पंजीकृत वसीयत के अनुसार स्वामी शान्तानंद सरस्वती का अभिषेक 12-6-1953 में ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य के रूप में हुआ। स्वामी शान्तानंद जी ने अपने जीवन काल में ही ज्योर्तिमठ ज्योतिषपीठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य के रूप में अपने शिष्य श्री विष्णुदेवानंद सरस्वती को सन 1980 में अभिषिक्त किया। इस प्रकार ब्रह्मानंद जी सरस्वती जी 14 -5 -1941 से 12- 6-1953 तक, सतानंद सरस्वती 12 -6 -1953 से 1980 तक, विष्णु देवानंद सरस्वती 1980 से 15-11-1989 तक एवं स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती 15 -11- 1989 से अद्यावधि पीठ के परंपरागत शंकराचार्य रहे हैं। शंकराचार्य पद पर नियुक्ति हेतु लगभग 150 प्रस्ताव पूर्ण भारतवर्ष से प्राप्त हुए थे, इन प्रस्ताव में श्री स्वरूपानंद सरस्वती एवं श्री वासुदेवानंद सरस्वती जी का नाम भी प्रस्तावित था। लेकिन इसी बीच स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज ने माननीय उच्चतम न्यायालय में अपील दायर कर दी। इस कारण उच्च न्यायालय, इलाहाबाद के आदेश का क्रियान्वयन भी भारतधर्म महामंडल नहीं कर सका। शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद जी का गोलोकगमन हो गया तथा माननीय उच्चतम न्यायालय में बदरिकाश्रम के शंकराचार्य की याचिका पर सुनवाई चल रही है। इस प्रकरण में अभी तक कोई निर्णय नहीं आया है। प्रोफेसर श्रद्धानंद जी एवं प्रोफेसर शंभू उपाध्याय जी ने संयुक्त रूप से कहा है कि, ज्योतिषपीठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य पद पर नियुक्ति का मामला माननीय सुप्रीम कोर्ट में निर्णय के अधीन है। अत: श्री भारतधर्म महामंडल आशा करता है कि, जब तक माननीय सुप्रीम कोर्ट का कोई निर्णय नहीं हो जाता तब तक भ्रामक संप्रेषण और प्रचार से हमें बचना चाहिए। इस अवसर पर श्री श्रीभाल शास्त्री ज्वाइंट जनरल सेक्रेटरी, श्री राजेश राय रेजिडेंट सेक्रेटरी, डिपार्टमेंटल सेक्रेटरी राजीव रमन राय, श्री अवध नारायण राय सहायक मंत्री, श्री भारत धर्म महामंडल के विधिक सलाहकार एडवोकेट श्री अशोक सिंह, श्री राकेश पाठक आदि लोग उपस्थित रहे।

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