डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
नारियल विकास बोर्ड के संभागीय कार्यालय के बाहर नीम के चबूतरे पर पचहत्तर साल के मणिकंदन बाबा हर बुधवार सुबह ठीक दस बजे अपनी लाठी टेकते हुए आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में सूखे नारियल की जटाओं का एक भूरा लच्छा और रस्सी बटने वाली लकड़ी की एक पुरानी घिसी हुई चरखी हमेशा रहती थी जिसे वे अपनी मैली धोती के पल्ले से बार-बार पोंछते रहते थे। आज दो सितंबर को विश्व नारियल दिवस के भव्य महोत्सव के मौके पर जब सुरक्षा गार्ड ने उन्हें गेट पर देखा तो अपनी चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए ठहाका लगाकर बोला कि “बाबा जब आज पूरे प्रदेश में कल्पवृक्ष उत्सव का डंका बज रहा है और बड़े-बड़े वैज्ञानिक नारियल से बने आधुनिक उत्पादों की प्रदर्शनी लगा रहे हैं तो इस सूखे छिलके और जटा को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ बड़े अफ़सरों के आगे क्या तमाशा खड़ा करते हो।” मणिकंदन बाबा अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को ठीक करते और बहुत धीमी आवाज़ में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह सूखा रेशा केवल पेड़ की छाल नहीं है बल्कि इस पूरे कृषि महकमे की वो कागज़ी समृद्धि है जिसने मेरी पुश्तैनी बगिया को कागज़ों की स्याही में उजाड़ कर रख दिया है।” आसपास खड़े तमाम मुंशी और दलाल उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में बाबा की मति मारी गई है जो नारियल दिवस के पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चले आए हैं।” मणिकंदन बाबा किसी की बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस रेशे को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप वीआईपी गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।बोर्ड के सभी बाबू और तकनीकी सलाहकार मणिकंदन बाबा की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह परिचित हो चुके थे और उन्हें एक सनकी बुज़ुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी अनुदान की नई चेकबुक लेकर निदेशक के केबिन की तरफ बढ़ता तो मणिकंदन बाबा बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस कीट प्रकोप वाले बागान पुनर्वास और राहत वाले कागज़ पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फ़ाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक सेटेलाइट सर्वे से तुम्हारी बागिया के पेड़ों की ड्रोन मैपिंग नहीं होगी और ऊपर से डिजिटल रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक विभाग से फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी और तुम इस सूखे रेशे को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” मणिकंदन बाबा बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस चरखी पर उस रेशे को लपेटने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे जो हर बार टूटकर ज़मीन पर बिखर जाता था। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते थे कि शायद बाबा अपने किसी पुराने बकाए के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन किसी को भी उस सूखे रेशे और विश्व नारियल दिवस के इस भव्य आयोजन के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।read more:https://pahaltoday.com/sdm-holds-public-meeting-in-bambhiva-all-three-cases-resolved-on-the-spot/दोपहर में अचानक कृषि एवं बागवानी मंत्रालय के मुख्य सलाहकार महोदय विश्व नारियल दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित राज्य स्तरीय तकनीकी सेमिनार का उद्घाटन करने पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए होर्डिंग और हरे ताज़ा नारियलों से सजी हुई भव्य टोकरियां सजाई जाने लगीं ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और किसानों की आय दोगुनी करने के दावों पर लंबा भाषण देने के बाद जब मुख्य सलाहकार महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र चबूतरे पर शांत बैठे मणिकंदन बाबा पर पड़ी जिनकी गोद में वही नारियल की जटा रखी थी। अपनी संवेदनशील और जनप्रिय छवि का प्रदर्शन करने के लिए सलाहकार महोदय तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर मणिकंदन बाबा के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज विश्व नारियल दिवस पर हम धरती के कल्पवृक्ष को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको बोर्ड की पुनरुद्धार योजना का लाभ नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” मणिकंदन बाबा ने अपनी पथराई आँखों से सलाहकार महोदय को देखा और अपने कांपते हाथों से वह सूखा रेशा आगे बढ़ाते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस रेशे में लिपटी इस मुड़ी हुई सरकारी पर्ची का सच पहचान लीजिए।”सलाहकार महोदय ने जब उस रेशे के भीतर से निकली पुरानी लाल पर्ची को देखा तो उनके चेहरे की हवाइयां उड़ गईं क्योंकि उस पर दर्ज था कि बागान पूरी तरह हरा-भरा है और पचास लाख का वैज्ञानिक अनुदान वितरित किया जा चुका है। मणिकंदन बाबा की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस सूखे रेशे पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब तीन साल पहले जब सफेद मक्खी और अज्ञात बीमारी ने मेरे सौ नारियल के हरे-भरे पेड़ों को सुखाकर ठूंठ बना दिया था तो मैंने अपनी पूरी पूंजी लगाकर आपके दफ़्तर में गुहार लगाई थी। लेकिन आपके बाबुओं ने कागज़ों में मेरे उजड़े हुए बागान को मॉडल फार्म दिखाकर मेरे नाम का पचास लाख रुपये का पूरा सरकारी अनुदान फर्जी खातों में बांट लिया और मुझे भगा दिया। मेरी बागिया आज श्मशान जैसी सूखी खड़ी है और मेरे घर में चूल्हा जलाने के लिए सूखी लकड़ियां तक नहीं बची हैं। मेरा इकलौता बेटा अपनी पुश्तैनी ज़मीन छोड़कर आज बड़े शहर में नाले साफ़ करने की दिहाड़ी मज़दूरी कर रहा है। मैं रोज़ यह सूखा रेशा यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपके इस मंच को बता सकूँ कि जिस कल्पवृक्ष को तुम जीवन का अमृत कहते हो उसी की सूखी छाल ने एक गरीब किसान की तीन पीढ़ियों के सपनों का गला घोंट दिया है।” यह सुनते ही सलाहकार महोदय का सिर शर्म से झुक गया और पूरा नारियल बोर्ड परिसर गहरे सन्नाटे में डूब गया।