पारदर्शिता और राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता; अवांछित, अवैध या गुप्त विदेशी वित्तपोषण पर रोक लगाना किसी भी संप्रभु राष्ट्र का बुनियादी अधिकार और कर्तव्य है।तथापि, इस व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए केवल संख्या घटाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय फंड के ‘एंड-यूज’ (अंतिम उपयोग) और उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव की आधुनिक डेटा एनालिटिक्स के जरिए सूक्ष्म निगरानी आवश्यक है।इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर वास्तविक काम करने वाले ईमानदार संगठनों के लिए घरेलू दान को प्रोत्साहित करना होगा, ताकि भारतीय नागरिक समाज विदेशी पूंजी की निर्भरता से मुक्त होकर आत्मनिर्भर और पारदर्शी बन सके।भारत में गैर-रकारी संगठनों (NGOs) और विदेशी अंशदान का रिश्ता हमेशा से नीतिगत और सुरक्षा विमर्श के केंद्र में रहा है। पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ (FCRA) के अंतर्गत नियमों को कड़ा करते हुए हजारों गैर-सरकारी संगठनों के लाइसेंस रद्द या निलंबित किए। इस विनियामक कार्रवाई का प्राथमिक उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना, वित्तीय पारदर्शिता लाना और विदेशी पूंजी के दुरुपयोग को रोकना था।इन सख्त कदमों के बाद एफसीआरए पंजीकृत संगठनों की कुल संख्या में भारी गिरावट आई।स्वाभाविक अनुमान यह था कि विदेशी धन के प्रवाह में भी कमी आएगी, लेकिन आंकड़ों का विरोधाभास कुछ और ही कहानी बयां करता है—सक्रिय एनजीओ की संख्या घटने के बावजूद भारत में आने वाले विदेशी चंदे की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह विरोधाभास नीति-निर्माताओं और समाजशास्त्रियों दोनों के लिए गहरे विश्लेषण का विषय है।सरकार द्वारा FCRA कानून में 2020 और उसके बाद किए गए संशोधनों ने विदेशी चंदे की निगरानी को बेहद सख्त कर दिया।विदेशी चंदा केवल नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की मुख्य शाखा के निर्दिष्ट खाते में ही प्राप्त किया जा सकता है। कोई भी एनजीओ प्राप्त विदेशी धन को किसी अन्य संस्था या छोटे एनजीओ को स्थानांतरित नहीं कर सकता।विदेशी फंड का प्रशासनिक खर्चों पर उपयोग की सीमा 50% से घटाकर 20% कर दी गई।पदाधिकारियों के आधार सत्यापन, कड़ी ऑडिटिंग और वार्षिक रिटर्न न भरने या नियमों के उल्लंघन पर सीधे लाइसेंस निरस्तीकरण की व्यवस्था की गई।इन नियमों के चलते पारदर्शिता न बरतने वाले, निष्क्रिय पड़े और संदेहास्पद गतिविधियों में लिप्त पाए गए हजारों एनजीओ के एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो गए।
संख्या घटी, तो विदेशी चंदा क्यों बढ़ा?
सब-ग्रांटिंग बंद होने का सीधा असर यह हुआ कि विदेशी दानदाताओं (फाउंडेशन्स, बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट्स और वैश्विक संस्थाओं) ने छोटे-टे सैकड़ों एनजीओ में फंड बांटने के बजाय सीधे उन बड़े और स्थापित एनजीओ को भारी धनराशि देना शुरू किया, जो सभी विनियामक मानकों और ऑडिट प्रक्रियाओं को पूरा करने में सक्षम हैं। इससे फंड का प्रवाह कम हाथों में सिमटा, लेकिन उसका कुल आकार बढ़ गया।जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, प्राथमिक स्वास्थ्य और बालिका शिक्षा जैसे क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर परोपकारी निवेश (Global Philanthropy) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।भारत जैसी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था इन वैश्विक प्राथमिकताओं के केंद्र में है, जिसके चलते बड़े अंतरराष्ट्रीय ट्रस्ट भारत के प्रमाणित संगठनों को बड़े बजट आवंटित कर रहे हैं।अमेरिकी डॉलर, यूरो या पाउंड में आता है।पिछले वर्षों में भारतीय रुपये के मूल्य में हुए स्वाभाविक अवमूल्यन के कारण जब यह विदेशी मुद्रा रुपये में परिवर्तित होती है, तो कुल प्राप्त राशि के आंकड़ों में स्वतः ही वृद्धि दिखाई देती है। जब भारी विदेशी पूंजी कुछ चुनिंदा बड़े संगठनों के पास केंद्रित होती है, तो यह आशंका बलवती हो जाती है कि कहीं देश की जमीनी प्राथमिकताओं के बजाय विदेशी फंडिंग एजेंसियों का अपना एजेंडा (चाहे वह नीतिगत हस्तक्षेप हो या सामाजिक-राजनीतिक डिस्कोर्स) हावी न होने लगे।