नगर पालिका के रोशनी विभाग का गलियारा उस पवित्र तीर्थ की तरह था जहाँ फाइलें मोक्ष की प्रतीक्षा में सदियों तक तपस्या करती थीं। पचहत्तर साल के सुखदेव बाबा हर शाम पाँच बजे वहां इस तरह विराजमान हो जाते थे जैसे किसी भ्रष्ट व्यवस्था की नींव में गड़ा हुआ कोई पुराना काँटा हों। उनके कांपते हाथों में माटी का एक बुझा हुआ दीया होता था जिसकी रुई की बाती पूरी तरह काली पड़ चुकी थी और जो विभाग की कार्यक्षमता का जीवित विज्ञापन मालूम पड़ता था। दफ़्तर का चपरासी जब भी उन्हें वहाँ देखता तो अपनी सरकारी मुस्कान बिखेरते हुए कहता कि बाबा जब शहर भर में एलईडी लाइटें जगमगा रही हैं तो इस मिट्टी के कुलहड़ को अपनी धोती में छिपाकर अफ़सरों के भ्रष्टाचार के रास्ते में क्यों लेट जाते हो। चपरासी की बातों में वह मिठास थी जो केवल उन लोगों में होती है जिन्हें मुफ्त की चाय पीने की आदत लग चुकी हो। सुखदेव बाबा अपनी पुरानी ऐनक के धुंधले शीशे को संभालते और बहुत शांत स्वर में उत्तर देते कि बेटा यह माटी का दीया केवल मिट्टी का बर्तन नहीं है बल्कि इस रोशनी विभाग की उस अंधी संवेदनहीनता का असली चेहरा है जिसने मेरे घर की दीवाली को विभाग की फाइलों की तरह अंधेरे के गर्त में धकेल दिया है।आसपास खड़े सफाईकर्मी और ठेकेदार उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहते कि लगता है इस बूढ़े का दिमाग उम्र के साथ उस फाइल की तरह सठिया गया है जिस पर चूहे दावत कर चुके हों। वे हंसते थे क्योंकि विभाग में संवेदना का अकाल था और हंसी ही एकमात्र ऐसी चीज थी जिस पर अभी तक टैक्स नहीं लगा था। सुखदेव बाबा किसी की कड़वी बात का बुरा माने बिना उस काली बाती को अपनी उंगलियों से सहलाते और चुपचाप उन फ़ाइलों का इंतज़ार करते रहते जो सरकारी कछुए की गति से रेंग रही थीं। विभाग में फाइलों की गति प्रकाश की गति से ठीक विपरीत चलती थी। रोशनी विभाग के सभी कर्मठ कर्मचारी सुखदेव बाबा के इस अनूठे नियम से वाकिफ़ हो चुके थे और उन्हें एक ऐसा हठी बुजुर्ग मानकर अनदेखा कर देते थे जो व्यवस्था के चिकने घड़े पर पानी की एक बूंद की तरह था।दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी फ़ाइलों का पुलिंदा लेकर केबिन की तरफ बढ़ता तो सुखदेव बाबा बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और कहते कि बाबू जी क्या आज उस मुआवजे वाले कागज़ पर साहब की मुहर की कृपा हो गई। बाबू गुस्से में चश्मा उतारकर इस तरह डांटता जैसे बाबा ने उसकी निजी संपत्ति का नक्शा मांग लिया हो। वह कहता कि अरे बाबा जब तक विजिलेंस की जांच रिपोर्ट में ईमानदारी का तड़का नहीं लगेगा और खंभे की रिपोर्ट पोर्टल पर बलि नहीं चढ़ेगी तब तक एक पैसा नहीं मिलेगा। सरकारी पोर्टल वह जादुई गुफा थी जहाँ गरीब की अर्जी जाते ही गायब हो जाती थी। सुखदेव बाबा बिना कोई प्रतिवाद किए वापस अपनी जगह पर बैठ जाते और उस दीये की कालिख को अपनी धोती से पोंछने का वह निरर्थक प्रयास करते जो अक्सर विपक्ष संसद में करता है।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/ मोहल्ले के लोग भी चर्चा करते कि शायद बाबा मुफ्तखोरी की लत के कारण बिजली बिल माफ़ कराने का यह नाटक रच रहे हैं क्योंकि इस देश में ईमानदारी को अक्सर अभिनय ही समझा जाता है।एक दिन अचानक ज़िले के नए जिलाधिकारी महोदय अपनी सत्ता की चमक बिखेरने और स्ट्रीट लाइट व्यवस्था का जायज़ा लेने पहुँच गए। साहब की गाड़ी आते ही अफ़सरों में वैसी ही अफ़रा-तफ़री मच गई जैसी किसी घोटाले की खबर सुनकर मंत्रियों में मचती है। आनन-फानन में गलियारे को इस तरह साफ किया गया जैसे भ्रष्टाचार को फाइलों के नीचे दबाया जाता है। निरीक्षण के बाद जब जिलाधिकारी महोदय पत्रकारों के कैमरों की रोशनी में बाहर निकले तो उनकी नज़र कंक्रीट के फर्श पर बैठे सुखदेव बाबा पर पड़ी। अपनी संवेदनशील छवि को अखबार की सुर्खियों में सजाने के लिए साहब तुरंत बाबा के पास पहुँचे और दुलार से बोले कि बाबा आप इस उम्र में यह माटी का दीया लिए यहाँ क्यों बैठे हैं क्या आपको सरकारी योजनाओं का अमृत चखने को नहीं मिल रहा है। सुखदेव बाबा ने अपनी सूजी हुई आँखों से साहब की तरफ देखा और वह बुझा हुआ दीया उनकी तरफ ऐसे बढ़ाया जैसे कोई अपना अपराधी हृदय दिखा रहा हो।बाबा बोले कि साहब जी अगर न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस दीये पर लगी सरकारी मुहर और इसकी काली बाती का वह सच जान लीजिए जो आपकी फाइलों में कहीं दफन हो गया है। साहब ने जब उस माटी के दीये को ध्यान से देखा तो उस पर नगर पालिका के स्टोर की वह मुहर लगी थी जो अक्सर केवल कागजों पर ही चमकती थी। बाबा की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस बुझे हुए दीये पर गिरे और वे बोले कि साहब दो साल पहले दीवाली की रात हमारे मोहल्ले के खंभे पर विभाग का वह नंगा तार टूटकर गिरा था जिसे जोड़ने का बजट अफ़सरों की जेब में जा चुका था। मेरा दस साल का पोता इसी माटी के दीये में तेल डालने चौखट पर आया था कि उस नंगे तार के करंट ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। वह मासूम तड़पकर हमेशा के लिए लाचार हो गया और आपके अफ़सरों ने कागज़ों में लिख दिया कि दुर्घटना के लिए विभाग नहीं बल्कि वह बच्चा ही जिम्मेदार था जिसने करंट लगने का साहस किया। मैं रोज़ यह बुझा दीया यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपकी इस चमकदार डिजिटल व्यवस्था को बता सकूँ कि तुम्हारी इन महँगी एलईडी लाइटों के पीछे एक गरीब के घर का असली चिराग और विभाग की नैतिकता दोनों बुझ चुके हैं। यह सुनते ही साहब का हाथ कांप गया और पूरा दफ़्तर उस सन्नाटे में डूब गया जो अक्सर किसी बड़े घोटाले के खुलने के बाद सचिवालय में छा जाता है।