वियतनाम के रेल ट्रैक पर ‘छैंया छैंया’

अनिकेत सिंह 
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें वियतनाम की राजधानी हनोई के एक शांत, सभ्य और ऐतिहासिक क्षेत्र में स्थित रेलवे ट्रैक पर कुछ भारतीय पर्यटकों का समूह शाहरुख खान और मलाइका अरोड़ा पर फिल्माए गए फिल्म ‘दिल से’ के प्रसिद्ध गीत छैंया छैंया को सामूहिक रूप से गाते और नृत्य करते हुए दिखाई देता है। फिल्म में यह गीत चलती ट्रेन पर फिल्माया गया था, इसलिए भारतीय पर्यटकों को रेलवे ट्रैक देखकर लगा कि ‘चलो, हम भी एक रील बनाकर सोशल मीडिया पर डालें और दुनिया को अपनी रचनात्मकता दिखाएं।’वे जोर-जोर से ताली बजाते हुए गीत गा रहे थे और नृत्य कर रहे थे। इस दौरान पूरे क्षेत्र में काफी शोरशराबा हुआ, जिससे वहां की गरिमापूर्ण शांति भंग हो गई।जब भारतीय पर्यटकों का यह समूह रेलवे ट्रैक पर झूम रहा था, तब वहां से गुजर रहे स्थानीय वियतनामी नागरिकों के चेहरों पर आश्चर्य, असहजता और अप्रसन्नता साफ दिखाई दे रही थी। वैसे भी रेलवे ट्रैक पर समूह नृत्य तो दूर, नागरिकों को क्रासिंग के अलावा वहां चलने की भी अनुमति नहीं होती। फिर भी भारतीय पर्यटकों पर इन निर्देशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।इस समूह को लगा होगा कि लोग उनकी प्रशंसा करेंगे, लेकिन हुआ उल्टा। जिन्होंने यह रील देखी, उन्होंने उनकी आलोचना की और कहा, “आप जैसे पर्यटकों की वजह से दुनिया के सामने भारत की छवि खराब होती है।” विदेशियों ने भी अपने देशों में कुछ भारतीयों की अनुशासनहीनता के बारे में टिप्पणियां कीं।इसी दौरान एक और पोस्ट वायरल हुई, जिसमें भारतीय पर्यटक एयरपोर्ट के टरमैक पर विमान के पास घेरा बनाकर गरबा करते दिखाई दिए। इस पोस्ट की भी बड़ी संख्या में भारतीयों ने आलोचना की और इसे शर्मनाक बताया।यह कोई अकेली घटना नहीं है। चाहे स्विट्ज़रलैंड के बर्फ से ढके पहाड़ हों, लंदन की अंडरग्राउंड ट्रेन, पेरिस का संग्रहालय या न्यूयार्क का टाइम्स स्क्वायर, कुछ भारतीय पर्यटकों की ‘हम नहीं सुधरेंगे’ वाली मानसिकता वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचा रही है।उद्योगपति हर्ष गोयनका ने भी अपने कड़वे अनुभव साझा करते हुए लिखा कि विदेशों की होटलों और उड़ानों में कुछ भारतीय पर्यटकों का व्यवहार इतना खराब होता है कि एक भारतीय होने के नाते शर्म महसूस होती है।एक दक्षिण भारतीय समूह ने नायग्रा फॉल्स की पृष्ठभूमि में फिल्मी गीत गाते और नृत्य करते हुए रील बनाई। जब तक वे संतुष्ट नहीं हुए, तब तक बारबार री-टेक लेकर रिकार्डिंग करते रहे। इससे वहां मौजूद विदेशी पर्यटकों को काफी असुविधा हुई और वे अपनी यादगार यात्रा का आनंद नहीं ले सके।आज पश्चिमी देशों और एशिया के विकसित देशों के अनेक होटल, रिसार्ट और सार्वजनिक स्थलों पर विशेष रूप से हिंदी या अंग्रेजी में भारतीय पर्यटकों के लिए ‘शांति बनाए रखें’, ‘बुफे में भोजन बर्बाद न करें’, ‘गंदगी न फैलाएं’ या ‘बाहर से लाया गया भोजन यहां न खाएं’ जैसी सूचनाएं लगाने की नौबत आ गई है।हर्ष गोयनका लिखते हैं कि स्विट्ज़रलैंड के एक होटल की लॉबी में भारतीय पर्यटकों के लिए लगाए गए ऐसे बोर्ड को देखकर उन्हें पहले अपमान का अनुभव हुआ। लेकिन उसी शाम उन्होंने देखा कि कुछ भारतीय बच्चों ने लॉबी में जोर-जोर से चिल्लाते हुए दौड़-भाग मचा रखी थी और उनके माता-पिता उन्हें रोक भी नहीं रहे थे।कुछ समय बाद लॉबी में स्थित कैफे क्षेत्र में थेपला और अचार की गंध फैल गई। संभवतः भारतीय पर्यटकों ने या तो वहां लगे निर्देशों को पढ़ा नहीं था या फिर उनकी अनदेखी कर दी थी। लॉबी में बैठे विदेशी मेहमानों को यह व्यवहार पसंद नहीं आया।सवाल यह है कि जो देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘अतिथि देवो भव:’ जैसे संस्कारों का प्रचार करता है, उसी देश के नागरिक जब दूसरे देशों में अतिथि बनते हैं, तो कई बार इतने असंस्कृत और अनुशासनहीन क्यों दिखाई देते हैं?कुछ समय पहले इंडोनेशिया के बाली से एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें होटल सुरक्षा कर्मियों ने एक भारतीय परिवार के बैग खुलवाए थे। उनमें होटल के तौलिये, हेयर ड्रायर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, साबुन की बोतलें और सजावटी वस्तुएं मिली थीं।पकड़े जाने के बाद वह परिवार होटल कर्मचारियों को पैसे देकर मामला रफा-दफा करने का अनुरोध कर रहा था। लेकिन होटल कर्मचारी ने कहा, “मुझे आपके पैसे नहीं चाहिए, यह सभ्यता नहीं है।” इस वीडियो ने करोड़ों भारतीयों को आत्ममंथन करने पर मजबूर किया।अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में कुछ भारतीय यात्रियों द्वारा शराब पीकर हंगामा करना, सहयात्रियों पर पेशाब कर देना, एयरहोस्टेस के साथ अभद्र व्यवहार करना या सीट को लेकर झगड़ा करना जैसी घटनाएं अब अक्सर समाचारों में दिखाई देती हैं।read more:https://khabarentertainment.in/program-organized-on-save-the-farm-campaign-and-balanced-fertilizer-use/विदेशी एयरलाइंस के क्रू सदस्यों को भारतीय मार्गों की उड़ानों के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण देना पड़ता है। इससे अधिक शर्मनाक और क्या हो सकता है?कोलोसियम या आइफिल टॉवर के आसपास की दीवारों पर भी कुछ लोग ‘राहुल वेड्स प्रिया’ जैसे संदेश लिखने से नहीं चूकते।जो समाज अपनी धरोहर का सम्मान नहीं करता, उसके नागरिक विदेशी धरोहरों के प्रति संवेदनशील कैसे होंगे? किसी भी समस्या का समाधान उसके मूल कारण तक पहुंचे बिना संभव नहीं है। भारतीय पर्यटकों की यह अनुशासनहीनता वर्षों पुरानी सामाजिक मानसिकता और नागरिक शिष्टाचार की कमी से भी जुड़ी हुई है।कई लोग जब लाखों रुपए खर्च करके विदेश यात्रा करते हैं, तो मान बैठते हैं कि उन्होंने पूरा देश या होटल खरीद लिया है। “मैंने पैसे दिए हैं” वाला तर्क उनकी असभ्यता का लाइसेंस बन जाता है।वे भूल जाते हैं कि जिस देश में वे गए हैं, वहां के कानून, संस्कृति और सार्वजनिक शांति खरीदी नहीं जा सकती। रेस्तरां में प्लेट भरकर भोजन छोड़ देना भी इसी मानसिकता का उदाहरण है।वियतनाम की सड़क पर गरबा या रेलवे ट्रैक पर गीत गाने के पीछे भारतीय संस्कृति का प्रचार नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया पर लाइक्स और व्यूज़ पाने की सस्ती होड़ थी।“देखो, हमने विदेश में भी धूम मचा दी!” जैसी मानसिकता प्रदर्शनवाद से जन्म लेती है। अपनी संस्कृति पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन किसी दूसरे देश के लोगों की शांति भंग करके उसका प्रदर्शन करना विकृति है।भारतीय अक्सर यह साबित करना चाहते हैं कि दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, अपना अलग माहौल बना लेंगे। यह सब बंद हॉल या निजी आयोजनों में ठीक लग सकता है, लेकिन सार्वजनिक स्थलों और रिहायशी इलाकों में यह स्थानीय लोगों की नाराज़गी का कारण बनता है।भारत में सदियों से वर्ग आधारित सोच रही है। कई लोग होटल के वेटर, सुरक्षा गार्ड या सफाई कर्मचारी को अपने से निम्न समझते हैं। जबकि विदेशों में हर पेशे का सम्मान किया जाता है।जब कोई भारतीय पर्यटक विदेशी होटल के कर्मचारियों के साथ नौकर जैसा व्यवहार करता है, तो वहां विवाद उत्पन्न होना स्वाभाविक है।इसके विपरीत, जापान के नागरिकों का उदाहरण पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा है। चाहे वे अपने देश में हों या विदेश यात्रा पर, उनका अनुशासित और विनम्र व्यवहार दूसरों के लिए सीख बन जाता है।जब आप भारत की सीमा पार करके किसी विदेशी भूमि पर कदम रखते हैं, तब आप केवल एक पर्यटक नहीं होते, बल्कि अपने देश के अनौपचारिक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ भी होते हैं।आपके व्यवहार से या तो भारत का सम्मान बढ़ेगा या फिर उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी।आइए, वैश्विक नागरिक बनने की दिशा में पहला कदम उठाएं और अपने भीतर अनुशासन, संवेदनशीलता और शिष्टाचार को इतना मजबूत बनाएं कि दुनिया हमें देखकर यह न कहे, “देखो, भारतीय आ गए!”, बल्कि गर्व से कहे, “देखो, भारत के संस्कारी नागरिक आए हैं!”।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *