मनुस्मृति मानव सभ्यता का प्रवीण ग्रंथ

कामतानाथ मनुस्मृति मानव सभ्यता का वह संविधान जिसे पृथ्वी के उस शाश्वत नियमों का प्रवीण ग्रंथ कहा जाए जिसे स्वयं सृष्टा ने मानव के साथ साथ समस्त जीवों के कालक्रम में रचकर सांविधिक प्रक्रिया की शुरुआत की थी। ये उस महान रचना के देदीप्यमान स्वरूप का त्रिगुणात्मक प्रभाव है। जिसमें मनुष्य सरीखे ही नहीं अपितु संमस्त सृष्टि के जीवों के संचालन को विधि व्यवस्था प्रदान की । श्रेष्ठता किसी के गुणों की हो सकती है। उसके अवगुणों की नहीं। ये सत्य है , लेकिन वह गुणी है अथवा अवगुणी इसका भान कहां से आया । तो हम ये अकाट्य सत्य कह सकते हैं , कि ये भान मनुस्मृति सरीखे उस महान ग्रन्थ से आया जिसने पूरी सृष्टि को एक नए ज्ञान के बोधि तक पहुंचाने के लिए प्रकाश दिया। इस यथार्थता को जो नहीं स्वीकार कर सकते उन्हें भी ये कैसे लगा कि वो जो बोल रहे हैं वो सत्य है अथवाअसत्य। इसका भी अनुशासन मनुस्मृति के नियमों में सन्निहित हैं।मन में उठे तरंग और मनुष्य की अभिलाषा का आलम्बन और उसकी दृष्टि जिसके चारों तरफ समाज की व्यवस्था चलने की प्रेरणा देती हैं। उसकी परिणति में भी मनुस्मृति है।गुणों का विभाजन न करने से गुण अवगुण में सादृश्यता समाप्त हो गई होती। परंतु सत रज और तम का गुणानुशासन ही सामाजिक व्यवस्था का आधार बनी ।अगर हम बात करें ,कि समाज के वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी तो , इस प्रश्न का उत्तर ये हो सकता है, की लोगों के बीच सहकार का सुशासन तैयार हो सके। और उसके लिए आवश्यक है , कि अच्छे और बुरे कारकों की पहचान का होना। समय बदला व्यवस्था बदली । लोग विधाता की व्यवस्था को चुनौती देने का दंभ भरते नजर आ रहे हैं तो ये भी उसी गुणों की वर्तनी सरीखे है। जिसके अंतर्गत सामाजिक श्रेणी के प्रतिपादन की व्यवस्था का स्वरूप बना। नर और नारी प्रथम और उसके उपरांत दोनों के सामाजिक दायित्व और उनका निर्वहन विधि आधारित संचालित करने की व्यवस्था ।नारियों के सम्मान के लिए मनुस्मृति में अनेक श्लोक हैं ।मनुस्मृति का प्रसिद्ध श्लोक है—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।read more:https://pahaltoday.com/district-magistrate-holds-meeting-of-the-district-drinking-water-and-sanitation-mission-issues-directives/
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”
— मनुस्मृति 3.56
अर्थात् जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास माना गया है और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ किए गए कार्य भी निष्फल माने गए हैं।जिसका आधार बनी मनुस्मृति। मनुस्मृति में नारियों की व्यवस्था के लिए कई श्लोक हैं । यही नहीं समाज की व्यवस्था संचालन में वर्ण व्यवस्था जो की आज प्रासंगिकता खो चुकी हैं के लिए भी श्लोक है जो कि उसके गुण और कर्मों पर आधारित हैं गुण और कर्म का महत्व
भारतीय चिंतन में मनुष्य के गुण, आचरण और कर्म को विशेष महत्व दिया गया है। मनुस्मृति 10.65 में कहा गया है—
“शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।”
इस श्लोक को आज के संदर्भ में इस विचार के रूप में समझा जा सकता है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके ज्ञान, चरित्र, गुण और कर्म से होनी चाहिए। जन्म के आधार पर किसी मनुष्य की गरिमा को कम या अधिक करना उचित नहीं है।
समय के साथ व्यवस्था बदलती है। वो और बात है कि लम्बे आक्रमणकारी संघर्षों से निकले भारत में एक नई व्यवस्था को जन्म दिया । जिसका समर्थक मै पुरजोर तरीके से हूं ।परंतु आज जब तंत्र की बात होती है तो संख्या का तुलनात्मक विश्लेषण नहीं करते । अपितु मनुस्मृति के तंत्र में सबके सरीखे विधि व्यवस्था के कार्य को स्थान दिया गया। जिसे आज की जन व्यवस्था के सापेक्ष में कमतर आंकने की चूक करते हैं। जबकि उस व्यवस्था को हटाकर और उसे अव्यवस्थित रूप में समाज के बीच लाकर भ्रम की स्थिति को उत्पन्न करके जनतंत्र की आधार शिला का निरूपण हुआ। जो विशुद्ध मनुस्मृति वैश्विक तंत्र के मानक पर कई देशों ने संविधानिक तथ्यों को अपने में ढालकर अपने देश को उच्चता पर ले गए ।वहीं हमारी सुव्यवस्थित व्यवस्था को परतंत्रता का आधार बनाकर विकृत स्वरूप में हमारे सामने परोस दिया। और हमें आपस के विभाजन की परिष्कृत संस्कृति का दास बनाकर अपने स्व सदृश शासन करने की व्यवस्था दिया। जो मनुस्मृति शासक को अपने प्रजा को परिवार सदृश पुत्र मानकर उसका समान पालन पोषण करने का आदेश देती हो । जो समय समय पर शास्त्रोक्त विधि व्यवस्था के अनुरूप शासन चलाने की व्यवस्था के लिए कहती हो वहां ये विकृति कैसे मान लेने की प्रथा ने जन्म ले लिया ,कि मानव मानव में भेद हैं। ये असत्य जो परिष्कृत स्वरूप में परोसा गया वो आक्रमणकारी धूर्तों की कपट चाल थी ।जिसे समय समय पर आजके राजनीतिक दल कांग्रेस और उसके पिछलग्गू शासनतंत्र के लोलुप जिनमें स्वतंत्रता के समय से ही अपने शासन में बने रहने की चिंता अधिक और समाज तथा राष्ट्र का चिंतन कम था ।जिनकी छद्मवेशी प्रकृति ने सनातन मर्यादाओं को नष्ट करके समाज को बांटने की प्रवृति रही है जिन्हें पाश्चात्य संस्कृति की अधिक चिंता है।औरअपने द्वारा किए गए पापों को मनुस्मृति जैसे पवित्र ग्रंथ को जलाकर उसके पीछे छुपाने की कोशिश करती है। जिसका भुगतान आज भी हमारा समस्त हिन्दू सनातनी समाज कर रहा है। जिस मनुस्मृति में जड़ चेतन तक के लिए विधान है।जिसमें सबको चिन्मय स्वरूप का कारक माना जाता हो। वह व्यवस्था अपने आप में श्रेष्ठ ही रही होगी, तभी समाज में कभी विभेद न किए जाने वाले मर्यादा का सदैव पालन रहा । आक्रमण की मार झेलता सनातन समाज उस व्यवस्था के बल पर ही आगे निरंतर बढ़ता रहा है। जिसमें सामाजिक श्रेणी का विभाजन कर्म को आधार मान कर आगे बढ़ाई । जिसके फलस्वरूप सबको सहकार का बोध रहा जो आजतक रहा है।इसी के बल पर भारत की कालजयी संस्कृति अक्षुण्य बनी रही है। जो समय के साथ सभी को उसके पढ़कर जानने की आवश्यकता पर अधिक निर्भर करती है। विशेष कर उन्हें जो इसके भटकाव का अधिक शिकार हैं।जिस दिन समस्त समाज इसे समझ चुका होगा । ऐसे श्रेष्ठ ग्रन्थ और उसके श्रेष्ठ विचारों से उल्लसित समस्त भारतीय जनमानस पुनः एकबार दुनिया में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में सफल हो सकेंगे।

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