तहसील के पटवारी दफ्तर के ऊँचे आले पर रखा वह पुराना लाल बस्ता पूरे कसबे के लिए कौतूहल और रहस्य का विषय बना हुआ था क्योंकि हमारे देश में फाइलों का वजन जितना बढ़ता है जनता की उम्मीदें उतनी ही पतली होती जाती हैं। उस बस्ते का कपड़ा धूप और धूल की मार से पूरी तरह मटमैला हो चुका था और उसकी सूती डोरियाँ घिसकर बिल्कुल पतली पड़ चुकी थीं जैसे ईमानदारी की सरकारी परिभाषा बार बार घिसने से पारदर्शी हो जाती है। दफ्तर का हर कर्मचारी उस तरफ एक अजीब सी झिझक और अचरज भरी निगाहों से देखता था क्योंकि भ्रष्टाचार के मंदिर में पुरानी फाइलें अक्सर भूत बनकर डराती हैं। उसी दफ्तर के मुख्य दरवाजे के पास बिछी लकड़ी की पुरानी बेंच पर हर सोमवार की भोर होते ही दीनानाथ काका आकर चुपचाप बैठ जाते थे क्योंकि भारत में न्याय की प्रतीक्षा करना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ घोषित कर दिया गया है। सफेद खद्दर की फटी धोती कुर्ता पहने और कांपते हाथों में लकड़ी की लाठी थामे काका दिन भर उस आले पर रखे लाल बस्ते को एकटक टकटकी लगाकर ताकते रहते थे जैसे कोई भक्त उस भगवान को देख रहा हो जो खुद रिश्वत के इंतजार में पत्थर का हो गया है। गाँव का कोई भी किसान जब अपने खेत का खसरा खतौनी या नामांतरण कराने दफ्तर आता तो काका को उसी निश्चल मुद्रा में बैठा पाता था क्योंकि दफ्तरों में मेजें खिसकती हैं कुर्सियाँ घूमती हैं पर आम आदमी का भाग्य वहीं जमा रहता है जहाँ पिछली सरकार छोड़ गई थी। दफ्तर का पुराना चपरासी रामू जब भी साहब की मेज पर पानी का जग रखकर बाहर निकलता तो काका उससे बड़े सहेज कर पूछते कि क्यों रे रामू आज उस आले वाले लाल बस्ते का मुआयना हुआ क्या क्योंकि इस लोकतंत्र में मुआयना केवल फाइलों का होता है इंसान तो बिना मुआयने के ही मर जाता है। रामू बस अपनी नजरें झुका लेता और एक लंबी ठंडी साँस भरकर चुपचाप अपने काम में लग जाता था क्योंकि सरकारी सेवा में सत्य बोलना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। गाँव के नवयुवक अक्सर काका का मजाक उड़ाते हुए कहते थे कि काका इस ढलती उम्र में कौन सी ज़मीन का हिसाब जोड़ने के लिए दफ्तर के चक्कर काटते हैं पर वे नहीं जानते थे कि जवानी में लोग क्रांति करते हैं और बुढ़ापे में सरकारी दफ्तर की धूल फाँकना ही अंतिम संस्कार के समान है।दफ्तर में हाल ही में स्थानांतरित होकर आए नए पटवारी शैलेश जी बहुत ही व्यावहारिक और कायदे कानून के पक्के अफसर माने जाते थे और कानून की पक्की पकड़ का अर्थ है कि वह गरीब को ठीक उसी तरह जकड़ेगा जैसे सांप चूहे को जकड़ता है। शैलेश जी को दफ्तर के कामकाज में किसी भी प्रकार की शिथिलता या फालतू की भीड़ बिल्कुल पसंद नहीं थी क्योंकि साहबों का मानना है कि दफ्तर काम के लिए नहीं केवल आदेशों की जुगाली के लिए होते हैं। जब उन्होंने लगातार चार हफ्तों तक हर सोमवार को दीनानाथ काका को उसी बेंच पर खामोश जमा देखा तो उनका माथा ठनक गया क्योंकि व्यवस्था को मौन उतना ही खौफनाक लगता है जितना कि सच। शैलेश जी जब भी अपनी घूमती हुई चमचमाती कुर्सी पर बैठते तो उनकी नजरें अनायास ही खिड़की के पार बैठी काका की उस बेबस मूरत पर चली जाती थीं और कुर्सी का चरित्र ही ऐसा होता है कि उस पर बैठने वाला खुद को खुदा और सामने वाले को अर्जी समझने लगता है। एक दिन दोपहर के वक्त जब दफ्तर में फरियादियों की आवाजाही थोड़ी कम हुई तो शैलेश जी से रहा नहीं गया क्योंकि खाली दिमाग शैतान का और खाली पटवारी प्रशासन का घर होता है। उन्होंने चपरासी रामू को आवाज लगाकर बुलाया और कड़े प्रशासनिक लहजे में पूछा कि यह बुजुर्ग आदमी रोज सोमवार को यहाँ आकर क्यों जम जाता है क्योंकि बिना मतलब के बैठना भी अब राजद्रोह की श्रेणी में आने लगा है। रामू ने अपने गमछे से माथे का पसीना पोंछते हुए कहा कि साहब यह तो पिछले बीस सालों से इसी तरह हर हफ्ते आते हैं और बीस साल भारतीय न्याय प्रणाली में एक पलक झपकने जैसा समय है। शैलेश जी ने भवें सिकोड़कर कहा कि सरकारी दफ्तर कोई मुसाफिरखाना नहीं है जबकि असलियत यह है कि यहाँ केवल बिचौलियों का ही बिस्तर लगा रहता है।अगले सोमवार को जब सुबह नौ बजे दफ्तर का ताला खुला तो दीनानाथ काका नियम के पक्के अपनी उसी पुरानी जगह पर बैठे हुए मिले क्योंकि भारत में केवल गरीब और भिखारी ही समय के पाबंद होते हैं। शैलेश जी उस दिन कुछ ज्यादा ही प्रशासनिक मिजाज में थे इसलिए वे सीधे अपने केबिन से बाहर निकले और काका के पास जाकर तल्ख कदमों से खड़े हो गए जैसे कोई शेर किसी बकरी को नैतिकता का पाठ पढ़ाने आया हो।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteशैलेश जी ने अपनी कड़क आवाज में कहा कि काका आप रोज यहाँ आकर सरकारी दफ्तर का कीमती समय क्यों खराब करते हैं और सरकारी समय की कीमत केवल वही जानता है जो चाय पीने में दो घंटे लगाता है। दीनानाथ काका ने बहुत ही आदर से अपने दोनों कांपते हाथ जोड़े और बोले कि पटवारी साहब मैं तो बस इस आले में रखे लाल बस्ते की निगहबानी करने आता हूँ क्योंकि इस देश में रक्षक ही भक्षक हैं इसलिए बस्तों की भी सुरक्षा जरूरी है। शैलेश जी ने अचरज से उस आले की तरफ देखा और हँसते हुए बोले कि काका उस बस्ते में तो बरसों पुराने ख़ारिज हो चुके सरकारी कागजात पड़े होंगे और प्रशासन में खारिज हुई चीजें केवल मंत्रियों के वादों जैसी होती हैं। काका ने अपनी लाठी के सहारे थोड़ा आगे होकर कहा कि साहब इस बस्ते में जो कागज बंद है वही इस गाँव के हर गरीब की जमीन का असली रक्षक है क्योंकि गरीब का रक्षक ईश्वर भी तभी बनता है जब पटवारी की जेब भर दी जाए।शैलेश जी के अंदर का अफसर इस बात को कतई मानने को तैयार नहीं था क्योंकि अफसर और वास्तविकता का रिश्ता वैसा ही है जैसा ईमानदारी और राजनीति का होता है। शैलेश जी ने दफ्तर में मौजूद वकीलों मुंशियों और किसानों की तरफ देखते हुए कहा कि आज इस फालतू के तमाशे का अंत होना बेहद जरूरी है क्योंकि प्रशासन को तमाशे केवल वही पसंद हैं जो वह खुद करता है। पास खड़े पुराने किसान सुखदेव ने शैलेश जी को टोकते हुए कहा कि पटवारी साहब काका की बात का बुरा मत मानिए क्योंकि गाँव में लोग सरकारी कागजों को गंगाजल से भी ज्यादा पवित्र और खतरनाक मानते हैं। शैलेश जी ने उत्सुक होकर पूछा कि क्या इस बस्ते में कोई अदालत का स्टे आर्डर रखा है क्योंकि स्टे आर्डर ही वह जड़ी बूटी है जो अन्याय के हनुमान को हवा में लटकाए रखती है। सुखदेव ने अपनी आँखें मूँद लीं और बोला कि साहब हम तो बस इतना जानते हैं कि जब तक यह बस्ता यहाँ है तब तक गाँव पर कोई अपना हल नहीं चला सकता क्योंकि अंधविश्वास और व्यवस्था का गठबंधन ही इस देश का असली आधार है। शैलेश जी ने ठान लिया कि वे आज ही उस लाल बस्ते को खोलकर पूरे गाँव के सामने उसकी असलियत लाएँगे क्योंकि सत्य का उद्घाटन करना भी कभी कभी खतरनाक मनोरंजन बन जाता है। उन्होंने चपरासी रामू को तुरंत हुक्म दिया कि स्टूल लाकर आले से वह लाल बस्ता नीचे उतारे।रामू ने कांपते हाथों से उस भारी और धूल भरे लाल बस्ते को नीचे उतरा और शैलेश जी की मेज पर ला कर रख दिया जैसे किसी पापी के सामने उसका कच्चा चिट्ठा पेश कर दिया गया हो। दफ्तर के बाहर खड़े दर्जनों फरियादी और गाँव के बुजुर्ग कौतूहल से खिड़की के पास जमा हो गए क्योंकि दूसरों की तबाही का मंजर देखना भारतीय समाज का प्रिय खेल है। शैलेश जी ने मुस्कुराते हुए बस्ते की पुरानी डोरियों को खोला और उसके अंदर हाथ डालकर कागजात बाहर निकालने लगे जैसे कोई जादूगर टोपी से सफेद खरगोश निकालने वाला हो। बस्ते के अंदर जमीन का कोई खसरा नक्शा या अदालती स्टे आर्डर नहीं था बल्कि उसमें पीले पड़ चुके सैकड़ों कोरे सरकारी स्टाम्प पेपर रखे थे जिन पर नीचे केवल अंगूठे के नीले निशान लगे हुए थे और कोरे कागज पर अंगूठा लगवाना ही इस देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक कलाकारी है। शैलेश जी ने उन स्टाम्प पेपरों को उलटना पलटना शुरू किया तो सबसे नीचे एक बहुत ही पुराना सरकारी बेदखली नोटिस निकला जो ठीक बीस साल पुराना था। शैलेश जी ने उस नोटिस को अपने हाथ में लिया और जैसे ही उसकी शुरुआती पंक्तियाँ पढ़ना शुरू किया उनके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई क्योंकि सच जब अचानक सामने आता है तो अच्छे अच्छों का मेकअप उतर जाता है।जी ने थरथराते हुए गले से उस नोटिस का कड़वा सच पढ़ा जिसमें लिखा था कि बीस साल पहले जब सरकार ने जमीन का अधिग्रहण किया था तब मुआवजा डकारने के लिए तत्कालीन चालाक पटवारी ने काका के सारे फर्जी अंगूठे इन कोरे कागजों पर लगवा लिए थे। भ्रष्टाचार की यह कितनी सुंदर मीनार थी जहाँ नींव में गरीब का अंगूठा लगा था और ऊपर साहब का बंगला बना था। उस भ्रष्ट पटवारी ने काका को ठगने के लिए इस खाली लाल बस्ते को आले पर टांग दिया था और झूठ कह दिया था कि जब तक यह बस्ता यहाँ रहेगा तब तक उनकी जमीन सुरक्षित रहेगी। प्रशासन की महानता देखिए कि उसने एक झूठ को बीस साल तक मंदिर बनाए रखा और भक्त हर सोमवार को प्रसाद की जगह आंसू चढ़ाता रहा। शैलेश जी की आँखों से आँसू छलक पड़े जब उन्हें समझ आया कि काका जिसे रक्षा का प्रतीक मान रहे थे वह असल में उनकी अपनी ही लूट का सबसे बड़ा सबूत था क्योंकि व्यवस्था जब लूटती है तो वह रसीद भी नहीं देती। काका ने अपनी धुंधली आँखों से रोते हुए पूछा कि पटवारी साहब बताओ न मेरा बस्ता ठीक तो है न क्योंकि गरीब के पास खोने के लिए केवल अपना भ्रम ही बचता है। शैलेश जी के पास उस मासूम सवाल का कोई जवाब नहीं था क्योंकि लोकतंत्र में सवालों के जवाब केवल चुनाव के समय ही मिलते हैं और पूरा दफ्तर उस अनपढ़ बुजुर्ग के निष्पाप विश्वास और व्यवस्था की क्रूरता पर बिलख बिलख कर रो पड़ा क्योंकि अंत में रोना ही एकमात्र ऐसा कृत्य है जिस पर अभी तक कोई टैक्स नहीं लगा है.