देश के युवा बनाम राष्ट्रीयता। आसन्न चुनौती का संकट।

भारत आज विश्व के उन गिने-चुने देशों में है जहाँ युवा जनसंख्या सबसे अधिक है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और लगभग आधी आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है। यह विशाल युवा शक्ति भारत की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि यही युवा राष्ट्रनिर्माण, नवाचार, विज्ञान, शिक्षा, उद्योग, कृषि और सामाजिक विकास में अपनी ऊर्जा लगाए तो भारत को वैश्विक देश की अग्रणी पंक्ति में खड़ा होने से कोई नहीं रोक सकता। यदि यही ऊर्जा भटक जाए, स्वार्थी तत्वों के प्रभाव में आकर राष्ट्रहित से विमुख हो जाए, तो यही जनसांख्यिकीय लाभ राष्ट्र के लिए चुनौती भी बन सकता है।राष्ट्रीयता का अर्थ किसी दल, विचारधारा या व्यक्ति विशेष का समर्थन नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, अखंडता, संविधान, संस्कृति, राष्ट्रीय संपत्ति और नागरिक कर्तव्यों के प्रति समर्पण की भावना है। दुर्भाग्यवश आज के समय में युवाओं का एक वर्ग सोशल मीडिया के दुष्प्रचार, आधी-अधूरी सूचनाओं, राजनीतिक ध्रुवीकरण और निहित स्वार्थी शक्तियों के प्रभाव में शीघ्र आकर भ्रमित हो जाता है। बिना तथ्यों की पुष्टि किए आंदोलन, विरोध अथवा हिंसक गतिविधियों में शामिल हो जाना चिंताजनक प्रवृत्ति है।लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति है, किंतु जब आंदोलन हिंसक रूप ले लेते हैं, सार्वजनिक बसों, ट्रेनों, सरकारी भवनों, विद्यालयों, अस्पतालों तथा अन्य राष्ट्रीय संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया जाता है, तब सबसे अधिक हानि स्वयं राष्ट्र की होती है। यह संपत्ति किसी सरकार या अधिकारी की निजी नहीं होती, बल्कि देश के करोड़ों करदाताओं के धन से निर्मित होती है। एक बस जलती है तो उसका नुकसान देश का होता है; एक रेलवे स्टेशन टूटता है तो उसका भार जनता पर ही आता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा यह समझें कि राष्ट्र का विकास केवल सरकारों के भरोसे नहीं होता। विकसित राष्ट्रों की पहचान उनके जागरूक नागरिकों से होती है। जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और सिंगापुर जैसे देशों ने अपने युवाओं के अनुशासन, परिश्रम, तकनीकी दक्षता और राष्ट्रप्रेम के बल पर असाधारण प्रगति की है। भारत के युवाओं में भी प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भारतीय युवा विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों और तकनीकी क्षेत्रों में अपनी क्षमता का लोहा मनवा रहे हैं।read more:https://khabarentertainment.in/staff-nurse-accuses-blood-center-operator-of-sexual-harassment-intimidation-and-mental-harassment-case-registered/ आवश्यकता केवल इस प्रतिभा को राष्ट्रहित की दिशा देने की है।राष्ट्रीयता की भावना केवल सीमा पर शस्त्र उठाने से नहीं आती। ईमानदारी से कर चुकाना, पर्यावरण की रक्षा करना, मतदान करना, कानून का पालन करना, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना, स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार का विरोध करना और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से करना भी राष्ट्रसेवा ही है। प्रत्येक युवा यदि अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करे तो भारत की प्रगति की गति कई गुना बढ़ सकती है।परिवार, विद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थानों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का आधार भी होनी चाहिए। विद्यार्थियों को संविधान के मूल्यों, स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास, राष्ट्रीय कर्तव्यों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाना चाहिए। युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास भी आवश्यक है। सोशल मीडिया के इस युग में सूचना का प्रवाह तीव्र है, किंतु विवेक का विकास उससे भी अधिक आवश्यक है। किसी भी समाचार, वीडियो या संदेश को सत्य माने बिना उसकी पुष्टि करना, अफवाहों से बचना और किसी भी प्रकार की हिंसा या तोड़फोड़ का हिस्सा न बनना आज के युवा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। राष्ट्रभक्ति का अर्थ भावनात्मक आवेश नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनकर राष्ट्र के विकास में योगदान देना है।भारत आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य तभी साकार होगा जब देश का युवा अपने समय, प्रतिभा और ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देगा। आंदोलन यदि आवश्यक हों तो वे अहिंसक, लोकतांत्रिक और रचनात्मक हों; विरोध यदि करना हो तो विचारों से हो, हिंसा से नहीं। राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का प्रथम दायित्व है।
आज का भारत अपने युवाओं से केवल उत्साह नहीं, बल्कि विवेक, अनुशासन, राष्ट्रनिष्ठा और उत्तरदायित्व की अपेक्षा करता है। यदि युवा अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगे, तो भारत केवल जनसंख्या के कारण नहीं, बल्कि अपनी युवा शक्ति के कारण विश्व का नेतृत्व करेगा। राष्ट्रीयता की भावना ही वह शक्ति है जो विविधताओं से भरे भारत को एक सूत्र में बाँधती है।

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