कब तक कर्ज के सहारे खेती करेगा किसान?

गांवों में खेती केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूरे परिवार की ज़िंदगी का आधार होती है। हर मौसम के साथ किसान एक नई उम्मीद बोता है। वह बीज के साथ अपने परिवार की कमाई, मेहनत और आने वाले दिनों का भरोसा भी खेत में डालता है। लेकिन कई बार खेती की शुरुआत ही ऐसी मुश्किलों से होती है, जिन पर किसान का कोई नियंत्रण नहीं होता। समय पर बीज न मिलना, खेती की बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और सरकारी योजनाओं तक सीमित पहुँच जैसी समस्याएँ उसकी उम्मीदों को धीरे-धीरे कमज़ोर कर देती है। यही कारण है कि ज़मीन के छोटे टुकड़े पर खेती करने वाला किसान आज केवल मौसम से नहीं, बल्कि व्यवस्था की खामियों से भी संघर्ष कर रहा है।मुजफ्फरपुर सहित बिहार के अनेक ग्रामीण इलाकों में छोटे किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि उन्हें सरकारी बीज वितरण योजना की जानकारी समय पर नहीं मिलती है या फिर जब वे कृषि विभाग के केंद्रों तक पहुँचते हैं, तब तक बीज का स्टॉक समाप्त हो चुका होता है। कई किसानों के आवेदन अधूरे रह जाते हैं, कुछ तकनीकी कारणों से लाभ से वंचित रह जाते हैं, तो कई ऐसे भी हैं जो पूरी प्रक्रिया से ही अनजान रहते हैं। परिणामस्वरूप उन्हें निजी दुकानों से अधिक कीमत पर बीज खरीदना पड़ता है। जिससे उनके खेती की लागत बढ़ जाती है, जबकि आमदनी पहले से ही सीमित होती है। छोटे किसान के लिए कुछ हजार रुपये का अतिरिक्त खर्च भी पूरे परिवार के मासिक बजट को प्रभावित कर देता है। जिन किसानों के पास एक या दो एकड़ से भी कम जमीन है, उनके पास जोखिम उठाने की गुंजाइश सबसे कम होती है। कई परिवार खेती शुरू करने के लिए ही उधार लेते हैं। अच्छी फसल होने पर किसी तरह कर्ज़ उतर जाता है, लेकिन नुकसान होने पर वही कर्ज़ अगले मौसम तक साथ चलता है।हमारे देश में आज भी ज़्यादातर खेती प्रकृति पर निर्भर है और पिछले कुछ वर्षों में मौसम का बदलता स्वरूप किसानों की चिंता और बढ़ा रहा है। कभी अत्यधिक वर्षा खेतों में पानी भर देती है, जिससे तैयार फसल खराब हो जाती है। तो कभी, पर्याप्त वर्षा न होने से सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। ऐसी परिस्थितियों में किसान की पूरी मेहनत और निवेश कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाता है। बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर किया गया खर्च वापस नहीं आता, जबकि लिया गया कर्ज़ ब्याज के साथ बढ़ता ही जाता है। कई बार किसान को पुराने कर्ज़ को चुकाने के लिए नया कर्ज़ लेना पड़ता है और वह धीरे-धीरे कर्ज़ के ऐसे चक्र में फँस जाता है, जिससे निकलना आसान नहीं होता।हालांकि सरकार किसानों की आय बढ़ाने और खेती को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से कई योजनाएं संचालित कर रही है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पात्र किसानों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाती है। फरवरी 2019 में शुरू हुई इस योजना के तहत अब तक किसानों के खातों में 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि हस्तांतरित की जा चुकी है। यह सहायता किसानों को खेती की शुरुआती लागत पूरी करने में कुछ हद तक मदद करती है। बिहार में भी लाखों किसान इस योजना से जुड़े हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 तक राज्य के लगभग 77.7 लाख किसानों का पंजीकरण पीएम-किसान योजना में हो चुका था। इसी अवधि में 14 लाख से अधिक किसानों को विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से बीज उपलब्ध कराए गए।readmore:https://khabarentertainment.in/509-vidyut-sakhis-in-bijnor-receive-thermal-printers-instant-electricity-bill-receipts-will-now-be-available-at-doorsteps/इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और सब-मिशन ऑन सीड्स एंड प्लांटिंग मैटेरियल के माध्यम से किसानों को प्रमाणित और उन्नत बीज उपलब्ध कराया जाता है, जिससे उनकी उत्पादकता बढ़ सके। बिहार सरकार भी मुख्यमंत्री तीव्र बीज विस्तार योजना, बीज वितरण योजना, कृषि इनपुट अनुदान योजना तथा बिहार राज्य फसल सहायता योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों को राहत देने का प्रयास कर रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य किसानों तक बेहतर गुणवत्ता के बीज और प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में आर्थिक सहायता पहुँचाना है।हालाँकि इन उपलब्धियों के बावजूद यह कहना कठिन है कि योजनाओं का लाभ सभी छोटे किसानों तक समान रूप से पहुंच पाया है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन्हें इन योजनाओं की सबसे अधिक ज़रूरत है, वे ही अक्सर वंचित रह जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन भूमिहीन, और महिला किसानों की है जो खेतों में अनवरत काम करते है, कई बार उनसे भी अधिक जिसका जमीन पर मालिकाना है, पर जमीन अपने नाम न होने के कारण उन्हें योजनाओं का लाभ तक नहीं मिलता। अनेक किसानों के आवेदन दस्तावेजों की कमी, आधार या बैंक खाते से जुड़ी तकनीकी समस्याओं अथवा जानकारी के अभाव में लंबित रह जाते हैं। वहीं कई स्थानों पर बीज की आपूर्ति समय पर नहीं होने से किसानों को निजी दुकानों से अधिक कीमत पर बीज खरीदना पड़ता है। इससे सरकारी योजना का उद्देश्य पूरी तरह सफल नहीं हो पाता।विशेषज्ञ भी मानते हैं कि केवल आर्थिक सहायता देना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि खेती के पूरे चक्र को मजबूत बनाया जाए। समय पर प्रमाणित बीज की उपलब्धता, मौसम के अनुरूप वैज्ञानिक सलाह, आसान फसल बीमा, त्वरित मुआवजा और किसानों तक सही जानकारी पहुँचाने की व्यवस्था एक साथ मजबूत करनी होगी। पंचायत स्तर पर बीज वितरण केंद्रों की निगरानी बढ़ाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि सीमित भूमि वाले किसानों को प्राथमिकता के आधार पर बीज उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, आवेदन प्रक्रिया को इतना सरल बनाया जाए कि कम पढ़े-लिखे किसान भी बिना किसी परेशानी के योजनाओं का लाभ उठा सकें।
देश की खाद्य सुरक्षा की नींव छोटे किसानों के कंधों पर टिकी है। यदि वही किसान हर मौसम की शुरुआत कर्ज़ लेकर करेगा और हर फसल के बाद और अधिक कर्जदार होता जाएगा, तो खेती का भविष्य भी असुरक्षित हो जाएगा। इसलिए समय की मांग है कि सरकारी योजनाओं की सफलता केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस आधार पर मापी जाए कि क्या सबसे कमजोर किसान तक समय पर बीज, पर्याप्त सहायता और भरोसेमंद सुरक्षा पहुँच रही है?

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