चलो, वापस उन दिनों में, जहां कागज की एक सामान्य नाव भी पूरी नदी पार करने की हिम्मत रखती थी

स्नेहा सिंह 

क्या वे पुराने दिन याद आते हैं? दीपावली के समय बाजार से खरीदा जाने वाला वह लक्ष्मी माता के चित्र वाला मोटा गत्ता, उसके नीचे तार से मजबूती से बंधा कैलेंडर का मोटा पुलिंदा और रोज सुबह उठते ही एक पन्ना फाड़ने की बालसुलभ जल्दी। बदलती तारीख के साथ मानो दिन नहीं, पूरा ऋतुचक्र आगे खिसक रहा हो ऐसा अनुभव होता था। महीना बदलता तो पन्ने का रंग भी बदलता और उस रोजमर्रा के क्रम में जब अचानक लाल या हरे अक्षरों में आषाढ़ वद एकम या आषाढ़ी दूज नजर आता, तब कागज के उस सूखे पन्ने पर भी उंगलियों में नमी आ जाती थी। मन को लगता कि आकाश कहीं अंदर से भर रहा है, बादल सज रहे हैं और धरती की प्यास अब लंबी नहीं रहेगी।पहली बारिश होते ही यादों की पूरी नदी मन के अंदर बहने लगती। बचपन में गली के बाहर भरने वाले पानी के गड्ढे आफत नहीं लगते थे। वे तो उत्सव थे। कीचड़ में लोहे की बड़ी कील से कील गाड़ने का खेल, खेलने का मजा, घास के बीच भरे स्वच्छ पानी के गड्ढे में धब करके छलांग लगाने का आदिम आनंद और फिर शरीर पर उछले पानी से खुद ही खिलखिलाकर हंस पड़ने का वह निर्दोष मजा आज किस वैभव में मिले?बारिश थम जाने के बाद छोटी डंडियों की नोक से गीली जमीन में छोटा गड्ढा खोदने और बगल के गड्ढे में से उसी लकड़ी की नोक से पतली नहर तराशने की। पानी उस छोटी रेखा के रास्ते बहकर हमारे बनाए हुए गड्ढे में आए, फिर आसपास से छोटी ईंटें, मिट्टी के ढेले और पत्ते इकट्ठे करके मेंड़ बांध देना। इस तरह एक छोटा सा बांध तैयार होता और हम ऐसे राजा महसूस करते मानो किसी नदी पर विशाल बांध बांध दिया हो। वह बालसुलभ इंजीनियरिंग किसी डिग्री की मोहताज नहीं थी, वह तो कल्पना की मिट्टी और आनंद के पानी से बना हुआ बचपन का विज्ञान था।गड्ढे के किनारे कूदती हुई छोटी मेंढकी, भीगी हुई जमीन पर धीरे-धीरे सरकते लाल-काले गंडैले और वनस्पतियों के आसपास उगा नया, कोमल, जीवंत संसार, बचपन उसे विस्मय से देखता। छोटी लकड़ी पर अनेक पैरों वाले गंडैले को चढ़ाकर उसकी चलने की गति को निहारना, फिर से उसे पत्ते के नीचे रख देना। शायद यही हमारे जीवदया का पहला पाठ था।हां, और रात को बिजली गुल हो जाने पर क्या? लालटेन के मद्धिम उजाले में या गली के एकमात्र पीले बल्ब के आसपास चक्कर काटते पंखों वाले दीमक, पंख झाड़ते जीव और अंधेरे में भीगी मिट्टी का वातावरण। वह सब मानो बारिश के बाद की कोई निशब्द सभा हो ऐसा लगता। आज आधुनिक फ्लैट संस्कृति में बारिश तो है, लेकिन खिड़की के बाहर गली नहीं है, लाइट है, पर लालटेन का संवाद नहीं है, सुविधा है, पर उस उजाले में खड़ा रहने वाला बचपन कहीं खो गया है।read more:https://khabarentertainment.in/relief-rain-falls-from-the-sky-in-bhadohi-the-carpet-city/
गड्ढे आफ़त नहीं,
उत्सव अनंत लाते हैं,
कीचड़ नहीं कील गाड़ने का खेल,
खेलते हुए नहीं थकते,
धब करके छलांग लगा,
पानी उछालने का वह उमंग,
भौतिक सुखों में कहां मिले
वह आदिम आनंद का रंग?
बारिश थम जाने के बाद भी प्रकृति पेड़ों के पत्तों पर अमृत जैसी ठंडी बूंदें सहेज कर रखती है। दोस्तों के साथ पेड़ की डाली को थोड़ा सा हिला देना और उन बूंदों का अचानक बारिश बनकर चेहरे पर गिरना, तब जो हंसी छूटती थी वह सिर्फ मौज नहीं थी। वह जीवन के निर्दोष आनंद की घोषणा थी। उस क्षण किसी के पास मोबाइल नहीं था, किसी के पास फोटो खींचने की जल्दी नहीं थी, फिर भी यादों के अंदर वह दृश्य आज भी सबसे चमकीला है। शायद कैमरे से कैद किया हुआ सब कुछ टिकता नहीं, पर मन से जिया हुआ सब अमर हो जाता है।ऋतुओं का बदलना सिर्फ कैलेंडर के पन्ने फटने जैसी यांत्रिक घटना नहीं है। वह तो पृथ्वी के हृदय की धड़कन बदलने की एक पवित्र प्रक्रिया है। चिलचिलाती गर्मी का तपन, झुलसा देने वाली लू और एसी की कृत्रिम हवा से जब मनुष्य का चित्त धीरे-धीरे शुष्क, जड़ और संवेदनहीन होने लगता है, तब आकाश में घिरते आषाढ़ी बादल सृष्टि का सबसे बड़ा आश्वासन बनकर आते हैं।आकाश जब धरती के नाम अपना पहला पत्र लिखता है, तब उसकी स्याही भले ही पानी की हो, पर उसका अर्थ अद्भुत रूप से आत्मीय होता है। मानसून का आगमन केवल वातावरण का फेरबदल नहीं है, वह मनुष्य के अंदर कहीं सोई हुई संवेदनाओं को जगाने वाली स्नेह की दस्तक है।
मानसून की शुरुआत का क्षण सचमुच रहस्यमयी होता है। सदियों से तपती धरती पर पानी की पहली बूंद गिरती है और हवा में जो सोंधी मिट्टी की महक घुलती है, वह मनुष्य के अस्तित्व की जड़ों तक पहुंच जाती है। वह सुगंध दुनिया के किसी महंगे इत्र की मोहताज नहीं है। वह नासिका के रास्ते सीधे यादों की एक पुरानी पेटी खोल देती है, जिसे हम रोज़मर्रा की दौड़-धूप, जिम्मेदारियों और समय के अभाव में कहीं ताला लगा देते हैं।कंप्यूटर के कीबोर्ड पर मशीन की तरह दौड़ती उंगलियां, मेल्स का अनवरत प्रवाह, फाइलों का अदृश्य बोझ और समय के कड़े शेड्यूल के बीच फंसा आधुनिक मनुष्य इस पहली बारिश के क्षण में थोड़ी देर के लिए थम जाता है। खिड़की के बाहर बरसते आकाश को देखकर मन में कहीं नरमी उतर आती है। प्रकृति का यह सनातन जादू है। वह हमें मशीन होने के भ्रम से थोड़े समय के लिए मुक्त करके, फिर से एक बार मनुष्य होने का अहसास कराती है।रात के सन्नाटे में जब हमारा शहर गहरी नींद में सो रहा हो और बाहर बारिश की अविराम धाराएं बरस रही हों, तब खिड़की के पास या गैलरी में अकेले खड़े रहकर बूंदों की आवाज सुनना भी एक प्रकार का ध्यान है। उस क्षण सोशल मीडिया के नोटिफिकेशंस, चेहरों की आवाजें और यह आभासी दुनिया अचानक खोखली लगने लगती है। मन समय के प्रवाह को चीरकर पीछे उन दिनों में सरक जाता है, जहां कागज की एक सामान्य नाव भी पूरी नदी पार करने की हिम्मत रखती थी।

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