वीरेंद्र बहादुर सिंह
तारिका और आर्या पक्की सहेलियां थीं। एक दिन आर्या ने कहा, “तारिका चलो, हम बुलबुलों के साथ खेलते हैं।”
“हां आर्या, मुझे भी बुलबुलों के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता है।”दोनों सहेलियां बुलबुलों के पीछे दौड़ने लगीं। जब बुलबुला बहुत ऊंचा उड़ जाता, तो आर्या का मन उदास हो जाता और जब वह नीचे आता, तो दोनों की खिलखिलाहट चारों ओर गूंज उठती।आर्या के पापा उसके लिए बुलबुले उड़ाने वाला एक नया खिलौना लाए थे। मम्मी ने उसके साथ आई छोटी बोतल में साबुन का घोल भर दिया था। दोनों सहेलियां बहुत खुश हो गईं।उनके घर से थोड़ी दूर एक नदी बहती थी। आर्या और तारिका अक्सर उसी नदी के किनारे खेला करती थीं। कभी नदी उन्हें हंसते हुए देखकर खुशी से लहराने लगती, तो कभी उन्हें पढ़ाई करते देखकर उसका मन भारी हो जाता।नदी का पानी शांत भाव से बहता रहता। आसपास के लोग उसके किनारे कपड़े धोते, कभी बर्तन मांजते। कभी बच्चे मिलकर एक-दूसरे पर पानी के छींटे उड़ाते, तो कभी आपस में झगड़ भी पड़ते। नदी सब कुछ देखती रहती, लेकिन किसी से कुछ नहीं कहती और कभी किसी का बुरा नहीं सोचती। वह सबको पीने का पानी देती और किनारे खड़े ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से बातें करती। हवा के झोंकों के साथ लहराती रहती। प्यासे पक्षी उसका पानी पीकर अपने घोंसलों में चैन से सो जाते। लेकिन नदी तो दिन-रात बहती रहती और अपना काम करती रहती। उसके पानी में अनेक बुलबुले बनते और हवा में बिखर जाते।”बुलबुले भाई, तुम बहुत ऊपर मत जाया करो।””हां नदी बहन, आपकी बात सही है, लेकिन ऊंचा उड़ने में बहुत आनंद आता है।”नदी से बातें करते-करते बुलबुले एक छलांग लगाकर फिर ऊपर उड़ जाते। जब उन पर सूरज की किरणें पड़तीं, तो वे इंद्रधनुषी रंगों से चमक उठते। उन्हें देखकर आर्या खुशी से झूम उठती। तारिका उन्हें पकड़ने दौड़ती। कभी कोई बुलबुला हथेली पर आ जाता, तो दोनों उसकी सुंदरता को एकटक निहारती रहतीं। लहराती नदी और पेड़ भी इन दोनों सहेलियों को देखते रहते।कई दिन बीत गए। एक दिन आर्या और तारिका फिर नदी के किनारे खेलने पहुंचीं।”आर्या… यह क्या? आज तो यह सुंदर किनारा बिलकुल सूना-सूना लग रहा है। नदी भी उदास दिखाई दे रही है।””हां तारिका, नदी में तो एक भी बुलबुला नहीं है। पक्षियों का चहचहाना भी नहीं सुनाई दे रहा। सब कुछ सूख गया है और नदी गंदगी तथा कीचड़ से भर गई है।”read more:https://pahaltoday.com/bangladesh-foreign-minister-who-met-jaishankar-said-send-sheikh-hasina-back/तभी मुरझाए हुए फूल के पीछे से एक चमक दिखाई दी। दोनों सहेलियों की आंखें उस तेज प्रकाश से चौंधिया गईं। उन्होंने देखा कि फूलों के पीछे से एक सुंदर परी बाहर आई। उसके पंख चांदी की तरह चमक रहे थे और उसके हाथ में जादुई हरी छड़ी थी।”अरे! आप कौन हैं?” तारिका ने पूछा।
“और आप कितनी सुंदर हैं। आप तो चमक रही हैं।” आर्या उसे एकटक देखती रह गई।”आर्या, तारिका, मैं एक परी हूं। मेरा नाम रूपेरी है। मैं पर्यावरण परी हूं। मैं अपने आसपास के वातावरण की रक्षा करती हूं। लेकिन मैं बहुत समय से देख रही हूं कि लोग पेड़ काट रहे हैं, नदी के पानी में कूड़ा-कचरा और प्लास्टिक फेंक रहे हैं। पानी में गंदगी भर जाने से उसका पानी बिलकुल मटमैला हो गया है। पक्षी यह पानी पीकर बीमार पड़ जाते हैं और मनुष्य भी बीमार हो जाते हैं। यही कारण है कि अब बुलबुले और पक्षी कहीं दिखाई नहीं देते।””सच कह रही हैं परी दीदी, हमें तो बुलबुलों के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता है।” आर्या तुरंत बोली।”लेकिन परी दीदी, क्या अब यह किनारा कभी फिर बुलबुलों से नहीं भर पाएगा?” तारिका उदास होकर बोली।”हां परी दीदी, क्या यह किनारा कभी साफ़ नहीं होगा?” आर्या ने भी दुखी होकर पूछा।”नहीं… नहीं, ऐसा नहीं है। इस नदी के किनारे की सुंदरता फिर लौट सकती है और बुलबुले भी नदी के पानी में फिर जन्म ले सकते हैं।” रूपेरी परी मुस्कराते हुए बोली।
“वह कैसे, परी दीदी?” आर्या ने पूछा।”देखो आर्या और तारिका, अगर सभी बच्चे मिलकर पर्यावरण की रक्षा करेंगे, अपने आसपास सफाई रखेंगे और पानी में कचरा नहीं डालेंगे, तो यह नदी का किनारा फिर से लहलहा उठेगा।””परी दीदी, हम अपनी सहेलियों और दोस्तों के साथ मिलकर यहां जरूर सफाई करेंगे।” दोनों ने एक साथ कहा।इतने में कई रंग-बिरंगे बुलबुले उड़ते हुए आए और आर्या के कंधे पर बैठ गए।”आर्या, हमें तुम्हारे साथ खेलना बहुत अच्छा लगता है, लेकिन फूलों के बिना हम नहीं रह सकते।” एक बुलबुला बोला।”तारिका, ये पेड़-पौधे ही हमारा घर हैं।” दूसरा नीले रंग का बुलबुला बोला।”आर्या, नदी ही हमारा जन्मस्थान है। यदि उसका पानी गंदा होगा, तो हमारा जन्म ही नहीं होगा।”इतना कहकर सभी बुलबुले विशाल आकाश में उड़ गए और आंखों से ओझल हो गए।अब तारिका और आर्या सब कुछ समझ चुकी थीं। उन्होंने पर्यावरण बचाने का काम शुरू कर दिया। उन्होंने रिया और वंशिका से बात करके एक समूह बनाया। मयूर, जिया और विहान भी उनके साथ जुड़ गए। सभी ने मिलकर नदी के किनारे की हरियाली वापस लाने का संकल्प लिया।रोज़ सुबह बच्चे आधा घंटा नदी के किनारे की सफाई करते। पौधों को पानी देते। नदी से गंदगी, कीचड़ और प्लास्टिक का कचरा निकालते। कूड़ा इकट्ठा करके नए-नए पौधे लगाते और गांव के बड़े लोगों को भी वहां गंदगी न फैलाने के लिए समझाते।धीरे-धीरे नदी का किनारा बिलकुल साफ़ हो गया। नए पौधे उगने लगे और नदी का पानी बिलकुल स्वच्छ हो गया। सूख चुके पौधे फिर से हरे-भरे हो गए और फूलों से सुगंध फैलने लगी।एक सुबह आर्या ने देखा कि अनेक रंग-बिरंगे बुलबुले आकाश में लुका-छिपी खेल रहे हैं। उनकी हंसी से पूरा वातावरण गूंज उठा था। तीन-चार बुलबुले आर्या और तारिका के कंधों पर आ बैठे, जिससे आर्या को गुदगुदी होने लगी।”आर्या, तारिका, तुमने बहुत अच्छा सफाई का काम किया। हमें यहां बहुत मजा आया। अब हम हर शाम इस नदी के किनारे तुम्हारे साथ खेलेंगे।”यह कहकर वे रंग-बिरंगे बुलबुले फिर आकाश में उड़ गए और आर्या तथा तारिका उन्हें एकटक देखती रह गईं।उसी समय रूपेरी परी दीदी भी वहां आ गईं। उन्होंने कहा, “वाह आर्या और तारिका, तुम तो पर्यावरण की सच्ची मित्र बन गई हो। हमेशा याद रखना, एक पेड़ हजारों जीवों को जीवन देता है।”परी ने अपनी जादुई हरी छड़ी नदी किनारे खिले फूलों पर घुमाई। देखते ही देखते असंख्य फूल खिल उठे। चारों ओर ऐसा लग रहा था मानो धरती पर तारे चमक रहे हों। पूरा किनारा फिर से हरियाली से भर गया।सचमुच, पर्यावरण की रक्षा करना हम सभी का पवित्र कर्तव्य है।