डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
देखिए भाई, ईश्वर ने इंसान का जब ढांचा तैयार किया, तो उसमें दो आंखें दीं ताकि दुनिया का तमाशा 3D में देख सको। दो कान दिए ताकि इधर की उधर सुन सको। पर मुंह? मुंह सिर्फ एक दिया। और उस पर भी सुरक्षा कारणों से इतने ताले लटका दिए कि तिजोरी का पासवर्ड भूलने वाला बैंक मैनेजर भी शर्मा जाए। पर इंसान तो इंसान है। ताला कितना भी मजबूत हो, हम मास्टर चाबी जेब में लेकर घूमते हैं। हमारे इस साढ़े तीन इंची मुखारविंद पर पांच तरह के डिजिटल और मैनुअल ताले लगे होते हैं। आइए, आज इनकी कुंडली खंगालते हैं।पहला होता है संस्कार-लॉक, जिसे हम ‘लोग क्या कहेंगे’ गियर भी कह सकते हैं। यह ताला हमारे पैदा होते ही घर के बुजुर्ग हमारी जुबान पर वेल्डिंग मशीन से जड़ देते हैं। इस ताले की चाबी होती है शर्म, संकोच और लिहाज। जब मोहल्ले के शर्मा जी आपके घर आकर दो घंटे तक अपने निकम्मे लड़के की कामयाबी के झूठे कसीदे पढ़ रहे होते हैं, तब आपका अंतरात्मा चिल्ला रहा होता है, “अबे ओ सफेद झूठ की फैक्ट्री! बंद कर अपनी दुकान!” लेकिन तभी आपके मुंह पर लगा यह ताला एक्टिवेट हो जाता है। आप अपनी बत्तीसी बाहर निकाल कर बस इतना कह पाते हैं, “वाह शर्मा जी, चिंटू ने तो कमाल कर दिया!” अंदर ही अंदर आपका खून खौलकर चाय के पानी की तरह उबल रहा होता है, पर बाहर आप गंगा-जमुनी सभ्यता के ब्रांड एंबेसडर बने बैठे होते हैं।इसके बाद नंबर आता है दफ्तरिया-लॉक का, यानी ‘बॉस इज ऑलवेज राइट’ का कफस। यह एक बेहद आधुनिक, ब्लूटूथ से चलने वाला ताला है। इसकी रेंज सिर्फ आपके ऑफिस के वाई-फाई तक होती है। जैसे ही बॉस के केबिन से आवाज आती है “एनी सजेशन्स?”, आपके दिमाग की बत्ती जलती है। आपको पता होता है कि बॉस का नया आईडिया किसी कबाड़खाने के प्लान जैसा है। आप जैसे ही सच बोलने के लिए मुंह खोलते हैं, यह ताला खटाक से बंद हो जाता है। इस ताले का सीधा कनेक्शन आपके बैंक अकाउंट और घर की ईएमआई से होता है। आप सच उगलने की बजाय बटर उगलने लगते हैं “सर! ऐसा रेवोल्यूशनरी आईडिया तो साक्षात स्टीव जॉब्स के दिमाग में भी नहीं आया होगा!” यह ताला आपको अप्रेजल तो दिला देता है, पर आईने में खुद से नजरें मिलाने लायक नहीं छोड़ता।read more:https://pahaltoday.com/shailendra-kumar-dwivedi-a-pharmacist-posted-at-the-community-health-center-visheshwarganj-became-the-district-president-of-the-health-department/फिर आता है सबसे खतरनाक वैवाहिक-लॉक, जिसे आप शांति-मंत्र क्लैंप कह सकते हैं। इस ताले का आविष्कार कब हुआ, इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं है, पर इसके भुक्तभोगी दुनिया के हर कोने में पाए जाते हैं। शादी के सात फेरों के साथ ही यह ताला पति के मुंह पर अपने आप इंस्टॉल हो जाता है। पत्नी पूछती है, “सुनो, यह साड़ी मुझ पर कैसी लग रही है?” अब यहां सच बोलना मतलब बारूद के ढेर पर बैठकर माचिस की तीली जलाना है। अगर साड़ी अच्छी नहीं भी लग रही, तब भी यह लॉक जुबान को ऐसे जकड़ता है कि शब्द सिर्फ तारीफ के ही निकलते हैं “अरे वाह! तुम तो बिल्कुल अप्सरा लग रही हो।” इस ताले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ‘हां’ और ‘जी’ के अलावा कोई तीसरा शब्द बोलने ही नहीं देता। जो इसे तोड़ने की गुस्ताखी करता है, उसे रात का खाना खुद बनाकर खाना पड़ता है। चौथा है रायचंद-लॉक, जो ‘अनाधिकृत ज्ञान’ पर बैरियर लगाता है। हम भारतीयों के खून में चायपत्ती से ज्यादा ‘राय’ दौड़ती है। लेकिन कभी-कभी जब हम किसी गंभीर महफिल में बैठे होते हैं, जहां हमारा ज्ञान देना ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हो सकता है, वहां हमें खुद पर यह ताला लगाना पड़ता है। जैसे, डॉक्टर किसी को बीमारी समझा रहा हो और आपके पेट में चूहे कूद रहे हों कि मैं बताऊं ‘गिलोय का काढ़ा’ कैसे सब ठीक कर देता है! आप अपने होंठों को दांतों तले दबा लेते हैं। कसम से, इस ताले को लगाए रखना उतना ही मुश्किल है जितना कि गोलगप्पे के पानी को देखकर मुंह में पानी न आने देना। आखिरी है सोशल-लॉक, जिसे आज के जमाने की कैंसिल कल्चर शील्ड कहिए। यह इंटरनेट की दुनिया का सबसे लेटेस्ट ताला है। डिजिटल दुनिया में कब कौन सी बात पर बवाल हो जाए, कोई नहीं जानता। आप लिखना चाहते हैं “मुझे आज की चाय अच्छी नहीं लगी।” पर यह सोशल-लॉक आपको टोकता है “रुको! चाय वालों की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है। लोग तुम्हें एंटी-चाय घोषित कर देंगे।” नतीजा? आप मुंह पर ताला मारते हैं, कीबोर्ड से उंगलियां हटाते हैं और चुपचाप बिल्ली की रील देखकर हंसने लगते हैं।सार यही है बाबू… मुंह के ये ताले अगर न हों, तो दुनिया महाभारत का लाइव टेलीकास्ट बन जाए। कड़वा सच यह है कि जो अपने मुंह पर समय रहते ताला लगाना सीख गया, वो संत हो गया और जो हर जगह मास्टर चाबी आजमाने गया, वो बेचारा लाल-पीला होकर घर लौटा। इसलिए, ताले लगे रहने दीजिए, चाबी गुम हो जाए तो और बेहतर!