अशोक भाटिया
खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते….. भारत का यह कड़ा रुख अब पाकिस्तान के लिए काल बनता जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले के बाद भारत ने जब से ऐतिहासिक ‘सिंधु जल समझौते’ को ठंडे बस्ते में डाला है, तब से इस्लामाबाद के हुक्मरानों की रातों की नींद उड़ी हुई है। अब हालत यह हो गई है कि पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने की आशंका से घबराए पाकिस्तान ने भारत को सीधे ‘युद्ध’ की गीदड़भभकी दे डाली है।भारत के कड़े तेवरों को देखकर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी बुरी तरह बौखला गए हैं। अंद्राबी ने एक बयान जारी कर कहा कि भारत के इस कदम से 25 करोड़ से अधिक पाकिस्तानियों की जिंदगी दांव पर लग जाएगी। इंटरनेशनल नियमों की दुहाई देते हुए अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तान पानी को एक राजनीतिक हथियार या दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के विचार को खारिज करता है। पानी रोकने की किसी भी कोशिश के गंभीर नतीजे होंगे और इसे UN चार्टर के आर्टिकल 51 के तहत ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जा सकता है।पानी की कमी का सबसे ज्यादा असर सिंध पर पड़ा है, जहां पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कराची स्थित है। यहां राजनेता, किसान और जल विशेषज्ञ पानी की घटती सप्लाई और असमान वितरण को लेकर लगातार चिंता जाहिर कर रहे हैं। सिंध और बलूचिस्तान में पानी की भारी कमी के कारण यह संकट पाकिस्तान की लगभग एक-तिहाई आबादी को प्रभावित कर रहा है।पाकिस्तानी अखबार डॉन के अनुसार, सिंधु नदी पर बने सबसे बड़े और अहम सिंचाई ढांचों में से एक सुक्कुर बैराज के आसपास यह संकट तेजी से साफ दिखाई दे रहा है। यह बैराज सिंध और बलूचिस्तान के कुछ हिस्सों में लाखों एकड़ खेती की जमीन के लिए पानी का स्रोत है इसलिए यह पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी है। सिंध के नहर नेटवर्क में पानी की कमी चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है।डॉन के सूत्रों के मुताबिक, नॉर्थ वेस्ट नहर में 64।1 प्रतिशत, राइस नहर में 38 प्रतिशत और दादू नहर में 82 प्रतिशत की भारी कमी देखी जा रही है। ऊपरी इलाकों में पानी की अवैध निकासी और असमान वितरण के आरोपों से स्थिति और भी बिगड़ रही है।सिंध के सिंचाई विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि पंजाब अपने तय हिस्से (44,000 क्यूसेक) के मुकाबले 53,394 क्यूसेक पानी ले रहा है, जो उसके हक से 21 प्रतिशत से ज्यादा है। इसी तरह, कहा जा रहा है कि टौंसा बैराज अपने मंजूरशुदा हिस्से (24,000 क्यूसेक) के मुकाबले 25,694 क्यूसेक पानी ले रहा है, जो लगभग 9।3 प्रतिशत ज्यादा है।वहीं दूसरी ओर चश्मा बैराज में पानी का स्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे पता चलता है कि ऊपरी इलाकों में पानी जमा हो रहा है, जबकि निचले इलाकों में पानी की भारी कमी हो रही है।इस बिगड़ते संकट ने पाकिस्तान में तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी है। जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख हाफिज नईम-उर-रहमान ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) की अगुवाई वाली सिंध सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सालों तक सत्ता में रहने के बावजूद कराची में पानी की पुरानी किल्लत को दूर करने में नाकाम रही है।पीपीपी सिंध के अध्यक्ष निसार अहमद खुहरो ने बार-बार चेतावनी दी है कि पाकिस्तान के सबसे ज्यादा कृषि उत्पादन वाले इलाकों में से एक होने के बावजूद सिंध को पानी का उसका वाजिब हिस्सा नहीं मिल रहा है।उन्होंने बताया कि सिंध हर साल लगभग 55 लाख टन चावल का उत्पादन करता है और चावल के निर्यात से लगभग 1।4 अरब डॉलर कमाता है। आर्थिक नतीजों के बारे में चेतावनी देते हुए खुहरो ने सिंध के खरीफ सीजन के पानी के आवंटन में कटौती को प्रांत का आर्थिक नरसंहार बताया।खुहरो का कहना है कि सिंध देश के कुल कृषि उत्पादन का 67 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है, फिर भी उसे पानी का उसका वाजिब हिस्सा नहीं मिल रहा है।read more:https://pahaltoday.com/census-of-india-will-be-digital-in-2027-in-bhadohi/नहरें सूखने से किसान परेशान। जमीनी स्तर पर संकट का असर दिखने लगा है। डॉन के अनुसार, सुक्कुर बैराज सिस्टम की राइट बैंक नहरों में पानी की भारी कमी है। ये नहरें लरकाना, कंबर-शहदादकोट, दादू, शिकारपुर और बलूचिस्तान के कुछ हिस्सों में सिंचाई करती हैं।सिंध आबादगार बोर्ड के कंबर-शहदादकोट चैप्टर के पूर्व अध्यक्ष इशाक मुघेरी ने बताया कि नॉर्थ वेस्टर्न कैनाल में 64।1 प्रतिशत, राइस कैनाल में 38 प्रतिशत और दादू कैनाल में 82 प्रतिशत पानी की कमी है।दादू नहर, जिसके लिए 4,995 क्यूसेक पानी तय किया गया था, उसे अभी सिर्फ 860 क्यूसेक पानी मिल रहा है।नॉर्थ वेस्टर्न नहर को 6,260 क्यूसेक के तय हिस्से के मुकाबले 2,100 क्यूसेक पानी मिल रहा है।जबकि राइस नहर को 8,700 क्यूसेक के मंजूर हिस्से के मुकाबले 5,300 क्यूसेक पानी मिल रहा है।सालों से बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने में देरी और सिंचाई नहरों का काम अधूरा रहने से स्थिति और खराब हो गई है, जिससे किसान मौसमी खेती शुरू नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी ओर, जल की कमी का असर पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई ढांचे सुक्कुर बैराज पर साफ दिखाई दे रहा है। सिंधु नदी पर बना यह विशाल ढांचा लाखों एकड़ खेती को जीवन देता है। लेकिन अब यहां से निकलने वाली नहरों में पानी तेजी से घट रहा है। उत्तर पश्चिम नहर में 64 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई है। राइस नहर लगभग 38 प्रतिशत घाटे में चल रही है, जबकि दादू नहर की हालत सबसे भयावह है, जहां 82 प्रतिशत तक पानी कम हो चुका है।सिंधु नदी प्रणाली पर पाकिस्तान की निर्भरता ने लंबे समय से पानी की सुरक्षा को एक रणनीतिक मुद्दा बना दिया है। जैसे-जैसे पानी की कमी बढ़ रही है और पानी के बंटवारे को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो रहे हैं। यह संकट देश के सिंचाई प्रबंधन और कृषि बुनियादी ढांचे की कमजोरियों को और ज्यादा उजागर कर रहा है।भारत के सिंधु जल समझौते पर कड़ा रुख बनाए रखने और बंटवारे को लेकर अंदरूनी विवादों के बढ़ने के साथ आने वाले महीनों में पाकिस्तान के सामने पानी की चुनौती और भी मुश्किल होती दिख रही है।हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हैदराबाद में आयोजित एक ‘बुद्धिजीवी सम्मेलन’ को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने का जिक्र किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि आतंक के संरक्षकों तक सिंधु नदी का पानी नहीं पहुंचने देंगे। रक्षा मंत्री ने साफ तौर पर कहा कि भारत शांति की भाषा न समझने वालों को जवाब देना अच्छे से जानता है और जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक यह जल-बंटवारा समझौता निलंबित ही रहेगा।बता दें कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस घोषणा का पुनरावलोकन है, जिसमें उन्होंने कहा था कि खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे।गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के जल-उपयोग को लेकर 19 सितंबर, 1960 को ऐतिहासिक ‘सिंधु जल संधि’ पर हस्ताक्षर किए गए थे। हालांकि, पिछले वर्ष पहलगाम में हुए जघन्य आतंकवादी हमले के बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाया ।अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए, भारत ने इस संधि को तब तक के लिए स्थगित कर दिया है, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और विश्वसनीय रूप से बंद नहीं कर देता।यहां एक और बात यह भी है कि पाकिस्तान के भीतर ही पानी की लूट और असमान वितरण ने भी आग में घी डाल दिया है। सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब अपने तय हिस्से से 21 प्रतिशत अधिक पानी खींच रहा है। तौंसा बैराज भी तय सीमा से ज्यादा पानी ले रहा है। दूसरी तरफ निचले इलाकों में नहरें सूख रही हैं। इसका मतलब साफ है कि पाकिस्तान का आंतरिक ढांचा भी अब टूटने लगा है।यही वजह है कि वहां राजनीतिक युद्ध छिड़ चुका है। जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सिंध सरकार को पानी संकट के लिए जिम्मेदार ठहराया है। वहीं पीपुल्स पार्टी संघीय तंत्र और जल प्रबंधन एजेंसियों पर हमला बोल रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता निसार अहमद खुह्रो ने खुलकर कहा है कि सिंध देश की 67 प्रतिशत कृषि उपज पैदा करता है, फिर भी उसे उसके हिस्से का पानी नहीं दिया जा रहा। उन्होंने खरीफ मौसम में पानी कटौती को सिंध का “आर्थिक कत्लेआम” बताया।रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है। दशकों तक पाकिस्तान आतंक को राज्य नीति की तरह इस्तेमाल करता रहा, जबकि भारत केवल सैन्य जवाब तक सीमित था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। नई दिल्ली ने जल, कूटनीति और आर्थिक दबाव को एक साथ जोड़कर बहुस्तरीय रणनीति तैयार की है। इसका असर केवल आज के संकट तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले महीनों में यदि पाकिस्तान के भीतर पानी को लेकर प्रांतीय संघर्ष और बढ़ते हैं, तो वहां राजनीतिक अस्थिरता, कृषि संकट और आर्थिक दबाव और गहरा सकता है।