प्रिय पाठकों, क्या मेरी कहानी सुनोगे? मैं अब एक 45 वर्षीय इमारत हूँ। कभी मैं भी घर हुआ करता था। घर तो उसमें रहने वाले व्यक्तियों से ही बनता है ना, बिना सदस्यों के तो दीवारें ही हैं। कभी मेरे आँगन में भी बचपन खेलता था। बात उस समय की है जब मेरा निर्माण शुरू हुआ। एक युवा अथर्व अपनी बीबी के साथ रहने मेरे आँगन आया था। उस समय मेरा स्वरूप ऐसा नहीं था। करीब दो सौ गज का एक प्लाट था। अथर्व ने अपनी मेहनत से उसमें एक कमरा बनाया था। हाँ, मुझे पक्का याद है। उस समय एक कमरा ही था। सारा आँगन खुला था। उस समय बाथरूम घर के बाहर या मुख्य द्वार के पास ही बनाते थे। रसोई भी बनी हुई नहीं थी। बस एक कोने में टीन शेड के नीचे नीलम खाना बनाती थी। दोनों के पास ज्यादा सामान नहीं था। घर के बचे खाली हिस्से में अथर्व ने सब्जियाँ उगा रखी थीं और फूलों के पौधे लगाए थे। आज मैं आपको अपने मकान से घर होने की यात्रा सुना रहा हूँ। अथर्व अपनी बीबी के साथ अपनी छोटी सी दुनिया में खुश था। बहुत ही साधारण, प्रकृति से जुड़ी जिंदगी जीते थे दोनों। घर में सुविधाएँ कम थीं लेकिन सुकून था। नीलम ने कटहल, आडू, और दो आम के वृक्ष लगा रखे थे। घर के मुख्य द्वार के पास ही एक नल था। खुला नीला आसमां उनकी मेहनत का साक्षी था। समय तेजी से बीत रहा था। समय की एक आदत होती है, खुशी का समय तेजी से बीत जाता है और दुख का समय धीरे-धीरे गुजरता प्रतीत होता।
अथर्व ओर नीलम के चार बच्चे हुए। अब ये एक कमरे का घर सबके लिए छोटा पड़ रहा था। अथर्व ने दो कमरे बनवा लिए पीछे की ओर। घर गोमुखी आकार का था। आगे से चौड़ाई कम, पीछे अधिक चौड़ा। चारों बच्चे मेरे आँगन में खेलते, शोर मचाते। मैं भी उनके बचपन को जी रहा था। उनकी किलकिलाहटों में बहकता रहता। उस समय बिजली कम आती थी। सुबह को पाँच से ग्यारह और रात को ग्यारह से पाँच। लेकिन अथर्व के परिवार को कोई परेशानी नहीं हुई। बड़ा आँगन था। चारों बच्चे अपनी-अपनी चारपाई खुले आँगन में बिछाते, वहीं लैम्प जलाकर पढ़ते। रात को अंताक्षरी खेलते, पहाड़े याद करते। read more:https://pahaltoday.com/the-consumer-commission-settled-the-matter-by-giving-a-cheque-of-rs-55040/गर्मियों की छुट्टी में अथर्व के गाँव से उसके भाई के बच्चे भी आ जाते। घर में खूब रौनक रहा करती। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हो रहे थे, मेरा भी स्वरूप बदलता जा रहा था। अब सभी पेड़ों को काटकर पक्का फर्श बना दिया गया था। आगे से घर को नहीं बनाया गया। आगे आँगन खाली रखा गया। पीछे की ओर ही दो कमरों के आगे एक कमरा और बना दिया गया जिसे उस समय बैठक कहते थे। अथर्व और उसका बेटा बैठक में सोते थे। नीलम ने एक कमरे को स्टोर बनाया हुआ था और, दोनों कमरों के बीच में जो कमरा था उसमें नीलम और उसके तीन छोटे बच्चे सोते थे।
अब घर में टंकी का प्रवेश हो चुका था। नल को उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। वो भी एक कोने में खड़ा टंकी के नखरे देखता रहता। जब टंकी में पानी नहीं आता तब सबको नल की याद आती। उस समय मोटर का चलन कम था। आज के समय में मोटर से पानी चौथी मंजिल तक भी पहुँच जाता है। समय तेजी से गुजर रहा था। अथर्व को अपने बड़े बेटे की शादी करनी थी। उसके लिए अलग से एक कमरा आगे की ओर आँगन में बनवाया गया। अब तक घर का लगभग सारा आँगन खत्म हो चुका था। मुख्य दरवाजे पर 8 फुट की पार्किंग जगह छोड़कर एक कमरा और गैलरी बनाई गई। गैलरी से होकर अंदर के कमरों में जाया जाता। बीच में दस फुट का आँगन छोड़ गया। अब घर मैं अपने आधुनिक स्वरूप में आ चुका था। घर में सुविधा का सब सामान था। मैं अब युवा अवस्था में खिलकर महक रहा था। घर के सदस्यों की संख्या भी बढ़ गई थी। रोज रात को सभी सदस्य आँगन में खिलखिलाते, अपने किस्से सुनाते। मैं भी उनके किस्से बड़े ध्यान से सुनता और अपनी विशालता पर इतराता। समय ने तेजी से करवट ली। अथर्व के दोनों बेटे अपनी बीबियों को लेकर शहर चले गए। दोनों बेटियों की शादी हो गई। घर अब वीरान हो गया। अथर्व भीअपनी बीबी नीलम को लेकर अपने भाई के पास गाँव चला गया। और मैं यहाँ वर्षों से सबकी राह देख रहा हूँ। अब मैं घर नहीं रहा, पुरानी इमारत बन चुका हूं ।अब यहाँ कोई नहीं आता। अब मेरा आँगन बाट जोहता रहता है फिर से बच्चों की किलकारी सुनने की। मेरा जैसा हाल यहाँ कई घरों का है। सबके बच्चे बाहर शहरों में जाकर बस गए। कुछ घरों पर ताले लटके हैं, कुछ घरों में दो ही प्राणी बूढ़िया-बूढ़े रहते हैं। पूरा मोहल्ला ही वीरान हो गया है। आधुनिकता की इतनी बड़ी कीमत मेरे शहर ने चुकाई है। आखिर क्यूँ युवा अपने घरों को छोड़ बड़े शहरों में बस जाते हैं। और हम सुविधाजनक घर पुरानी इमारतें बन जाते हैं। किसी के पास जवाब हो तो जरूर बताना।