रूस-भारत संबंधों की नई उड़ान—ऊर्जा से अंतरिक्ष तक, साझेदारी का बढ़ता दायरा

सेंट पीटर्सबर्ग। सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम (SPIEF) 2026 में रूस और भारत के बीच बढ़ते सहयोग ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों की साझेदारी केवल पारंपरिक मित्रता तक सीमित नहीं है। वैश्विक शक्ति-संतुलन में हो रहे परिवर्तनों के बीच मॉस्को और नई दिल्ली ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, आर्कटिक क्षेत्र और वित्तीय व्यवस्था जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग की नई इबारत लिख रहे हैं।भारत की ऊर्जा सुरक्षा में रूस की भूमिका लगातार बढ़ रही है। विशेष रूप से सकोल (Sokol) क्रूड ऑयल को लेकर भारतीय पक्ष की रुचि बनी हुई है। यह हल्का और कम सल्फर वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों की जरूरतों के अनुरूप है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी जगह खाड़ी क्षेत्र के तेल का उपयोग करना न केवल महंगा होगा, बल्कि इसके लिए रिफाइनरी ढांचे में बड़े बदलाव भी करने पड़ेंगे। यही कारण है कि भारत रूसी तेल आयात को बनाए रखने के साथ-साथ उसमें वृद्धि की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने मई में इस रुझान की पुष्टि भी की थी।ऊर्जा सहयोग की कहानी केवल तेल तक सीमित नहीं है। तमिलनाडु का कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र आज दोनों देशों की तकनीकी साझेदारी का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है। दो इकाइयाँ पहले से बिजली उत्पादन कर रही हैं, जबकि चार अन्य इकाइयों पर कार्य जारी है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि मई में पहली बार रूस की ओर से भारत में एक नए स्थल पर रूसी डिजाइन वाले अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की संभावना का सार्वजनिक उल्लेख किया गया। यदि यह योजना आगे बढ़ती है, तो यह भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करेगी।अंतरिक्ष क्षेत्र में भी दोनों देशों के संबंध एक नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं। भारत अब केवल उपग्रह प्रक्षेपण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानव अंतरिक्ष उड़ानों और अंतरिक्ष स्टेशनों की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का प्रस्तावित ऑर्बिटल इंक्लिनेशन रूसी स्टेशनों के समान 51.6 डिग्री होगा, जिससे भविष्य में संयुक्त मिशन, डॉकिंग ऑपरेशन और भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों की रूसी स्टेशन पर संभावित उड़ानों का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।read more:https://pahaltoday.com/india-is-building-the-kolkata-bangkok-expressway-which-will-connect-four-countries/भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा दूसरे अंतरिक्ष यात्री दल के चयन की प्रक्रिया इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2028 के बाद इस क्षेत्र में ठोस प्रगति देखने को मिल सकती है।SPIEF में आर्कटिक क्षेत्र भी चर्चा के केंद्र में रहा। भले ही भारत भौगोलिक रूप से एक उष्णकटिबंधीय देश है, लेकिन वैश्विक व्यापार और समुद्री संपर्कों में उसकी बढ़ती भूमिका उसे उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) की ओर आकर्षित कर रही है। जनवरी में दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों ने इस मार्ग के आर्थिक उपयोग और कार्गो क्षमता को लेकर एक संयुक्त योजना पर सहमति बनाई थी। एशिया और यूरोप के बीच यात्रा समय में 15 से 20 दिन की कमी वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसी दिशा में भारतीय नाविकों को ध्रुवीय जलक्षेत्रों में संचालन का प्रशिक्षण देने संबंधी समझौता भी उल्लेखनीय है। भारत भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आइस-क्लास जहाजों की क्षमता विकसित कर रहा है।रूस-भारत संबंधों का सबसे रोचक पहलू वित्तीय क्षेत्र में दिखाई देता है। कुछ वर्ष पहले तक दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग पूरी तरह डॉलर आधारित था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। वर्तमान में लगभग 97 प्रतिशत व्यापारिक लेनदेन रुपये और रूबल में हो रहे हैं। इससे न केवल डॉलर पर निर्भरता कम हुई है, बल्कि बाहरी प्रतिबंधों का प्रभाव भी सीमित हुआ है। अब ध्यान इस बात पर है कि रूस के पास जमा भारतीय मुद्रा का निवेश भारत की अर्थव्यवस्था में किस प्रकार किया जाए। इसी संदर्भ में ब्रिक्स ढांचे के भीतर केंद्रीय बैंकों के बीच भुगतान प्रणाली और वित्तीय संपर्क को मजबूत करने पर चर्चा तेज हुई है।SPIEF 2026 ने यह संकेत दिया है कि रूस और भारत की साझेदारी केवल वर्तमान की आवश्यकताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले दशकों की रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित की जा रही है। तेल और गैस से लेकर परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान, आर्कटिक व्यापार मार्गों और नई वित्तीय संरचनाओं तक, दोनों देश ऐसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं जो भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को आकार देने वाले हैं।आज जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, रूस और भारत का सहयोग केवल द्विपक्षीय संबंध नहीं रह गया है; यह उस उभरती हुई विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण उदाहरण बनता जा रहा है जिसमें राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता और पारस्परिक लाभ को प्राथमिकता दी जा रही है।

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