इथेनॉल से चलेंगे वाहन: 85 प्रतिशत ब्लेंडिंग वाला फ्लेक्स-फ्यूल लॉन्च

स्नेहा सिंह 
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष का कोई स्पष्ट अंत दिखाई नहीं दे रहा है। एक ओर दोनों देश बातचीत करते हैं, तो दूसरी ओर एक-दूसरे पर हमले भी जारी रखते हैं। इससे वैश्विक स्थिति और अधिक जटिल बनती जा रही है। इस अनिश्चितता के कारण दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है। भारत सहित अनेक देशों के पास मौजूद ईंधन भंडार भी धीरे-धीरे कम होने लगे हैं। कई देशों ने वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग की दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैं। भारत भी पेट्रोल और डीजल के विकल्प विकसित करने तथा विभिन्न रसायनों और पदार्थों के मिश्रण से नए प्रकार के ईंधन तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है।
एक ओर ईंधन का भंडार घट रहा है और दूसरी ओर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि की आशंका बनी हुई है। ऐसे में सरकार ने इन पर निर्भरता कम करने के लिए एक नया कदम उठाने का निर्णय लिया है।हाल ही में सरकार ने E85 श्रेणी का बायोफ्यूल लॉन्च किया है। इसे दिल्ली के कुछ पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध कराया गया है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने एक नया अधिसूचना मसौदा जारी किया था। मोटर वाहन अधिनियम के तहत जारी इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में पेट्रोल में अधिक मात्रा में इथेनॉल मिलाने के नियमों का प्रस्ताव रखा गया था। माना जा रहा है कि उसी के आधार पर यह नई नीति लागू की गई है।भविष्य में वाहन पूरी तरह इथेनॉल पर भी चल सकेंगे, ऐसी संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं। सरकार 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाले वाहनों की दिशा में तैयारी कर रही है। इसके लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियम-1989 में संशोधन कर E85 और E100 तक के ईंधन के लिए वाहन मानकों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया है।
ड्राफ्ट में ईंधन की नई श्रेणियां तय करने का भी प्रस्ताव है। उदाहरण के लिए, पेट्रोल की पहचान E10 से बदलकर E10/E20 की जाएगी। इसके साथ ही E85 और E100 को भी आधिकारिक रूप से नियमों में शामिल किया जाएगा। इसी प्रकार बायोडीजल को B10 से बढ़ाकर B100 तक अपडेट करने का प्रस्ताव है।
रिपोर्टों के अनुसार ऊर्जा आवश्यकताओं में आत्मनिर्भरता लाने के उद्देश्य से 100 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह संभव हो जाता है तो ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा और क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल सकता है।इथेनॉल ब्लेंडिंग का अर्थ है पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना। भारत में वर्तमान पेट्रोल इंजन E20 क्षमता वाले हैं, अर्थात उनमें 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का उपयोग किया जा सकता है। सरकार ने पिछले वर्ष 1 अप्रैल से E20 नीति लागू कर दी थी और वर्तमान में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जा रहा है।अब सरकार इसे बढ़ाकर 85 और फिर 100 प्रतिशत तक ले जाना चाहती है। इसके लिए ऐसे नए इंजन विकसित करने की योजना है जो पूरी तरह इथेनॉल पर काम कर सकें। इसी दिशा में E85 पेट्रोल लॉन्च किया गया है। सरकारी विशेषज्ञों का दावा है कि E20 से E85 क्षमता वाले सभी वाहनों में इसका उपयोग किया जा सकेगा और इससे इंजन को नुकसान भी नहीं होगा।इथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है, जिसे गन्ने, मक्का और चावल से बनाया जाता है। पहले इनसे शर्करा निकाली जाती है, फिर उसमें यीस्ट मिलाया जाता है। यीस्ट शर्करा को इथेनॉल और गैस में परिवर्तित कर देता है। इस प्रक्रिया को फर्मेंटेशन कहा जाता है। इसके बाद मिश्रण का डिस्टिलेशन करके उसमें से पानी अलग किया जाता है। बचा हुआ इथेनॉल ईंधन अथवा अन्य औद्योगिक उपयोगों में काम आता है।भारत इथेनॉल उत्पादन में लगातार नए रिकार्ड बना रहा है।read more:https://khabarentertainment.in/pradhan-installed-an-inverter-for-the-convenience-of-journalists-and-was-honored-by-the-journalists/वर्ष 2014 में देश की उत्पादन क्षमता लगभग 200 करोड़ लीटर थी, जो अब बढ़कर लगभग 1800 से 2000 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है। देश में E20 ब्लेंडिंग अनिवार्य हो चुकी है, जिसके लिए लगभग 1000 करोड़ लीटर इथेनॉल की आवश्यकता होती है।सरकार अगले पांच वर्षों में उत्पादन को पांच गुना बढ़ाने और इसके उपयोग को भी पांच गुना तक ले जाने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए ऑटोमोबाइल उद्योग को फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है तथा नई नीतियां तैयार की जा रही हैं।भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) भी इन ईंधनों के लिए गुणवत्ता मानकों को अंतिम रूप देने की तैयारी में है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार डीज़ल में आइसोब्यूटाइल अल्कोहल तथा वाणिज्यिक एलपीजी में डाइमेथाइल ईथर (DME) के मिश्रण को मंजूरी दे सकती है।सरकार ने वाणिज्यिक उपयोग के लिए DME मिश्रित एलपीजी के मानकों को भी अंतिम रूप दे दिया है। DME प्राकृतिक गैस, कोयला और बायोमास से बनाया जा सकता है। यह फिलहाल घरेलू एलपीजी सिलेंडरों में उपयोग नहीं किया जाएगा, बल्कि होटल, रेस्तरां और उद्योगों जैसे व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए होगा।भारत वर्तमान में अपनी कुल आवश्यकता का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। देश हर वर्ष 200 मिलियन टन से अधिक क्रूड ऑयल आयात करता है। E20 ब्लेंडिंग नीति के कारण पहले ही लगभग 1050 करोड़ लीटर ईंधन की बचत हुई है। यदि भविष्य में देश के कुल वाहनों में से केवल 25 प्रतिशत वाहन भी E100 पर चलने लगें, तो करोड़ों लीटर कच्चे तेल की अतिरिक्त बचत हो सकती है। इससे सरकार को बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा और किसानों को इथेनॉल उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध कराने से नई आय के अवसर प्राप्त होंगे। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इथेनॉल की कीमत पेट्रोल की तुलना में कम होने की संभावना है। इससे आम लोगों को आर्थिक लाभ मिल सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इथेनॉल की माइलेज पेट्रोल से कम होती है। इसलिए समान दूरी तय करने के लिए 25 से 30 प्रतिशत अधिक इथेनॉल की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे वास्तविक लागत का अंतर कम हो सकता है।E85 पेट्रोल को प्रारंभिक चरण में देश के 48 सार्वजनिक क्षेत्र के पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध कराया गया है। इसका उपयोग केवल फ्लेक्स-फ्यूल इंजन वाले वाहनों में ही किया जा सकता है।सरकार की योजना दिसंबर, 2026 तक इसे 500 और दिसंबर, 2027 तक लगभग 5000 पेट्रोल पंपों तक पहुंचाने की है। E85 में 80 से 85 प्रतिशत इथेनॉल और 14 से 19 प्रतिशत पेट्रोल होता है।सरकार के अनुसार इथेनॉल मिश्रण अभियान से अब तक 1.84 लाख करोड़ रुपए से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। मंत्रालय का अनुमान है कि E85 पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पारंपरिक पेट्रोल वाहनों की तुलना में अपने पूरे जीवनकाल में लगभग 61 प्रतिशत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करेंगे।विशेषज्ञों का मानना है कि E85 नीति के बाद जब E100 नीति लागू होगी, तब वाहनों में 100 प्रतिशत इथेनॉल का उपयोग संभव हो सकेगा। इससे भारत की कच्चे तेल और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटेगी तथा ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर भी अधिक होता है, जिससे इंजन का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। इसी कारण इसे कार्बन-न्यूट्रल ईंधन भी कहा जाता है। इसके उपयोग को बढ़ावा देने से प्रदूषण कम करने और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सहायता मिल सकती है।लंबे समय में इंजन को नुकसान पहुंचने की आशंका भी हालांकि इस तकनीक के अनेक लाभ हैं, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं।सबसे बड़ी चुनौती माइलेज की है। इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में 30 से 35 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है। इसलिए वाहनों की माइलेज में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।इसके अलावा लंबे समय तक उपयोग करने पर पुराने वाहनों के इंजन और ईंधन प्रणाली में जंग लगने का खतरा भी हो सकता है। ठंड के मौसम में वाहन स्टार्ट करने में भी कठिनाई आ सकती है। E85 और E100 ईंधन के लिए विशेष प्रकार के इंजन और फ्यूल सिस्टम की आवश्यकता होगी। इसलिए ऑटोमोबाइल कंपनियों को ऐसे फ्लेक्स-फ्यूल वाहन विकसित करने होंगे जो 100 प्रतिशत इथेनॉल पर भी प्रभावी ढंग से चल सकें। कुल मिलाकर, E85 और भविष्य की E100 नीति भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय में वृद्धि और प्रदूषण में कमी जैसे कई लाभ मिल सकते हैं, हालांकि तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियों का समाधान भी उतना ही आवश्यक होगा।

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