नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद से पूर्वजों की धरोहर और ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखने का एक अद्भुत उदाहरण सामने आया है। यहां के बैरिया तहसील के गोंहिया छपरा गांव में बाबा-दादा के समय की दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां और दस्तावेज आज भी पूरी तरह सुरक्षित हैं। इन अमूल्य ऐतिहासिक कड़ियों को देखने और समझने के लिए न सिर्फ स्थानीय लोग, बल्कि बड़े-बड़े शोधकर्ता और इतिहासकार भी लगातार गांव का रुख कर रहे हैं। इस गांव के एक पारंपरिक परिवार में कई महान विद्वान हुए, जिनकी हस्तलिखित रचनाएं आज भी उनकी आने वाली पीढ़ियां अपनी सबसे बड़ी अमानत मानकर सहेज रही हैं। इस घर में अनेक प्राचीन भाषाओं में लिखे गए विविध ग्रंथ सुरक्षित हैं, जो उस दौर के ज्ञान, विज्ञान और विभिन्न विषयों पर आधारित हैं।read more:https://khabarentertainment.in/police-crack-down-on-illegal-mining-seize-loader-loaded-with-soil/प्रख्यात इतिहासकारों का कहना है कि ये पांडुलिपियां, धरोहरें और अभिलेख हमारे देश की वास्तविक बौद्धिक अमानत हैं। इन्हें संरक्षित और सुरक्षित रखना हर नागरिक का परम दायित्व है। किसी भी राष्ट्र के लिए उसका इतिहास बचाना सबसे बड़ा कर्तव्य होता है। उन्होंने बताया कि हमारे देश के पास मौजूद इस ज्ञान के विशाल भंडार को सुरक्षित करने के लिए भारत सरकार द्वारा ज्ञान भारतम्योजना चलाई जा रही है। इस विशेष योजना के पहले चरण के तहत 15 जून तक देशभर में जहां-जहां भी प्राचीन पांडुलिपियां उपलब्ध हैं, उनकी पहचान और चिन्हांकन का कार्य युद्धस्तर पर जारी है। इसी राष्ट्रीय अभियान के अंतर्गत बलिया के गोंहिया छपरा गांव सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर जाकर इन ऐतिहासिक धरोहरों को चिन्हित किया जा रहा है। गोंहिया छपरा गांव में जो हस्तलिखित पांडुलिपियां मिली हैं, वे बेहद खास हैं क्योंकि वे कागज के साथ-साथ हिरण की खाल पर भी लिखी गई हैं। इसके अतिरिक्त बलिया के अन्य कई क्षेत्रों में भोजपत्र, ताड़पत्र और पीपल के पत्तों पर लिखी प्राचीन पांडुलिपियां भी पाई गई हैं। वर्तमान में इन सभी दुर्लभ पांडुलिपियों को डिजिटल रूप देकर सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करने का काम तेजी से चल रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्राचीन धरोहरों को इस तरह संभालकर रखने के मामले में बलिया जिला पूरे देश में प्रथम स्थान पर आ सकता है। गोंहिया छपरा गांव के लोगों ने गर्व से बताया कि उनके घर में ये प्राचीन पांडुलिपियां सदियों से सुरक्षित हैं। ये सभी उनके पूर्वजों द्वारा पूरी तरह हस्तलिखित हैं। इनमें उनके पूर्वजों द्वारा संस्कृत भाषा में लिखे गए विविध दुर्लभ ग्रंथ शामिल हैं। इन पांडुलिपियों को घर में बेहद व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप से रखा गया है ताकि इन्हें कोई नुकसान न पहुंचे। इतिहास और भाषा विज्ञान के क्षेत्र में शोधकार्य करने के लिए देश-दुनिया के विद्वान और शोधार्थी समय-समय पर उनके घर आते रहते हैं, जिससे इस ग्रामीण अंचल की ऐतिहासिक महत्ता लगातार बढ़ रही है।