रायबरेली। “सुरक्षा आपकी, संकल्प हमारा”… यूपी पुलिस का यह नारा सुनने में जितना भरोसेमंद लगता है, सड़क पर उसकी तस्वीर कई बार उतनी ही उलट दिखाई देती है। जनपद में इन दिनों शाम ढलते ही चौराहों पर उतरने वाली खाकी की चालान सेना आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल यह नहीं कि बिना हेलमेट वालों का चालान क्यों हो रहा है, सवाल यह है कि क्या नियम सिर्फ आम आदमी के लिए हैं…? क्या कानून समझाने वाली खाकी खुद कानून के दायरे से बाहर खड़ी है….? जनपद के कई थाना क्षेत्रों सलोन,डलमऊ, ऊंचाहार, महाराजगंज, भदोखर, नगर कोतवाली और पुलिस लाइन क्षेत्र से सामने आई तस्वीरें व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं। सड़क पर हेलमेट चेकिंग के दौरान तमाम पुलिसकर्मी खुद बिना हेलमेट बाइक दौड़ाते दिखाई देते हैं। कहीं मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाते जवान, तो कहीं नियमों को ताक पर रखकर गश्त करती खाकी ऐसी तस्वीरें अब आम होती जा रही हैं। विडंबना देखिए, जिस आम आदमी को रोककर कानून का पाठ पढ़ाया जाता है, उसी के सामने कई बार कानून के रक्षक ही नियमों की धज्जियां उड़ाते दिखते हैं। लगातार समूचे जनपद में चर्चाएं जारी है अगर हेलमेट जीवन बचाने के लिए जरूरी है तो क्या पुलिसकर्मियों का जीवन सुरक्षित नहीं….? अगर नियम तोड़ना अपराध है तो क्या वर्दी अपराध को छूट दे देती है….? ट्रैफिक नियमों की मूल भावना सुरक्षा है,वसूली नहीं,मोटर वाहन अधिनियम का उद्देश्य लोगों को जागरूक करना और सड़क दुर्घटनाओं को रोकना है। नियम यह भी कहते हैं कि पहले लोगों को समझाया जाए, जागरूक किया जाए, उसके बाद चलान की कार्रवाई हो।read more:https://pahaltoday.com/deputy-rmo-inspected-wheat-procurement-and-storage-arrangements-at-kaimganj-mandi/ लेकिन जमीनी हकीकत में कई बार कार्रवाई जागरूकता से ज्यादा टारगेट आधारित दिखाई देती है। जनपद में लगातार यह चर्चा भी गर्म है कि शाम के समय थानों से निकलने वाली टीमों में कई बार चालान काटने का जिम्मा प्रशिक्षित ट्रैफिक अधिकारी या दारोगा नहीं, बल्कि सामान्य सिपाहियों के हाथ में होता है। चर्चाएं यह भी हैं कि कहीं-कहीं व्यक्तिगत रंजिश और दबाव की भावना भी कार्रवाई में झलकती है। मैनेजमेंट में लंका लगने पर खाकी की असंतुष्टी चालान के रूप में दिखती है,हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन जनता के बीच उठती आवाजें पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न जरूर खड़े करती हैं। सबसे बड़ा प्रश्न जवाबदेही का है। सूत्रों की मानें तो कई बार पुलिसकर्मियों के चालान औपचारिकता बनकर रह जाते हैं और बाद में उच्च स्तर से निरस्त भी कर दिए जाते हैं। यदि यह सच है तो फिर आम नागरिक के मन में कानून के प्रति सम्मान कैसे बचेगा….? कानून का भय और भरोसा दोनों समानता से पैदा होते हैं, विशेषाधिकार से नहीं। सड़क पर खड़ी खाकी यदि खुद हेलमेट नहीं लगाएगी तो जनता को सुरक्षा का संदेश कैसे दे पाएगी…..? अपराध रोकने में नाकाम रहने पर सवालों से घिरने वाली व्यवस्था यदि सिर्फ आसान लक्ष्य आम आदमी पर ही सख्ती दिखाएगी, तो फिर “सुरक्षा” और “संकल्प” जैसे शब्द क्या केवल दीवारों तक सीमित होकर नही रह जाएंगे….? जरुरत इस बात की है कि खाकी पहले खुद उदाहरण बने। वर्दी अनुशासन का प्रतीक है, छूट का नहीं। अगर खाकी खुद नियमों का पालन करेगी, तभी जनता भी कानून को मजबूरी नहीं बल्कि जिम्मेदारी समझेगी। वरना चौराहों पर कटते चालान और बिना हेलमेट दौड़ती प्राइवेट व सरकारी बाइकें यही संदेश देती रहेंगी कि कानून की सड़क पर दो लेन चल रही हैं एक जनता के लिए, दूसरी सत्ता और सिस्टम के लिए।