किराए की साँसें

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
वह शहर नहीं, दरअसल एक कसाईखाना था जहाँ इंसानों की नहीं, उनकी भावनाओं की नुमाइश होती थी। दिव्यांशु की कमर टूट चुकी थी, पर वह अब भी मध्यमवर्गीय सपनों की उस फटी हुई गठरी को ढो रहा था जिसकी डोर उसकी गर्दन में फाँसी के फंदे की तरह कसती जा रही थी। उसकी पूरी ज़िंदगी बस दूसरों के अंगूठा दिखाने और अपनों के पैर खींचने के बीच किसी संकरी, अंधेरी गली की तरह घुटकर रह गई थी। दफ्तर में जब बड़े साहब अपनी नाक-भौं सिकोड़ते, तो दिव्यांशु को लगता जैसे उसके आत्मसम्मान को बीच चौराहे नंगा करके उसकी खाल उधेड़ी जा रही हो। उसे समझ आ गया था कि इस पत्थर के शहर में अगर साँस भी लेनी है, तो कान का कच्चा होने से काम नहीं चलेगा, यहाँ तो पत्थर का कलेजा लेकर ही पैदा होना चाहिए था। सुबह की उस फीकी चाय से लेकर रात की रुलाई तक, वह बस अपनी जिम्मेदारियों से जी चुराने की कोशिश करता, पर कमबख्त वक्त किसी जल्लाद की तरह उसकी गर्दन पर सवार रहता।उसके घर की दीवारें भी अब उसे आँखें दिखाने लगी थीं, जैसे पूछ रही हों कि तुम अब तक हार क्यों नहीं गए? पत्नी के अरमानों का बोझ इतना भारी था कि दिव्यांशु के कंधे झुक गए थे, पर उसे समाज के सामने सिर उठाकर चलने का वह खोखला नाटक जारी रखना था। महीने की आखिरी तारीखों में जब उसका बटुआ आखिरी दम तोड़ता, तो उसे अहसास होता कि गरीबी सिर्फ पैसों का न होना नहीं है, बल्कि यह वह हड्डियाँ गला देने वाली ठंड है जो रूह के अंदर तक पैठ जाती है।read more:https://worldtrustednews.in/attempt-to-rape-a-teenager-after-entering-her-house-case-registered-police-engaged-in-investigation/ उसने अपनों को ऐन मुश्किल के वक्त पीठ दिखाते देखा था और जिन्हें वह कलेजे का टुकड़ा समझता था, उन्हें अपनी आँखों में धूल झोंकते भी। रिश्तों की इस भीड़भरी मंडी में हर कोई बस हाथ साफ करने के मौके ढूंढ रहा था, और वह बेचारा अपनी जुबान की लगाम थामे, लहूलुहान होकर बस यह देखता रहा कि कैसे उसकी उम्मीदों के पैर उखड़ रहे हैं।एक शाम जब वह पूरी तरह टूटकर घर लौटा, तो आईने ने भी उसे अंगूठा दिखा दिया। आईने में खड़ा वह शख्स वह दिव्यांशु नहीं था, जिसे उसकी माँ ने चूमकर विदा किया था; वह तो उन अनगिनत मुहावरों का एक बदरंग ढेर था जो समाज ने उस पर थूक दिए थे। उसकी आँखें पथरा गई थीं और दिल पसीजना तो जैसे सदियों पुरानी कोई भूली-बिसरी बात हो गई थी। उसने सोचा था कि वह इस शहर को अपनी बाँहों में भर लेगा, इसे हाथों-हाथ लेगा, पर शहर ने उसे दाँतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। उसकी ईमानदारी पर जब राह चलते लोगों ने कीचड़ उछाला, तो उसने पलटकर जवाब देने के बजाय अपने ही खून का घूँट पीना ज्यादा आसान समझा। उसे लगा कि शायद उसकी नियति ही यही है—या तो ताकतवर के तलवे चाटना या फिर अपनी ही नसों में दौड़ते उस जहर को अमृत समझकर पी जाना जिसे दुनिया ‘समझौता’ कहती है। दुख तब सबसे ज्यादा जहरीला हो जाता है जब वह हृदय विदीर्ण करने के बजाय उसे पूरी तरह सुन्न कर दे। दिव्यांशु ने देखा कि इस दुनिया में जिनकी पाँचों उंगलियाँ घी में हैं, असल में वही सबसे ज्यादा गला-काट दरिंदे हैं। वह बेवकूफ अपनी कोहनी मार-मार कर जगह बनाने की कोशिश में खुद ही लहूलुहान हो चुका था। उसकी मासूमियत के कान उमेठे गए और उसके स्वाभिमान के दाँत खट्टे कर दिए गए। हर छोटी-सी खुशी की भीख माँगने के लिए उसे दुनिया के सामने नाक रगड़नी पड़ती थी, मानो इस धरती पर साँस लेना भी उस पर कोई बहुत बड़ा अहसान हो। यह दुनिया उन भेड़ियों की थी जो मुँह में राम और बगल में छुरी छिपाकर चलते थे, और एक वह पागल था जो अपनी नंगी हथेली पर जान लिए गलियों में न्याय माँगता फिरता रहा। जब उसकी साँसें उखड़ने लगीं और वह बिस्तर से लग गया, तो उसे समझ आया कि मरने के बाद भी यह समाज उसे चैन से नहीं छोड़ेगा—वे उसे कंधा देने का अहसान भी उसकी लाश पर जताएँगे। उसकी पूरी उम्र लोहे के चने चबाने में बीत गई, पर आखिरी वक्त में स्वाद के नाम पर सिर्फ चिता की कड़वी राख नसीब हुई। वह एक ऐसा मोहरा था जिसकी जीभ पहले ही काट ली गई थी ताकि वह अपनी पीड़ा की चीख न निकाल सके, और जिसकी आँखें फोड़ दी गई थीं ताकि वह हकीकत का नंगापन न देख सके। जब उसकी चिता की आग ठंडी हुई, तो वहाँ तमाशा देखने आए लोग अपनी बगलें झाँक रहे थे, क्योंकि वे सब जानते थे कि अगला नंबर उन्हीं की बारी का है। यह कोई व्यंग्य नहीं था, यह उस हाड़-माँस के पुतले का मर्सिया था जिसे जीते जी मिट्टी में मिला दिया गया और मरने के बाद महफिलों में सिर-आँखों पर बिठाने का घिनौना ढोंग रचा गया।

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