ललितपुर- बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र, ललितपुर के प्रभारी डॉ. अनुज कुमार गौतम और केन्द्रीय कृषि वानिकीय अनुसंधान संस्थान, झांसी के डॉ. आर. पी. द्विवेदी, प्रधान वैज्ञानिक (कृषि प्रसार) के नेतृत्व और संयुक्त रूप में फसलों में उर्वरकों के संतुलित प्रयोग विषय पर विशेष जागरूकता अभियान के आयोजन विकासखंड- जखौरा के ग्राम बम्हौरीकला में किया गया। केन्द्रीय कृषि वानिकीय अनुसंधान संस्थान, झांसी के डॉ. आर. पी. द्विवेदी, प्रधान वैज्ञानिक (कृषि प्रसार) द्वारा कृषकों को आह्वान किया कि हर किसान अपने खेत की मिट्टी की जांच करायें एवं जांच के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करें। जिस प्रकार हमारे भोजन की थाली में सभी तत्वों का संतुलन आवश्यक है उसी प्रकार पौधों के भोजन में सभी तत्वों का संतुलन आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक उर्वरकों के प्रयोग से खेती की लागत बढ़ती है। मृदा की उर्वरता स्तर में गिरावट आती है। मृदा में पौधों के लिए आवश्यक सभी 17 पोषक तत्वों जैसे नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि की संतुलित मात्रा आवश्यकता होती है।read more:https://pahaltoday.com/oil-has-run-out-over-400-petrol-pumps-in-andhra-pradesh-shut-down/
डॉ. दिनेश तिवारी, विषय वस्तु विशेषज्ञ-सस्य विज्ञान/ नोडल अधिकारी (जागरूकता कार्यक्रम) ने तकनीकी जानकारी बताया कि जिला ललितपुर के कृषक गत वर्ष (जनवरी से दिसंबर 2025) आवश्यकता से अधिक डीएपी/टीएसपी/एमएपी का 30073 मीट्रिक टन प्रयोग किया था। मृदा में यूरिया और डीएपी की आवश्यकता से अधिक और असंतुलित प्रयोग से मृदा में पोषक तत्वों का असंतुलन, मृदा उर्वरता में क्षीणता और उर्वरक उपयोग शमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कृषक बंधु यूरिया और डीएपी की असंतुलित प्रयोग की अपेक्षा मृदा परीक्षण, फसल की आवश्यकता और वैज्ञानिक संस्तुत के आधार पर एनपीके कॉम्प्लेक्स और एसएसपी उर्वरक का संतुलित प्रयोग कर अधिक लाभ उठा सकते हैं। कृषक बंधु हरी खाद (ढैंचा), जैव उर्वरक (राइजोबियम, पीएसबी), गोबर की सड़ी खाद, केंचुआ खाद, नाडेप खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रयोग से भी अच्छी उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। कृषक बंधु पौधों को दिये जाने वाले उर्वरकों का पौधों में क्या कार्य है, इसकी जानकारी पहले करें एवं उर्वरकों का प्रयोग सही मात्रा में सही समय पर और सही तरीके से ही करें। जिससे उनके धन का उचित उपयोग होगा और मिट्टी की उर्वरता के साथ वातावरण व मिट्टी का पर्यावरण भी स्वास्थ्य रहेगा। इस अवसर पर कृषकों को पशुओं के गोबर, मूत्र, बिछावन और चारा अवशेष से गुणवत्तायुक्त खाद बनाकर खेत में डालने के लिए जागरूक किया गया। जैविक खेती और प्राकृतिक खेती करने के लिए भी प्रेरित किया गया। जागरूकता कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र के डॉ. सरिता देवी, विषय वस्तु विशेषज्ञ- गृह विज्ञान और केन्द्रीय कृषि वानिकीय अनुसंधान संस्थान, झांसी के वैज्ञानिकों ने भी कृषकों को फसलों, कृषि वानिकी फसलों, फल और सब्जियों में संतुलित उर्वरकों के प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में बम्हौरीकला के श्री राम चरण, मनोज, करन, श्रीमती लक्ष्मी देवी, श्रीमती कस्तूरी बाई सहित 30 से अधिक प्रगतिशील कृषक/ महिला कृषकों ने प्रतिभाग किया।