चेन्नई। तमिलनाडु में चुनावी माहौल के बीच राजनीति का रंग अब दिलचस्प मोड़ लेता दिख रहा है। यहां पारंपरिक मुद्दों के साथ-साथ ‘अभिनेता बनाम खलनायक’ की सियासत भी चरम पर पहुंच गई है। सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) और विपक्षी अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) अपने-अपने नेताओं की व्यक्तिगत छवि को जनता के बीच मजबूत करने के लिए अलग-अलग रणनीति अपना रहे हैं। द्रमुक अपने नेता और मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन को विकास और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। पार्टी के प्रचार में स्टालिन को एक ऐसे नेता के तौर पर दिखाया जा रहा है, जो महिला कल्याण, शिक्षा और क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।read more:https://khabarentertainment.in/emphasis-was-laid-on-increasing-the-participation-of-women-in-the-assembly-level-conference/ सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी छवि को केंद्र में रखकर मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश हो रही है। वहीं दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक अपने नेता एडप्पाडी के. पलानीस्वामी को ‘जननायक’ और मजबूत प्रशासक के रूप में प्रस्तुत कर रही है। पार्टी का दावा है कि वह राज्य में बेहतर शासन और विकास का विकल्प पेश कर रही है। साथ ही, द्रमुक पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए छवि आधारित राजनीति कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु की राजनीति में यह कोई नई रणनीति नहीं है। राज्य में लंबे समय से नेताओं को ‘हीरो’ और विरोधियों को ‘विलेन’ के रूप में पेश करने की परंपरा रही है, जो यहां की फिल्म संस्कृति से भी प्रभावित है। यही कारण है कि चुनावी मुकाबला केवल नीतियों और वादों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह जनभावनाओं और छवि निर्माण की जंग भी बन जाता है। इस बार के चुनाव में भी यही रुझान देखने को मिल रहा है, जहां दोनों प्रमुख दल अपने-अपने नेताओं को सकारात्मक रूप में पेश करते हुए विरोधियों की छवि को कमजोर करने में जुटे हैं। ऐसे में यह चुनाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जनधारणा और व्यक्तित्व की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है।