वहम का भंवर

वीरेंद्र बहादुर सिंह –“बड़ी बहन, एक काम करना पड़ेगा।” मीता की धीमी आवाज में आग्रह भरी विनती थी। बहुत सोचविचार और मनमंथन के बाद उसने अपनी जेठानी सुधा को फोन करने का फैसला किया था। उसे भरोसा था कि सामने से सुधा पूरी सहानुभूति के साथ उसकी बात सुनेगी, इसलिए उसने आगे कहा, “अभी मसालों का सीजन है, आपके पास समय की कमी होगी, यह मैं समझती हूं। फिर भी मेरे लिए समय निकालकर शांति से एक-दो घंटे बैठने के लिए घर आ जाइए। फोन पर बात नहीं हो सकती।”मीता की उम्र लगभग छब्बीस साल थी। दो साल पहले ही उसकी शादी मनोज से हुई थी। मनोज का बड़ा भाई सुधीर उससे पांच साल बड़ा था। सुधीर की पत्नी सुधा भी मीता से चार साल बड़ी थी। सुधा बहुत समझदार थी। देवरानी-जेठानी होने के बावजूद मीता और सुधा के बीच सगी बहनों जैसा संबंध था। दोनों एक-दूसरे का सुख-दुख में साथ देती थीं।हालांकि मीता और मनोज चांदलोडिया में रहते थे, जबकि सुधा और सुधीर ईसनपुर में। दोनों घरों के बीच दूरी काफी थी, फिर भी जरूरत पड़ने पर बिना दूरी की परवाह किए दौड़कर आ जाने वाला भावनात्मक रिश्ता था।मीता की बात सुनकर सुधा ने तुरंत कहा, “मसालों का सीजन है, यह ठीक है, लेकिन तुझे काम है तो मुझे सब छोड़कर आना ही पड़ेगा। एक काम कर, दिन में आना मुश्किल होगा, मैं कल रात आठ बजे तेरे घर आ जाऊंगी, ठीक है?”“नहीं, ऐसा मत कीजिए।” मीता जैसे घबरा गई, “बड़ी बहन, बात ऐसी है कि फोन पर नहीं हो सकती और घर में आपके देवर की मौजूदगी में भी नहीं करनी है। आपको दिन में ही, जब वे घर पर न हों, तब आना होगा। मैं बहुत उलझन में हूं, कुछ समझ नहीं आ रहा है। आपको आकर ही मुझे इस मुसीबत से निकालना होगा।”मीता बहुत भोली और सीधी थी, यह सुधा जानती थी। देवर की गैरमौजूदगी में ऐसी क्या बात होगी, यह सोचकर वह भी हैरान थी। उसने कहा, “तू बिलकुल चिंता मत कर। मैं हूं ना। कल दोपहर डेढ़-दो बजे तेरे पास आ जाऊंगी।”read more:https://pahaltoday.com/prerna-yatra-organized-on-mangal-pandey-martyrdom-day-and-bankim-chandra-chattopadhyays-death-anniversary/ “आप मेरे साथ हैं, तो अब कोई चिंता नहीं है।” मीता ने राहत भरी आवाज में कहा।अगले दिन दोपहर को सुधा मीता के घर पहुंची। मीता उसी की राह देख रही थी। उसके आते ही रोते हुए बोली, “बड़ी बहन, आप आ गईं, बहुत अच्छा किया। मैं अकेली बहुत हलकान हो रही थी।”सुधा ने उसे गले लगाकर ढांढस बंधाया, “मैं आ गई हूं, अब सब ठीक हो जाएगा। पहले तू नींबू का शरबत बना ला, फिर आराम से बात करेंगे।”“शरबत नहीं बड़ी बहन, मुझे तो जहर पीने का मन होता है।” मीता फिर रो पड़ी। “पहले शरबत बना।” सुधा ने प्यार से कहा।शरबत पीने के बाद सुधा ने पूछा, “अब बता, क्या परेशानी है?”मीता बोली, “पहले वह रोज शाम सात बजे घर आ जाते थे। मुझसे हंसते-बोलते थे। लेकिन पिछले तीन महीने से सब बदल गया है। कहते हैं कि आफिस में काम बहुत बढ़ गया है, इसलिए देर से आते हैं। रात साढ़े ग्यारह-बारह बजे आते हैं। मुझसे ठीक से बात भी नहीं करते।”सुधा ने समझाया, “ऐसा काम की वजह से भी हो सकता है।”“नहीं बड़ी बहन, असली बात तो अभी बताई ही नहीं।” मीता बोली।“दो दिन पहले मैंने उनके आफिस फोन किया। रात आठ बजे कोई फोन नहीं उठा रहा था। फिर अगले दिन मैंने चालाकी से पूछा तो पता चला कि आफिस तो शाम साढ़े छह बजे ही बंद हो जाता है, तो फिर वह रात बारह बजे तक कहां रहते हैं?”मीता की आवाज कांप गई, “उनके साथ आफिस में सुंदर लड़कियां काम करती हैं। वह दिखने में भी बहुत अच्छे हैं। मुझे पूरा शक है कि वह किसी के चक्कर में फंस गए हैं।”सुधा भी सोच में पड़ गई, लेकिन उसने मीता को समझाया, “तू कुछ मत पूछ। मैं तेरे जेठ से बात करती हूं, वह सच्चाई पता करेंगे।”तीन दिन बाद सुधा और सुधीर मीता को साथ लेकर एक जगह गए। वहां से उन्होंने एक फुटपाथ की होटल की तरफ इशारा किया, “मीता, ध्यान से देख। वहां बैठा हुआ मनोज तीस रुपए की थाली खा रहा है।”मीता हैरान रह गई।सुधीर ने कहा, “अपने मन की सारी शंका निकाल दे। तेरा पति बहुत नेक इंसान है। उसने दूसरी नौकरी शुरू कर दी है, शाम साढ़े सात से रात साढ़े ग्यारह बजे तक, ताकि कमाई बढ़े और तू अच्छे से जी सके। वह आफिस में किसी को बताना नहीं चाहता, इसलिए तुझसे भी छुपाया। उसे डर था कि तू गलती से किसी से कह न दे।”“कोई अफेयर नहीं, कोई बुरी आदत नहीं, सिर्फ मेहनत और त्याग है।”मीता की आंखों से आंसू बह निकले। अब उसका मन साफ हो चुका था और पति के प्रति सम्मान और प्रेम से भर गया था।

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