लखनऊ : केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर के बौद्ध दर्शन विद्याशाखा तथा पालि अध्ययन एवं अनुसन्धान केन्द्र द्वारा भारतीय ज्ञानपरम्परा के महान यायावर, लेखक और बौद्ध चिन्तक *महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की जयन्ती* अत्यन्त श्रद्धा और उत्साह के साथ मनायी गयी। कार्यक्रम का आरम्भ तथागत भगवान् बुद्ध की प्रतिमा के समीप दीप प्रज्वलन एवं त्रिरत्न वन्दना से हुआ; जिसने वातावरण को शान्त, आध्यात्मिक और प्रेरणास्पद बना दिया।कार्यक्रम में विद्याशाखा के अध्यक्ष एवं परिसर के सह-निदेशक प्रो. गुरुचरण सिंह नेगी, सहाचार्य एवं संयोजक डा. प्रफुल्ल गड़पाल, सहायकाचार्य डा. कृष्णा कुमारी, डा. प्रदीप कुमार द्विवेदी, डा. जयवंत खंडारे तथा डा. प्रियंका त्रिपाठी ने तथागत भगवान् बुद्ध की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर पूजा-वन्दना की। कार्यक्रम का संचालन सुगत विद्या परिषद् द्वारा सुव्यवस्थित ढंग से किया गया तथा स्वागत भाषण समय सिंह ने दिया।मुख्य प्रस्तुति में एम.ए. पालि प्रथम वर्ष के छात्र श्री राम निहोरे ने महापण्डित राहुल सांकृत्यायन के जीवन, कर्म एवं बहुआयामी योगदान का गहन विवेचन किया। उन्होंने उनके समाज सुधारक दृष्टिकोण, बौद्ध धर्म की ओर उनके झुकाव, तथा पालि-संस्कृत ग्रंथों के अन्वेषण में उनकी यात्रा-परम्परा को विस्तार से बताया। अध्येताओं रामजीत सिंह और सुश्री सोनिका ने संयुक्त रूप से राहुल जी के द्वारा भारतीय ज्ञान की पुनर्प्राप्ति, ग्रंथों के संरक्षण, तथा तिब्बती प्रदेशों से की गई दुर्लभ पांडुलिपियों के संकलन को विशेष रूप से रेखांकित किया।read more:https://pahaltoday.com/road-development-in-farrukhabad-gains-momentum-comprehensive-review-of-action-plan-for-2026-27/
इसके पश्चात डा. प्रियंका त्रिपाठी, डा. प्रदीप कुमार द्विवेदी और डा. कृष्णा कुमारी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम के संयोजक डा. प्रफुल्ल गड़पाल ने कहा, “महापण्डित राहुल सांकृत्यायन के कार्यों का दस्तावेजीकरण (Documentation) अत्यन्त आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय विद्याओं के लिए उनके ऐतिहासिक योगदान को जान सकें।” उन्होंने इस अवसर पर राहुल सांकृत्यायन पर तथा अन्य महान विद्वानों के जीवन पर मोनोग्राफ लिखने की अपनी आगामी योजना भी साझा की।कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. गुरुचरण सिंह नेगी ने अपने प्रेरक वक्तव्य में कहा कि महापण्डित राहुल सांकृत्यायन जी द्वारा भारत एवं हिमालय क्षेत्र में सम्पन्न पांडुलिपियों के संकलन का कार्य अमूल्य है। उन्होंने उनकी हिमालय एवं तिब्बत यात्राओं के प्रसंगों को सजीव करते हुए बताया कि प्राचीन भारतीय ज्ञान को पुनः एकत्र करने में उनकी भूमिका विश्व-सांस्कृतिक इतिहास में अद्वितीय है। प्रो. नेगी ने संस्कृत, पालि, प्राकृत और भोटी जैसी प्राच्य भाषाओं के संरक्षण एवं प्रोत्साहन का आह्वान करते हुए कहा कि “इन भाषाओं के अध्ययन से हमें अपने बीते वैभव और सांस्कृतिक चेतना की अनुभूति होती है।”कार्यक्रम का सफल संचालन एम.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा सुश्री संध्या ने अत्यन्त सुचारु रूप में किया। अन्त में उपस्थित शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की स्मृति में बुद्ध-वन्दना तथा मंगल मैत्री के साथ कार्यक्रम का भावपूर्ण समापन किया।