लखनऊ। विश्व वैदिक सनातन न्यास के द्वारा संगोष्ठी श्रृंखला शुरु किया गया, जहां एक से बढ़कर विद्वानों ने वैदिक काल गणना एवं नंव-संवत्सर पर अपने विचार प्रस्तुत किए। नव संवत्सर, जो ‘रौद्र’ नामक संवत्सर के रूप में प्रारंभ हुआ है, उसकी वैदिक गणना यह संकेत देती है कि जो भी व्यक्ति आवेश में आकर विवेक शून्य होगा, उसका कल्याण संभव नहीं होगा। यह बात स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती ने संगोष्ठी में अपने संबोधन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि भारतवर्ष यदि अपनी प्राचीन वैदिक परंपराओं और सनातन धर्म की वैज्ञानिक गणना के अनुसार चलता रहा, तो वह न केवल स्वयं संरक्षित होगा बल्कि समस्त विश्व के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि वैदिक कालगणना केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह अत्यंत वैज्ञानिक और सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित व्यवस्था है। इसमें ग्रहों, नक्षत्रों और समय चक्र की सटीक गणना के आधार पर भविष्य की परिस्थितियों का संकेत मिलता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भारत को बाहरी चुनौतियों से कम और देश के भीतर ही रहने वाले उन तत्वों से अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है जो समाज में भ्रम और विभाजन पैदा करने का प्रयास करते हैं।संगोष्ठी का प्रारंभ आदि जगतगुरु शंकराचार्य के चित्र पर माल्यार्पण और स्वस्तिवाचन के साथ हुआ। कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों और अतिथियों का स्वागत विश्व वैदिक सनातन न्यास के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रबन्ध सम्पादक सम्पत्र भारत डॉ. सन्तोष सिंह ने किया। उन्होंने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि भारत की प्राचीन वैदिक परंपरा और कालगणना पद्धति विश्व की सबसे प्राचीन और सटीक वैज्ञानिक परंपराओं में से एक है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स ‘गोष्ठी श्रृंखला लगातार विभिन्न विषयों पर चलती रहेगी।इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में परमहंस गोस्वामी प्रह्लाद गिरी ने सहजतापूर्वक जनमानस के लिए वैदिककाल गणना किस तरह से और कितनी आवश्य है, विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि हमारी संस्कृति को विघटित करके उसका गलत स्वरूप जनमानस के समक्ष उपस्थित किया गया।श्रीमनारायण दण्डी स्वामी ने उक्त विषय पर बताया कि हमारा जन-मानस आज की अपेक्षा पहले बहुत ही चैतन्य और चौकन्ना था। आज का शिक्षित वर्ग संस्कार विहीन शिक्षा को प्राप्त कर शास्त्रो का अध्ययन छोड़कर पाश्चात्य व्यवस्थाओं पर आधारित होते जा रहे हैं। आचार्य विजय शंकर त्रिपाठी ने वैदिक काल गणना की मूल भूत सिद्धान्तों को भविष्य के लिए कितना आवश्यक है विषय कर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने सूक्ष्मता से साथ सहज भाव से सबको समझाने का प्रयास किया। आचार्य आदित्य राज पाठक जिन्होंने विज्ञान विषय पर शिक्षा प्राप्त क्ररने के बाद भी वैदिक गणित को पढ़ा ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न भागों में जाकर जिज्ञासुओं को प्रशिक्षित करते हैं। उन्होंने भी वैदिक काल गणना एवं नव संवत्सर पर अपना शोध प्रस्तुत किया।
डॉ. शम्भूनाथ शास्त्री, डॉ. बद्रीविशाल ने भी अपने शोधपरक सम्बोधन से जनमानस को वैदिक गणना एवं नव संवत्सर पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
वक्ताओं ने बताया कि वैदिक पंचांग में वर्षों पहले और वर्षों बाद तक की घटनाओं और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति की सटीक गणना लिखी जाती है। यही कारण है कि भारतीय ज्योतिष और कालगणना पद्धति हजारों वर्षों से विश्व में अपनी वैज्ञानिकता के लिए जानी जाती है। उन्होंने कहा कि यदि समाज अपने जीवन में पंचांग और वैदिक समय गणना को अपनाए, तो जीवन के अनेक निर्णय अधिक व्यवस्थित और शुभ परिणाम देने वाले हो सकते हैं।