ललितपुर-सागर मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव ईसुरवारा है यहां रहने वाले श्री रूपचंद जैन और श्री मती शांति देवी के यहां 21 अगस्त 1958 को एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ माता-पिता ने बड़े ही प्यार से उसका नाम जयकुमार रखा समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा, जय कुमार बड़े हुए स्कूल जाने लगे उन्होंने बीकॉम तक की शिक्षा हासिल तो की, मगर उनका मन सांसारिक कार्यों में कहां लगता था उनकी बचपन से ही धार्मिक कार्यों में रुचि थी20 बर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया वह वर्ष था 1978, खास बात यह है की जय कुमार से परम सागर और परम सागर से सुधा सागर महाराज बनने तक का उनका यह सफर प्रारंभ तो सागर के ही एक छोटे से गांव से शुरू हुआ था लेकिन वर्तमान में सुधा सागर महाराज के न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी हजारों-लाखों अनुयाई है उन्हें ना केवल एक जैन संत बल्कि समाज सुधारक, धर्म प्रवर्तक, करुणा के प्रतीक के सबसे बड़े आधार स्तंभ के रूप में माना जाता है अगर मुनि श्री सुधासगर महाराज के बारे में कहा जाये कि यह सिर्फ जैन संत नहीं अपितु जन-जन के संत हैं तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी25 सितंबर 1983 को वह दिन भी आया जब वे सांसारिक मोह से मुक्त होकर वैराग्य का मार्ग चुनने के लिए निकल पड़े यह क्षण उनके परिवार और गांव के लिए अत्यंत भावुक था जब मुनिश्री ने दीक्षा लेने का निश्चय किया, तब पूरा गांव आंसुओं में डूब गया उनकी माता रोते हुए मुनिश्री को रोकने का प्रयास कर रही थीं, और उनके पिता की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे, परंतु उनके हृदय की व्यथा को कोई रोक नहीं सका गांव के लोग और उनके प्रियजन उनके साथ चल पड़े, लेकिन वैराग्य के मार्ग पर बढ़े मुनिश्री को किसी ने रोकने की हिम्मत नहीं की मुनिश्री का यह अटल संकल्प उनकी आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ था जिसने आगे चलकर लाखों लोगों का जीवन परिवर्तित किया बता दें कि जय कुमार से सुधा सागर तक आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने 25 सितंबर 1983 को अश्विन कृष्ण तृतीया को ईसरी बाजार गिरिडीह झारखंड में मुनिदीक्षा कराई थी मुनि दीक्षा के बाद वे सुधा सागर कहलाए इससे पहले आचार्यश्री ने छतरपुर जिले के नैनागिरी में क्षुल्लक दीक्षा 10 जनवरी 1980 में दी थी क्षुल्लक दीक्षा के बाद नाम परम सागर दिया गया मुनि दीक्षा के बाद परमसागर सुधासागर बन गये, जप , तप, त्याग एवं वैराग्य साधना के चार दशक सुधा सागर महाराज पूरे कर चुके हैं अपनी इस तपस्या के दौरान उन्होंने देश भर के कई राज्यों में घूम कर धर्म की अलख जगाई है कई राज्यों में उनके चातुर्मास हुए, देश में कई मंदिरों का निर्माण, जीणोद्धार एवं पंचकल्याणक कराये साथ ही आप निर्यापक मुनि, मुनि पुंगव और तीर्थ चक्रवर्ती जैसी उपाधियों से सुशोभित हैंआपके बारे में बहुत ही खास बात यह है कि आपके प्रवचनों को एवं विश्व प्रसिद्ध आपके द्वारा किया जा रहा जिज्ञासाओं का समाधान जिसे-जिज्ञासा समाधान के नाम से जाना जाता है उसे आपके भक्तों के अलावा आपके विरोधी ज्यादा सुनना पसंद करते हैं
अंत में इतना ही कहूंगा कि–
संतो के चरण कमल से,पथ पावन हो जाते हैं
जहां विराजत सुधा सागर, वहां मंदिर बन जाते हैं