इजरायल- ईरान का छद्म युद्ध से क्या पश्चिम एशिया में बढ़ेगा तनाव?

सौरभ वाष्र्णेय

पश्चिम एशिया लंबे समय से अस्थिरता का केंद्र रहा है, और इस अस्थिरता की एक प्रमुख धुरी है इजरायल और ईरान के बीच चल रहा छद्म युद्ध। यह टकराव प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय परोक्ष हमलों, साइबर हमलों, खुफिया अभियानों और क्षेत्रीय संगठनों के माध्यम से लड़ा जाता रहा है। अब आशंका जताई जा रही है कि यह छद्म संघर्ष खुली सैन्य भिड़ंत का रूप ले सकता है, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव भड़क सकता है। दोनों देशों के बीच सीधे युद्ध भले ही कम देखने को मिला हो, लेकिन विभिन्न मोर्चों पर अप्रत्यक्ष टकराव लगातार जारी रहा है। यही कारण है कि क्षेत्र में किसी भी छोटी घटना के बड़े संघर्ष में बदलने की आशंका बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव और बढ़ता है तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ सकता है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों का केंद्र है। इसलिए किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

दरअसल, इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है। वहीं ईरान भी इजरायल की नीतियों और पश्चिमी देशों के साथ उसके गठजोड़ की खुलकर आलोचना करता रहा है। इस वैचारिक और सामरिक टकराव ने दोनों देशों के रिश्तों को लगातार तनावपूर्ण बनाए रखा है।

ईरान और इजरायल के बीच वैचारिक और रणनीतिक मतभेद गहरे हैं। इजरायल जहां ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है, वहीं ईरान इजरायल की क्षेत्रीय नीतियों का विरोध करता है। सीरिया, लेबनान और गाजा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का प्रभाव टकराता रहा है। लेबनान में सक्रिय हिज़्बुल्लाह और गाजा में हमास जैसे संगठनों को लेकर इजरायल और ईरान के बीच आरोप-प्रत्यारोप और हमलों का सिलसिला चलता रहा है।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच साइबर हमलों, ड्रोन हमलों और गुप्त अभियानों की खबरें सामने आती रही हैं। हालांकि दोनों पक्ष अक्सर प्रत्यक्ष जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करते, लेकिन क्षेत्रीय विशेषज्ञ इसे “शैडो वॉर” यानी छद्म युद्ध की संज्ञा देते हैं।

यदि यह संघर्ष खुलकर सामने आता है तो इसका प्रभाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। किसी भी बड़े सैन्य टकराव से तेल की कीमतों में उछाल, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संकट पैदा हो सकता है। इसके अलावा अमेरिका और अन्य वैश्विक शक्तियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाएगी, जिससे संघर्ष का दायरा और व्यापक हो सकता है।

ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता संयम और संवाद की है। क्षेत्र पहले ही सीरिया, यमन और गाजा जैसे संघर्षों से प्रभावित है। एक और बड़े युद्ध की संभावना पूरे क्षेत्र को दीर्घकालिक अस्थिरता की ओर धकेल सकती है।

इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी छद्म युद्ध यदि भड़कता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा पड़ेगा। कूटनीतिक प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के जरिए ही इस संभावित संकट को टाला जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था भी हो सकती है प्रभावित

आज की परस्पर जुड़ी हुई दुनिया में किसी एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट केवल स्थानीय नहीं रहता, बल्कि उसका असर अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था तक फैल जाता है। वैश्विक राजनीति, व्यापार और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बढ़ते तनाव के बीच यह आशंका और भी प्रबल हो गई है कि यदि बड़े देशों के बीच टकराव या आर्थिक प्रतिबंधों की स्थिति बनती है तो उसका प्रभाव पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा ढांचे पर पड़ सकता है।

हाल के वर्षों में विश्व ने कई उदाहरण देखे हैं। जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा, खाद्यान्न और आपूर्ति श्रृंखला को गंभीर रूप से प्रभावित किया। यूरोप में गैस संकट गहराया और दुनिया भर में महंगाई बढ़ी। इसी तरह पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल की कीमतों को अस्थिर बना दिया, जिससे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब आपूर्ति श्रृंखलाओं और तकनीकी सहयोग पर निर्भर है। यदि बड़े देशों के बीच व्यापारिक प्रतिबंध या आर्थिक प्रतिस्पर्धा तेज होती है, जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच देखने को मिलता है, तो इसका असर पूरी दुनिया के बाजारों पर पड़ता है। चिप निर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, और डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी वैश्विक आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

इसके साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था भी प्रभावित होती है। जब देशों के बीच अविश्वास बढ़ता है तो सैन्य खर्च बढऩे लगता है और कूटनीतिक संवाद कमजोर पड़ जाता है। कई देश अपने-अपने सैन्य गठबंधनों को मजबूत करने लगते हैं, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव आता है। यह स्थिति लंबे समय में शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।

ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बहुपक्षीय संवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। संयुक्त प्रयासों से ही आर्थिक स्थिरता बनाए रखी जा सकती है और सुरक्षा संबंधी तनाव को कम किया जा सकता है। दुनिया के बड़े देशों को यह समझना होगा कि प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग ही स्थायी विकास और वैश्विक शांति का आधार बन सकता है।

स्पष्ट है कि यदि वैश्विक तनाव बढ़ता है तो उसका प्रभाव केवल राजनीतिक या सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था दोनों पर दूरगामी असर पड़ सकता है। इसलिए संतुलित कूटनीति, आर्थिक सहयोग और पारदर्शी संवाद ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है समाचार पत्र व पत्रिकाओं में समसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक है।(

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