यूपी में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एआई का विस्तार

अशोक कुमार मिश्र
स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, किफायती और सटीक बनाने के उद्देश्य से एआई आधारित परियोजनाओं का यूपी में तेजी से विस्तार किया जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकार, निजी अस्पताल समूह तथा तकनीकी संस्थान मिलकर ऐसी स्वास्थ्य प्रणालियां विकसित कर रहे हैं, जो रोगों की शीघ्र पहचान, बेहतर उपचार योजना और दूरस्थ क्षेत्रों तक चिकित्सकीय सुविधा पहुंचाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं।
पिछले दिनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधिमंडल ने इस विषय में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में टेक कंपनी इनोप्लेक्सेस एंड पार्टेक्स के सीईओ डॉ. गुंजन भारद्वाज से महत्वपूर्ण मुलाकात की। इस दौरान स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी, डेटा सेंटर और एआई-आधारित समाधानों के क्षेत्र में उन्नत सहयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। डॉ. गुंजन भारद्वाज ने भारत में अपने संचालन विस्तार की योजनाएं साझा करते हुए बताया कि उत्तर प्रदेश में डेटा सेंटर स्थापित करने की तैयारी है। साथ ही गोपनीयता-अनुपालन वाले स्वास्थ्य डेटा प्लेटफॉर्म विकसित करने और गोरखपुर, वाराणसी, लखनऊ व प्रयागराज में एआई-आधारित स्वास्थ्य परियोजनाओं का पायलट संचालन प्रस्तावित है। बैठक में कंप्यूटर सेंटर स्थापित करने, जीसीसी संचालन को मजबूत करने तथा चिकित्सा शिक्षा में एआई के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी सहमति बनी। प्रतिनिधिमंडल और डॉ. भारद्वाज के बीच कड़े डेटा गोपनीयता मानकों, डेटा स्थानीयकरण और सुशासन सुनिश्चित करते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी को डेटा-आधारित बनाने पर विशेष जोर दिया गया। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत देशभर में डिजिटल हेल्थ आईडी और इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड को बढ़ावा दिया जा रहा है। एआई तकनीक इन डिजिटल रिकॉर्ड्स का विश्लेषण कर रोगी के स्वास्थ्य इतिहास के आधार पर संभावित बीमारियों का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम हो रही है। इससे चिकित्सकों को त्वरित और सटीक निर्णय लेने में सहायता मिलती है।एमआरआई, सीटी-स्कैन और एक्स-रे जैसी इमेजिंग रिपोर्टों को पढ़ने में एआई एल्गोरिद्म की भूमिका महत्वपूर्ण बनती जा रही है। कई प्रमुख संस्थानों जैसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में एआई आधारित सॉफ्टवेयर का उपयोग कैंसर, टीबी और हृदय रोगों की प्रारंभिक पहचान के लिए किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे निदान की गति बढ़ी है और त्रुटियों में कमी आई है।
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों की कमी लंबे समय से चुनौती रही है। एआई संचालित टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म अब गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को शहरी विशेषज्ञों से जोड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में एआई आधारित हेल्थ हेल्पलाइन शुरू की गई हैं, जो प्राथमिक लक्षणों के आधार पर मरीजों को परामर्श और उचित अस्पताल की जानकारी देती हैं।
कोविड के दौरान एआई ने संक्रमण के प्रसार का विश्लेषण करने, दवाओं की खोज और टीकाकरण की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाई। डेटा एनालिटिक्स और मशीन लर्निंग मॉडल के माध्यम से संभावित हॉटस्पॉट की पहचान की गई, जिससे प्रशासन को समय रहते कदम उठाने में मदद मिली। देश की कई हेल्थ-टेक स्टार्टअप कंपनियां एआई आधारित डायग्नोस्टिक टूल, वर्चुअल हेल्थ असिस्टेंट और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म विकसित कर रही हैं। ये प्लेटफॉर्म अस्पतालों में बेड मैनेजमेंट, दवा आपूर्ति श्रृंखला और मरीजों की फॉलो-अप मॉनिटरिंग को सुव्यवस्थित बना रहे हैं।
हालांकि एआई आधारित स्वास्थ्य परियोजनाओं के लाभ स्पष्ट हैं, लेकिन डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता जैसे मुद्दे भी सामने आ रहे हैं। साथ ही, चिकित्सकीय निर्णय में अंतिम जिम्मेदारी मानव डॉक्टर की ही रहनी चाहिए। आने वाले वर्षों में एआई आधारित पर्सनलाइज्ड मेडिसिन, रोबोटिक सर्जरी और जीनोमिक्स आधारित उपचार में तेजी आएगी। यदि तकनीक और नैतिक मानकों के बीच संतुलन बनाए रखा गया, तो एआई भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक सक्षम, पारदर्शी और सर्वसुलभ बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
समग्र रूप से देखा जाए तो एआई-आधारित स्वास्थ्य परियोजनाएं देश की चिकित्सा व्यवस्था को नई दिशा देने की ओर अग्रसर है।
हृदय रोग के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। अब हृदय में जड़ें जमाने से पहले ही रोग को एआई पकड़ेगा। अचानक हार्ट अटैक आने की घटनाओं के मद्देनजर कार्डियोलॉजी सोसाइटी आफ इंडिया के यूपी चैप्टर ने नया प्लान तैयार किया है। एआई युक्त उपकरणों से लोगों की जांच की जाएगी। इससे रोग के जड़ पकड़ने से पहले ही पता चल जाएगा। इससे रोगी का स्वास्थ्य खराब नहीं होगा और उसका पैसा भी बचेगा। नए उपकरण एआई युक्त आ रहे हैं। रोगी की तबीयत बिगडने पर उसे तुरंत एडवांस और बेसिक लाइफ सपोर्ट दिया जा सकेगा। प्रत्येक जिलों में हर तीन और छह महीने पर कार्यशाला, सेमिनार और प्रशिक्षण कार्यक्रम होंगे। इससे जनरल प्रैक्टिशनर भी हृदय रोग को शुरुआत में ही पहचान लेगा। रोगी को तुरंत सही जगह इलाज के लिए भेजा जा सकेगा।

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