जब जीवन बन जाए रंगों का उत्सव-गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

 

– गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर
यह संसार रंगों से भरा हुआ है। प्रकृति की तरह ही रंगों का प्रभाव हमारी भावनाओं और संवेदनाओं पर पड़ता है। जैसे क्रोध का लाल, ईर्ष्या का हरा, आनंद और जीवंतता का पीला, प्रेम का गुलाबी, विस्तार के लिए नीला, शांति के लिए सफेद, त्याग के लिए केसरिया और ज्ञान के लिए जामुनी। प्रत्येक मनुष्य स्वयं रंगों का एक फव्वारा है।
पुरानी कथाओं में हिरण्यकश्यप अपने अहंकार में डूबा हुआ था और स्वयं की महिमा चाहता था, जबकि उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। उसने प्रह्लाद को बदलने के अनेक प्रयास किए। अपनी बहन होलिका के साथ उसे अग्निकुंड में बैठा दिया, लेकिन होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। प्रह्लाद की भक्ति में इतनी गहराई थी कि उससे पूर्व के सभी कर्म, संस्कार और उनके प्रभाव मिट जाते हैं।
यदि प्रतीक रूप में देखें तो हिरण्यकश्यप स्थूलता और भौतिकता का प्रतीक है, जबकि प्रह्लाद भोलेपन, आनंद और श्रद्धा का। चेतना को भौतिकता तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिरण्यकश्यप सब कुछ भौतिक साधनों से प्राप्त करना चाहता था, परंतु जीवन केवल भौतिक नहीं है। हर जीव भौतिकता से परे है और वही नारायण का क्षेत्र है। होलिका भूतकाल की प्रतीक है, जबकि प्रह्लाद वर्तमान के आनंद का। प्रह्लाद की भक्ति ही उसे निरंतर आनंद में स्थित रखती थी।
जब जीवन में आनंद होता है तो जीवन स्वयं एक उत्सव बन जाता है। भावनाएँ हमें अग्नि की तरह जला सकती हैं, लेकिन यदि वही भावनाएँ रंगों की फुहार बन जाएँ तो जीवन सार्थक हो जाता है। अज्ञान में भावनाएँ कष्टदायक होती हैं, पर ज्ञान में वही भावनाएँ जीवन में रंग भर देती हैं।
जीवन रंगों से भरा होना चाहिए, न कि उबाऊ। जीवन में हम कई भूमिकाएँ निभाते हैं। उन भूमिकाओं और उनसे जुड़ी भावनाओं का स्पष्ट होना आवश्यक है, अन्यथा संघर्ष निश्चित है। यदि आप घर में पिता की भूमिका निभा रहे हैं, तो उसे कार्यस्थल पर नहीं निभा सकते। जब हम जीवन की विभिन्न भूमिकाओं को आपस में मिला देते हैं, तब उलझनें पैदा होती हैं और गलतियाँ होने लगती हैं।
जीवन में जो भी आनंद आप अनुभव करते हैं, वह आपके भीतर से ही आता है। जो आपको जकड़े हुए है, उसे छोड़ दें। जब आप शांत होकर बैठते हैं, तो वह ध्यान बन जाता है। ध्यान में आपको गहरी नींद से भी अधिक विश्राम मिलता है, क्योंकि उस समय आप इच्छाओं से परे होते हैं। यह मस्तिष्क को गहरी शीतलता देता है और आपके तंत्रिका तंत्र को सुदृढ़ करता है, उसे नया जीवन प्रदान करता है।
उत्सव चेतना का स्वभाव है, और जो उत्सव मौन से उत्पन्न होता है, वही वास्तविक होता है। यदि उत्सव के साथ पवित्रता जुड़ जाए, तो वह पूर्ण हो जाता है। केवल शरीर और मन ही उत्सव नहीं मनाते, बल्कि चेतना भी उत्सव मनाती है। इसी अवस्था में जीवन सचमुच रंगों से भर उठता है।

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