डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा – गाँव की उस ऊसर जमीन पर, जहाँ दूब भी उगने से पहले पटवारी से एनओसी माँगती है, वहाँ आज ‘विकास’ का तंबू गड़ा था। लाउडस्पीकर अपनी फटी आवाज में वह राग अलाप रहा था, जिसे सुनकर मोहल्ले के कुत्ते भी दार्शनिक हो गए थे। सामने बैठी जनता का हाल यह था कि वे धूप में ऐसे तप रहे थे जैसे तवे पर चढ़ी हुई रोटियाँ, जिन्हें पलटने वाला कोई नहीं था। मंच पर सफेदपोश नेताओं की ऐसी कतार थी, मानो किसी ने सफेद बगुलों को जबरदस्ती कुर्ता-पजामा पहनाकर कुर्सी पर चिपका दिया हो। बीच में बैठे मुख्य अतिथि महोदय के चेहरे पर वैसी ही गंभीर निष्ठुरता थी, जैसी किसी पुरानी फाइल पर जमी धूल में होती है। वे मुस्कुराते तो ऐसा लगता मानो उनके गालों की मांसपेशियां किसी सरकारी बजट की तरह खींचतान कर रही हों। बगल में बैठा चमचा बार-बार उनके कान में कुछ फुसफुसाता और अतिथि महोदय ऐसे सिर हिलाते जैसे किसी खराब पंखे का रेगुलेटर झटके ले रहा हो। मंच संचालन करने वाला व्यक्ति कविता का वह प्रेमी था, जिसने तुकबंदी के चक्कर में सरस्वती की हत्या को ही अपना धर्म मान लिया था। उसने ‘भाइयों और बहनों’ का संबोधन कुछ इस अंदाज में किया जैसे वह किसी को गाली दे रहा हो। उसने मंच से घोषणा की कि आज इस गाँव में ‘स्मार्ट पंचायत’ का उद्घाटन होगा, जहाँ गोबर भी अब वाई-फाई की गति से उठाया जाएगा। जनता ने इस पर वैसी ही तालियाँ बजाईं जैसी किसी अनचाही शादी में बाराती बजाते हैं। पास ही खड़ा एक बूढ़ा अपनी लाठी पर ठुड्डी टिकाए यह सोच रहा था कि जिस गाँव में बिजली सिर्फ ‘भविष्यवाणी’ की तरह कभी-कभार आती है, वहाँ वाई-फाई का क्या होगा? पर सरकारी फाइल में गाँव अब डिजिटल हो चुका था, और फाइल ही वह परम सत्य है जिसे ब्रह्मा भी नहीं काट सकते।read more :https://khabarentertainment.in/special-on-international-womens-day/ तभी विकास की वह देवी मंच पर अवतरित हुई, जिसे शहर में ‘एनजीओ’ और गाँव में ‘मुफ्त की आफत’ कहा जाता था। उन्होंने माइक सँभाला और शुद्ध अंग्रेजी मिश्रित हिंदी में भाषण देना शुरू किया। उन्होंने कहा कि हमें ‘सस्टेनेबल’ होना चाहिए, जबकि सामने बैठा किसान यह समझ रहा था कि शायद मैडम किसी नई किस्म की खाद का नाम ले रही हैं। उन्होंने ‘महिला सशक्तिकरण’ पर इतना जोर दिया कि मंच की लकड़ी चरचराने लगी। उन्होंने समझाया कि गाँव की औरतें अब फेसबुक पर अपने हाथ के बुने स्वेटर बेचेंगी, भले ही गाँव में मोबाइल सिग्नल पकड़ने के लिए पीपल के पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर चढ़ना पड़ता हो। भाषण के अंत में उन्होंने ‘परिवर्तन’ शब्द को ऐसे उछाला जैसे कोई बाजीगर हवा में खाली टोपी उछालता है और जनता से उम्मीद करता है कि उसमें से खरगोश निकलेगा।अगला चरण था लोकार्पण का। मुख्य अतिथि ने एक फीता काटा, जो शायद पिछले दस सालों से हर छोटी-बड़ी योजना के लिए सुरक्षित रखा गया था। कैंची ऐसी थी कि उसने फीता काटने से पहले अतिथि की उंगली काटने की कोशिश की, जिससे अतिथि के चेहरे पर ‘अहिंसा’ के भाव आ गए। जैसे ही पर्दा हटा, सामने एक चमचमाता हुआ बोर्ड था जिस पर लिखा था—”आदर्श ई-चौपाल”। भीतर जाकर देखा तो एक कंप्यूटर रखा था, जिस पर धूल की इतनी मोटी परत थी कि उस पर कोई भी अनुभवी पटवारी अपनी पूरी वंशावली लिख सकता था। बिजली के तार ऐसे लटके थे जैसे किसी ने मकड़ी को नशा कराकर जाल बुनने को कह दिया हो। एक उत्साही कार्यकर्ता ने जैसे ही स्विच दबाया, बोर्ड से ऐसी चिनगारी निकली जैसे कोई छोटा-मोटा परमाणु परीक्षण हुआ हो।read more:https://khabarentertainment.in/special-on-international-womens-day/ अतिथि महोदय ने स्थिति सँभालते हुए कहा, “देखिए, यह ऊर्जा का संचार है!” जनता ने फिर तालियाँ पीटीं। सरकारी तंत्र की यही खूबसूरती है कि यहाँ नाकामी को भी ‘साहसिक प्रयोग’ की तरह पेश किया जाता है। इसके बाद जलपान का कार्यक्रम शुरू हुआ, जहाँ समोसे इतने सख्त थे कि उनसे किसी भी भ्रष्ट अधिकारी का सिर फोड़ा जा सकता था। चाय का रंग ऐसा था मानो किसी ने गंगा के प्रदूषण को कप में भरकर परोस दिया हो। फिर भी लोग टूट पड़े, क्योंकि मुफ्त की चाय में वो नशा होता है जो लोकतंत्र के किसी भी अधिकार में नहीं होता। अधिकारी आपस में ऐसे गले मिल रहे थे जैसे उन्होंने अभी-अभी मंगल ग्रह पर पानी खोज लिया हो, जबकि हकीकत यह थी कि गाँव के एकमात्र कुएं में मेंढक भी अब पानी की जगह कीचड़ में तैरने की प्रैक्टिस कर रहे थे।जब सूरज ढलने लगा और शाम की धूल ने विकास के तंबू को ढक लिया, तब वह बूढ़ा किसान उठा और अपनी फटी जेब से एक बीड़ी निकालकर सुलगाने लगा। उसने मंच की ओर देखा, जहाँ अब सिर्फ बिखरे हुए कागज और खाली कुर्सियां बची थीं। उसने हवा में धुआँ छोड़ते हुए अपने साथी से कहा, “भाई, विकास आ गया है, बस जरा पहचान पत्र साथ रखना, वरना सरकारी दफ्तर में तुम्हें ‘मृत’ घोषित करके विकास की अगली किस्त डकार ली जाएगी।” उसने एक करारा थूक जमीन पर मारा और मुस्कुराते हुए बोला, “शुक्र है कि साहेब ने वाई-फाई चालू कर दिया, अब कम से कम गाँव का बेरोजगार नौजवान अपनी भूख की फोटो खींचकर ‘इंस्टाग्राम’ पर तो डाल सकेगा!” बूढ़े की इस बात पर गाँव की उस ऊसर जमीन ने भी जैसे ठहाका लगाया और पूरा मजमा तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा, क्योंकि भारत में तमाशा चाहे कितना भी दुखद हो, आखिरी ताली हमेशा विदूषक के हिस्से में ही आती है।