स्नेहा सिंह
‘नई गिल्ली, नया दांव’ यह कहावत युद्धप्रिय अमेरिका पर पूरी तरह लागू होती है। यदि आप हाल का अतीत देखेंगे तो पता चलेगा कि हर कुछ वर्षों में अमेरिका कहीं न कहीं छोटे-बड़े युद्ध लड़ता ही आ रहा है। मानो अपनी रक्षा प्रयोगशालाओं में तैयार किए गए नए हथियारों की जांच करनी हो, उसी तरह अमेरिका दुनिया के किसी न किसी देश पर हमला करता है और चार-छह दिनों के सशस्त्र संघर्ष करता है। फिर उसका स्वार्थ पूरा हो जाता है तो पीछे हट जाता है।रक्षा मामलों के एक भारतीय विशेषज्ञ ने बताया कि वर्तमान मिडिल ईस्ट में जो युद्ध चल रहा है, उसमें शामिल देश या प्रभावित देश अपने-अपने हथियारों को आजमा रहे हैं। इससे उनके हथियारों की उपयोगिता और प्रभावशीलता सिद्ध हो सके। साथ ही उनके सैनिकों की भी पूरी परीक्षा हो जाती है।गाजा, सीरिया, लेबनान, यमन और लाल सागर क्षेत्र में पिछले कुछ समय से जो संघर्ष चल रहा है, उसमें अमेरिका, रूस, इजरायल, तुर्की और ईरान जैसे देश अपने हथियारों का भरपूर परीक्षण कर रहे हैं। इन देशों के अलावा गैरराज्य तत्व जैसे हिज्बुल्लाह, हूती, हमास, हयात तहरीर अलशाम और कुर्द विद्रोही भी अपने हथियारों को ‘धारदार’ बना रहे हैं।यह भी एक विचित्रता है कि एक ओर मिडिल ईस्ट के युद्ध में सैनिक और आम नागरिक जान गंवा रहे हैं, संपत्ति और बड़े-बड़े ढांचे नष्ट हो रहे हैं। दूसरी ओर कुछ युद्धप्रिय देश अपने हथियारों की जांच कर रहे हैं और अपने सैनिकों को वास्तविक सैन्य प्रशिक्षण दे रहे हैं, ताकि उनका युद्धाभ्यास पूर्ण रूप से सफल हो सके।इजरायल का ही उदाहरण लें तो उसने पिछले कुछ वर्षों से गाजा, लेबनान और सीरिया को अपने सैन्य अभ्यास के फायरिंग रेंज में बदल दिया है। जहां अंधाधुंध गोलीबारी, टैंकों की आवाजाही, बमबारी और मिसाइल हमले होते हैं। अमेरिका ने कुछ वर्ष पहले इसी तरह इराक पर बारबार हवाई हमले कर अपने विभिन्न फाइटर-बॉम्बर विमानों की क्षमता परखी थी, जबकि रूस ने बारबार सीरिया का उपयोग मिसाइल परीक्षण के लिए किया है।read more:https://worldtrustednews.in/if-nitish-kumar-becomes-a-minister-at-the-centre-it-will-be-a-moral-victory-for-narendra-modi/ नब्बे के दशक में इराक के खिलाफ ‘गल्फ वॉर’ के बाद अमेरिका ने नए मिलेनियम का पहला युद्ध ईरान के खिलाफ शुरू किया। लेकिन इस बीच वह शांत नहीं बैठा। सोमालिया, यूगोस्लाविया, साराजेवो, सर्बिया, सूडान और ईरान में भी उसने सशस्त्र हस्तक्षेप किए हैं। हर छोटे-बड़े युद्ध में अमेरिका अपने हथियारों का परीक्षण करता है, नया अनुभव प्राप्त करता है और अपनी सेना को और अधिक प्रशिक्षित व अनुभवी बनाता है।अमेरिका आज दुनिया की एकमात्र महाशक्ति है। उसके पास सबसे बड़ा और आधुनिक रक्षा तंत्र है। अत्याधुनिक हथियार, लड़ाकू विमान और परमाणु संचालित पनडुब्बियां उसके पास हैं। स्पष्ट रूप से अमेरिका में विशाल हथियार उद्योग विकसित हो चुका है।अमेरिका के एक शीर्ष सैन्य कमांडर ने कहा था कि युद्ध में विशेषकर नए फाइटर-बॉम्बर विमान और एयर डिफेंस सिस्टम का उपयोग उनकी तकनीकी क्षमता के बारे में सटीक जानकारी देता है। युद्ध के दौरान पायलट और इंजीनियरों को वास्तविक और उपयोगी अनुभव मिलता है।27 फरवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी सेना को ईरान पर हमले का आदेश दिया। इसके साथ ही अमेरिका और इज़राइल के रक्षा विभागों ने अपने हथियार बनाने वाली कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए। सैन्य अनुसंधानकर्ता भी नए हथियार तैयार करने में तेजी लाने लगे।एक तरह से ईरान फिर से अमेरिका के लिए एक बड़ी रक्षा प्रयोगशाला बन गया है। एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी के अनुसार युद्ध के दौरान ही किसी हथियार की वास्तविक ताकत और कमजोरी का सही आकलन किया जा सकता है। युद्ध में सफल हथियारों की नकल अन्य देश तुरंत करने लगते हैं या उन्हें खरीदने की कोशिश करते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/tension-between-afghanistan-and-pakistan-is-once-again-reaching-a-dangerous-point/
समाचारों में रोज अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे आधुनिक विमान, मिसाइल, स्मार्ट बम और कमांडो उपकरणों की चर्चा होती है। इस युद्ध में सैटेलाइट, जीपीएस और संचार तकनीक का भी व्यापक उपयोग हो रहा है। युद्ध के शुरुआती दो सप्ताह बाद अमेरिका ने क्रूज मिसाइल और बमवर्षक विमानों का उपयोग कम कर दिया और जमीनी युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन शुरुआती दिनों में उसने अपनी क्रूज मिसाइल की नेविगेशन प्रणाली का परीक्षण कर लिया।गौरतलब है कि पहले ‘गल्फ वॉर’ में अमेरिका की क्रूज मिसाइलें लक्ष्य से कुछ प्रतिशत चूक जाती थीं। बाद में उसमें सुधार किए गए। अब ईरान युद्ध में उनके प्रदर्शन का पुनः परीक्षण हो रहा है। ब्रिटेन ने भी अपनी पनडुब्बियों से टॉमहॉक मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता को फिर से परखा है। कम लोग जानते हैं कि युद्ध के दौरान अमेरिका और अन्य देश अपने हमलों की वीडियो रिकॉर्डिंग भी करते हैं। उपग्रहों के जरिए तस्वीरें ली जाती हैं और बाद में उनका विश्लेषण कर सुधार किए जाते हैं।पेंटागन इन तस्वीरों के आधार पर आगे की रणनीति तय करता है, कहां हमला करना है, कैसे दुश्मन की ताकत तोड़नी है। इस प्रकार अमेरिका के लिए ईरान का युद्धक्षेत्र एक बड़ी रक्षा प्रयोगशाला बन गया है। युद्ध का वास्तविक अनुभव किसी भी अभ्यास से अधिक महत्वपूर्ण होता है, इसलिए अमेरिका बारबार युद्ध करता रहता है।read more:https://khabarentertainment.in/dr-suresh-kumar-mishrahawamahal/ मध्यपूर्व के देशों में लगातार संघर्ष चलते रहते हैं और वे बड़े देशों से हथियार खरीदते रहते हैं। इससे हथियार उद्योग को बढ़ावा मिलता है और नए युद्धों की संभावना बनी रहती है। 1967 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद से महाशक्तियों ने मध्यपूर्व को हथियारों के परीक्षण क्षेत्र के रूप में उपयोग किया है।रूस द्वारा दिए गए एसएएम मिसाइलों की शुरुआत में विफलता के बाद उन्हें सुधारकर फिर सफल बनाया गया। 1973 में इन मिसाइलों ने इजरायली विमानों को मार गिराया।रूस ने सीरिया युद्ध से मिले अनुभव का उपयोग यूक्रेन युद्ध में किया। इसी तरह ईरान ने भी सीरिया से अनुभव लेकर अपने हथियार विकसित किए। अमेरिका और रूस दोनों ने दशकों से इस क्षेत्र में हथियारों का परीक्षण किया है और उन्हें विभिन्न देशों को बेचा है। हाल के युद्ध में अमेरिका ने टॉमहॉक मिसाइल के नए संस्करण और बंकर-बस्टर बमों का परीक्षण किया है।इजरायल ने भी अपने अत्याधुनिक हथियारों और तकनीकों का उपयोग कर उन्हें और बेहतर बनाया है। हालांकि इस बार इजराइल की आयरन डोम प्रणाली ईरान के क्लस्टर बमों के सामने कमजोर साबित हुई।अमेरिका ने इस युद्ध में एसी-130 गनशिप और ‘लुकास’ ड्रोन जैसे नए हथियारों का भी उपयोग किया, जो सस्ते और प्रभावी साबित हुए।ईरान ने भी अमेरिकी ड्रोन तकनीक की नकल कर अपने ड्रोन बनाए।इस युद्ध में अमेरिका अपने सबसे आधुनिक हथियारों का उपयोग कर रहा है, जबकि ईरान सीमित संसाधनों के साथ मुकाबला कर रहा है। भारत सहित कई देश इस युद्ध का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं। यह स्पष्ट हो गया है कि कम लागत वाले ड्रोन युद्ध में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।इस प्रकार, खाड़ी क्षेत्र महाशक्तियों के लिए हथियारों की वास्तविक परीक्षण प्रयोगशाला बन चुका है।