करुणा नयन चतुर्वेदी हुंकार द रोर एक कोर्टरूम ड्रामा वेब सीरीज है। यह कहानी जियो हॉटस्टार पर प्रसारित हो रही है। यह सीरीज एक मीनु रावत नाम की 17 वर्षीय नाबालिक लड़की की है। जिसका एक आध्यात्मिक गुरु सुनील बापजी चौकसी ने यौन शोषण किया है। यह वेब सीरीज आध्यात्मिकता की आड़ में होने वाले जघन्य अपराध को पर्दे पर लाने का काम करती है और यह स्थापित करने का काम करती है कि लैंगिक दुष्कर्म ही बलात्कार नहीं होते, बल्कि बलात्कार के अन्य रूप भी समाज में मौजूद है जिसको महिलाओं आए दिन झेलती हैं।इस सीरीज में मीनु रावत ( अनीत पड्डा ) अपने ऊपर हुए यौन दुर्व्यवहार के लिए पुलिस के पास रिपोर्ट दर्ज करने जाती है। कहानी मूल रूप से यहीं से गति पकड़ती है। उसका परिवार चिंतित है। इतनी बड़ी आध्यात्मिक हस्ती सुनील बापजी चौकसी ( रघुबीर यादव ) के विरुद्ध कार्रवाई कैसे होगी? यह कहानी एक बाबा के द्वारा बनाए गए अध्यात्मिक तंत्र की है। जिसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाता। यह कहानी एक रेप पीड़ित लड़की के संघर्ष को दिखाने का प्रयास करती है। ऐसा नहीं है कि इस विषय पर भारतीय सिनेमा में कहानी पर्दे पर नहीं आई है। किंतु ज्यादातर विषयों में लैंगिक रूप से बलात्कार को ही घटना के रूप में स्थान दिया जाता है। लेकिन यह सीरीज इस धुरी से अलग है। यह एक नए विमर्श को खड़ा करने का काम करती है। कई बार लैंगिक दुर्व्यवहार बलात्कार के रूप नहीं होते बल्कि शारीरिक स्पर्श से भी महिलाओं को हवस का शिकार किया बनाया जाता है। यह कहानी मध्यमवर्गीय परिवार की विवशता, कोर्ट के चक्कर से बचने की कोशिश, मीडिया और नौकरशाही की विवशता को भी दिखाने का काम करती है।कलाकारों के बदौलत स्थापित होती कहानी है। अनीत पड्डा ने रेप पीड़िता के किरदार को बखूबी पर्दे पर उतारा है।read more:https://pahaltoday.com/villagers-upset-over-garbage-dumping-staged-a-protest-at-the-district-collectorate/वह अपने अभिनय में बनावटीपन नहीं आने देती हैं। पीड़िता को समाज में किस प्रकार से डर, दबाव और लांछना का शिकार होना पड़ता है। इस प्रकार के शारीरिक और आंगिक अभिनय को अनीत पड्डा बेहतरीन तरीके से अपना अभिनय प्रदान किया है। कहानी की शुरुआत में पुलिस के सामने जब वह अपनी आपबीत्ती दर्ज कराने के लिए जाती है और कैमरे के सामने अपनी व्यथा को बताने के लिए जब उनसे दो-तीन बार पूछा जाता है तो जिस प्रकार का एक्सप्रेशन उनके चेहरे से बाहर आता है, वह दर्शकों को उद्वेलित कर जाता है।फातिमा सना शेख ने एसीपी जसलीन कौर सोनी की भूमिका में संतुलित अभिनय किया है। बापजी के किरदार में रघुबीर यादव एक अलग अंदाज में दिखाई देते हैं। वह अपने भाव और संतुलित संवाद से किरदार को असहज और डरावना बना देते हैं। वकील भालेराव की भूमिका में मोहम्मद जीशान अय्यूब ने अपने अभिनय की सकारात्मक छाप छोड़ी है। वह अपने असफल वकालती करियर के बावजूद साहस के साथ कोर्ट में बहस करते नजर आते हैं। पत्रकार अमिताभ की भूमिका में अर्जुन माथुर ने भी अपनी बेहतरीन अधिकारी का परिचय दिया है।कहानी की शुरुआत पुलिस स्टेशन से शानदार तरीके से होती है। लेकिन बापजी पर आरोप लगते ही और एसीपी जसलीन की एंट्री होने के बाद कहानी थोड़ी भटकती हुई दिखाई देती है। इतने बड़े हस्ती के खिलाफ केस होने के बाद उसका राजनीतिक और सामाजिक रसूख कैसे पीड़िता और शासन-प्रशासन पर दबाव बनाता है, यह अच्छे से पर्दे पर नहीं दिखाया गया है। बापजी का राजनीतिक रसूख़ जसलीन के काम में कैसे अड़चन पैदा करता है, इसे बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया गया है। मीनु को एक स्वच्छंद, निर्भीक लड़की के रूप में दिखाया गया है। लेकिन उसका कई बार अत्यधिक निर्भीक होना लेखन की कमी को उजागर करता है। कई प्रसंग ऐसी कहानी में जोड़े गए हैं जो अनायास जोड़े गए हैं। एक सीन में वकील भालेराव में जसलीन से यह कहते हैं कि यह मामला उन्हें इसलिए सौंपा गया है, क्योंकि प्रशासन उन्हें असफल देखना चाहता है। यह प्रशासनिक दबाव का प्रश्न खुलकर कहानी और लेखन में आने की कोशिश तो करता है, लेकिन वह उतने अच्छे से नहीं आ पाता। कहानी के विकास के क्रम में भी कहानी खंडित लगती है। बापजी के बेटे और शिवानी के दुश्मनी को बस मामूली टच प्रदान किया गया है। टीवी पत्रकार अमिताभ को भी ज्यादा नहीं दिखाया गया है। जोया हुसैन के पात्र को भी पटकथा में कम ही स्थान दिया गया है।तमाम लेखन त्रुटियों और अनायास प्रसंगों के बावजूद हुंकार एक नए रूप में स्त्री विमर्श को पर्दे पर लाने का प्रयास करता है। निर्देशक नित्या मेहरा और करन डी कपाड़िया ने अपने स्तर पर कहानी को व्यवस्थित रखने का यथासम्भव प्रयास किया है। लेकिन अनीत पड्डा ने अपने शानदार अभिनय से कहानी को रोचकता प्रदान की है।