बहराइच। टीबी (क्षय रोग) केवल एक संक्रामक बीमारी नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए सामाजिक और मानसिक पीड़ा का कारण भी बन रही है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित शोध के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं को टीबी से जुड़े सामाजिक कलंक का खतरा लगभग 13 गुना अधिक होता है, जिसके चलते वे समय पर जांच और इलाज से दूर रह जाती हैं।यह स्थिति किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) द्वारा 960 महिला मरीजों पर किए गए अध्ययन में भी सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार 18% महिलाओं को पति या ससुराल से अस्वीकृति मिली, 25% ने घर में अलगाव झेला और 10% के रिश्ते टूट गए। करीब 50% महिलाओं ने अपनी बीमारी छिपाए रखी, जबकि 44% ने सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना बंद कर दिया।पखरपुर ब्लॉक के कोदही गांव की 22 वर्षीय रूबी आर्या की कहानी इस सच्चाई को बयां करती है।read more:https://pahaltoday.com/minister-of-state-for-defence-welcomes-insv-kaundinya-after-successful-completion-of-her-maiden-overseas-visit-to-oman/ वर्ष 2022 में टीबी की पुष्टि के बाद उन्हें बीमारी से अधिक अपनों की बेरुखी का सामना करना पड़ा। परिवार और पड़ोसियों ने दूरी बना ली, यहां तक कि बच्चों को भी पास आने से रोका गया। सामाजिक दबाव के कारण उन्होंने खुद को अलग-थलग कर लिया।हालांकि नौ महीने के उपचार के बाद अब रूबी पूरी तरह स्वस्थ हैं और वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर संस्था के साथ जुड़कर अन्य महिलाओं को जागरूक कर रही हैं।जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एमएल वर्मा ने बताया कि टीबी से जुड़ा भेदभाव पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक प्रभावित करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह बीमारी हाथ मिलाने, साथ बैठने या बर्तन साझा करने से नहीं फैलती, बल्कि खांसने-छींकने से फैलती है। समय पर जांच, नियमित दवा, मास्क का उपयोग और पारिवारिक सहयोग से मरीज जल्दी स्वस्थ हो सकता है।मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय कुमार ने कहा कि टीबी पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है और सरकारी अस्पतालों में इसकी जांच व उपचार निःशुल्क उपलब्ध है। उन्होंने समाज से अपील की कि महिला मरीजों के प्रति संवेदनशीलता और सहयोग का व्यवहार करें l