सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश- बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं माता-पिता

नई दिल्ली– सीनियर सिटीजन्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि वह अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब असुरक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए।हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्गों के अधिकारों और सम्मान को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि माता-ता और वरिष्ठ नागरिकों की भरण–पोषण व सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल उनके बच्चों और बहूबेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है।स्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को गरिमा, सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार है।read more:https://pahaltoday.com/mobile-court-visits-ballia-to-hear-grievances-of-persons-with-disabilities-state-commissioner-issues-strict-directives/

दालत ने कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार करता है।इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटासुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें बुजुर्ग माता-ता की संपत्ति से बेटे और बहू को बेदखल करने के ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि माता–पिता के भरण–पोषण और सुरक्षा के लिए संपत्ति से बच्चों को हटाना भी आवश्यक कानूनी कदम हो सकता है।लखनऊ के मकान से जुड़ा था मामलामामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता से जुड़ा था। गुप्ता ने 5 जून 2022 को अपनी स्वयं खरीदी हुई संपत्ति से बेटे को बेदखल करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया था।मामले में यह भी सामने आया कि उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया।इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को आदेश बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।बेटे और बहू ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने माना था कि माता–पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण–पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत बुजुर्गों को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का स्पष्ट अधिकार नहीं है।हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के दोनों आदेश रद्द कर दिए थे।सुप्रीम कोर्ट ने समझाया कानून का दायरा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप कर गलती की।अदालत के अनुसार, अधिनियम की धारा 7 के तहत गठित ट्रिब्यूनल को धारा 8 के तहत सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। वहीं धारा 27 सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है। पीठ ने कहा कि जब किसी वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और भरण–षण के लिए बेदखली जरूरी हो, तो ट्रिब्यूनल कानून के उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिए ऐसा आदेश पारित कर सकता है।पुराने फैसलों का भी दिया हवालासुप्रीम कोर्ट ने एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-षण और सुरक्षा के लिए ट्रिब्यूनल द्वारा बेदखली का आदेश दिया जा सकता है।अदालत ने यह भी कहा कि यही कानूनी स्थिति बाद के  समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) मामलों में भी दोहराई गई थी।

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