नई दिल्ली। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि कानूनी व्यवस्था में जनता का विश्वास वकीलों के आचरण पर बहुत हद तक निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि कानूनी पेशे में जनता का विश्वास उन लोगों की ईमानदारी और निरंतरता पर निर्भर करता है जो वकालत करते हैं। उन्होंने कहा कि हर पेशेवर निर्णय चाहे वह फीस, मुवक्किल की गोपनीयता हितों के टकराव या कोर्ट में व्यवहार से संबंधित हो, उस विश्वास को मजबूत या कमजोर करने में योगदान देता है। गांधीनगर में आयोजित गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के 16वें दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्यकांत ने युवा विधि स्नातकों को यह सशक्त और व्यावहारिक संदेश दिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सीजेआई द्वारा नैतिक आधारों पर जोर देना अहम है। वह भी तब जब आज के माहौल में जहां संस्थानों में जनता के विश्वास पर कड़ी नजर रखी जाती है। सीजेआई सूर्यकांत ने छात्रों को याद दिलाया कि विश्वसनीयता धीरे-धीरे बनती है और जल्दी ही खो भी जाती है। वकीलों को न केवल अपनी सफलता के लिए बल्कि न्याय व्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए भी जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। यह दीक्षांत समारोह ऐसे समय में हुआ जब भारतीय कानूनी व्यवस्था गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। देशभर में 17 लाख से ज्यादा पंजीकृत वकीलों और 50 करोड़ से ज्यादा लंबित मामलों के साथ, दक्षता और विशिष्ट क्षेत्र की विशेषज्ञता की जरुरत है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि मेरे प्रिय स्नातकों इस पेशे में आपकी सही जगह क्या है, यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका सामना जल्द से जल्द करना जरुरी है, क्योंकि यह शायद ही कभी उन लोगों को पुरस्कृत करता है जो हर चीज में समान रूप से प्रयास करते हैं। उन्होंने साफ किया कि यह समझ तुरंत नहीं आती। यह अनुभव, आत्म-चिंतन और व्यावहारिक ज्ञान के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित होती है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि विधि पेशे में विशेषज्ञता को महत्व दिया जाता है, न कि औसत दर्जे को। उन्होंने न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को मजबूत करने के लिए ईमानदारी, प्रशिक्षण और अकादमिक जगत और व्यवहार के बीच के अंतर को पाटने पर भी बल दिया। सीजेआई ने युवा विधि स्नातकों को एक सशक्त और व्यावहारिक संदेश दिया। टी-20 क्रिकेट का उदाहरण देते कहा कि सूर्यकुमार यादव से डेथ ओवरों में गेंदबाजी करने या बुमराह से चेज को संभालने की उम्मीद नहीं की जाती। उन पर भरोसा किया जाता है कि वे वही करेंगे जिसमें वे माहिर हैं और टीम इसी स्पष्टता के आधार पर बनाई जाती है। उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे अपनी क्षमताओं को शीघ्र पहचानें और हर चीज में औसत दर्जे का बनने की कोशिश करने के बजाय उन्हीं क्षमताओं के इर्द-गिर्द अपना करियर बनाएं। अपने संबोधन के आखिर में सीजेआई सूर्यकांत ने तैत्तिरीय उपनिषद के प्राचीन भारतीय ज्ञान का हवाला देते हुए स्नातकों को उनकी नैतिक जिम्मेदारी याद दिलाई। उन्होंने जिक्र करते हुए कहा कि सत्य बोलो, धर्म के मार्ग पर चलो। इसके जरिए से उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विधि में सफलता केवल कौशल पर ही नहीं, बल्कि चरित्र पर भी निर्भर करती है।