झुनझुनलाल का ‘सरकारी स्वर्ग’

 डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा-महुआर गांव के ‘झुनझुनलाल’ ने जब प्रधानी का चुनाव लड़ा, तो उनका घोषणापत्र किसी जादुई उपन्यास से कम नहीं था। उनका मानना था कि राजनीति वह कड़ाही है जिसमें जनता को तलने के बाद, नमक-मिर्च भी जनता की जेब से ही वसूला जाता है। गांव की खस्ताहाल डिस्पेंसरी को उन्होंने ‘कायाकल्प केंद्र’ का नाम दिया, जहाँ इलाज के नाम पर केवल हनुमान चालीसा का पाठ और अदरक वाली चाय उपलब्ध थी। झुनझुनलाल ने तर्क दिया कि एलोपैथी तो विदेशी षड्यंत्र है, असली स्वास्थ्य तो गांव की धूल फांकने और सरकारी वादों को पचाने में है। उनके दफ्तर में ‘ईमानदारी’ का बोर्ड इतनी ऊँचाई पर लगा था कि किसी भी भ्रष्ट अधिकारी की नज़र उस तक पहुँच ही न सके। गांव के बुज़ुर्ग ‘दुखिया बाबा’ कहते थे कि झुनझुनलाल की बातों में उतना ही यथार्थ है, जितना किसी मुफ़्तखोर की दुआओं में असर। प्रचार के अंतिम दौर में झुनझुनलाल ने गांव के सूखे पीपल के पेड़ को ‘सरकारी कल्पवृक्ष’ घोषित कर दिया।read more:https://khabarentertainment.in/former-state-minister-thakur-yashpal-singh-passes-away-wave-of-mourning-in-the-area/   उन्होंने दावा किया कि दिल्ली से एक विशेष ‘फ्रीक्वेंसी’ इस पेड़ पर उतरने वाली है, जिससे पेड़ की टहनियों पर फल की जगह राशन के पैकेट और 5-G के सिग्नल लटकेंगे। पूरे महुआर में होड़ मच गई; लोग अपनी फटी धोतियां और खाली झोले लेकर पेड़ के नीचे डेरा डाल दिए। झुनझुनलाल ने पेड़ के तने पर चांदी का वर्क चिपका दिया और वहां एक ‘डिजिटल दानपात्र’ रखवा दिया, जिसमें श्रद्धा और वोट दोनों की आहुति अनिवार्य थी। विपक्षी ‘भोंपू सिंह’ इस चमत्कार के आगे नतमस्तक थे, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं कल्पवृक्ष से उनके खिलाफ कोई श्राप न निकल आए। जनता को विश्वास हो गया कि अब न मेहनत करनी पड़ेगी, न हल चलाना पड़ेगा; बस पेड़ के नीचे मुँह बाए लेटे रहना है।चुनाव का परिणाम आते ही जब झुनझुनलाल की जीत का जुलूस उसी पीपल के पास पहुँचा, तो जनता ने अपने राशन के पैकेटों की मांग की। झुनझुनलाल ने बड़े प्रेम से एक-एक पत्थर उठाया और जनता की ओर उछालते हुए कहा— “भाइयों, कल्पवृक्ष ने अपना पहला फल ‘धैर्य’ के रूप में दिया है! जो इस पत्थर को झेल गया, समझो उसे मोक्ष मिल गया।” जनता हक्की-बक्की रह गई, तभी झुनझुनलाल ने माइक संभाला और बोले, “मूर्खों! अगर पेड़ से राशन गिरता, तो सरकार गोदाम क्यों बनाती? यह पेड़ तो सिर्फ ‘वोटों’ की छाया देने के लिए था, जो अब मेरे सिर पर आ गई है। अब अगले पांच साल इसी पेड़ की लकड़ियों से अपना चूल्हा जलाओ और मुझे दुआ दो कि मैंने तुम्हें ‘स्मार्ट’ बनने का मौका दिया।” लोग एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए और झुनझुनलाल अपनी नई सफारी गाड़ी की धूल उड़ाते हुए जिला मुख्यालय की ओर निकल पड़े।

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