संस्थाएं नहीं व्यक्ति भ्रष्ट होता है

ओंकार नाथ सिंह
जिस प्रकार से एन सी ई आर टी की कक्षा आठ की क्लास में न्यायपालिका पर टिप्पणी की गई है वह अपने आप में एक प्रश्न खड़ा करती है कि आखिर किस विचार धारा के अंतर्गत शिक्षा विभाग ने यह फैसला लिया जिसमें बच्चों को यह पढ़ाया जाय कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। ऐसा निर्णय तो मंत्रालय के अनुमति के बगैर लिया ही नहीं जा सकता। कोई भी देश अपने बच्चों को इस प्रकार की तो शिक्षा नहीं दे सकता कि उसके देश के प्रशासन का एक अंग भ्रष्ट भी है । ऐसा करके सरकार क्या माहौल उत्पन्न करना चाहती है? क्या देश की जनता का विश्वास न्यायिक व्यवस्था से उठ जाय और यदि ऐसा हुआ तो वह न्याय के लिए किसके पास जाएगी? क्या पी सी एस जे की परीक्षा में जो पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा सम्पादित होती है , कोई दोष है और यदि है तो इसका ज़िम्मेदार कौन है? क्या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के चयन में कोई दोष है जिससे कार्यपालिका को लगता है कि न्यायपालिका भ्रष्ट हो गई है?
आप स्वयं सोचिए कि क्या कक्षा आठ का विद्यार्थी इतना समझदार होता है कि वह यह बता सके कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार भी होता है? उसे तो सत्य , ईमानदारी और अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है। उस छात्र के अन्य कार्य तो उसके माता पिता या उसका संरक्षक ही करते है। फिर कक्षा आठ के बच्चे के ज़ेहन में भ्रष्टाचार शब्द का उल्लेख कर हमारे देश की सरकार कौन से सच्चे देश भक्त बनाना चाहती है?
जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है वह कहाँ नहीं व्याप्त है ? क्या शिक्षा विभाग का भ्रष्टाचार किसी से छुपा है? स्कूलों को मान्यता देने से लेकर परीक्षा और टीचरों की भर्ती तक के घोटाले और भ्रष्टाचार किसी से छुपे हैं? द हिंदू समाचार पत्र के अनुसार भारत के सांसदों और सभी राज्यों के विधायकों के विश्लेषण से यह पता चलता है कि 30 प्रतिशत सांसदों और 28 प्रतिशत विधायकों ने अपने ख़िलाफ़ गंभीर आपराधिक मामलों की घोषणा की है। ए डी आर ( एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ) की रिपोर्ट के अनुसार देश के चालीस प्रतिशत मौजूदा सांसदों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें 25 प्रतिशत ने हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के अपराध घोषित किए हैं। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद दागी नेताओं के भाजपा में शामिल होने की एक लंबी फेहरिस्त है। बिहार के गिरिराज सिंह के घर से इनकम टैक्स ने करोड़ों रुपया 2014 के चुनाव के समय बरामद किया था लेकिन मोदी सरकार ने उन्हें उसी के कुछ दिन बाद ही केंद्र में मंत्री बना दिया, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा, पश्चिम बंगाल के बाहुबली नेता सुवेंदु अधिकारी, महाराष्ट्र के अजीत पवार, प्रफुल्ल पटेल, नारायण राणे, कर्नाटक के विधायक अनिल लाड, सहित अनेक नेता ऐसे शामिल हुए है जो अपने घोटालों से बचना चाहते हैं या अपनी संपत्ति को बचाना चाहते हैं। अभी हाल ही में असम में असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भाजपा में शामिल हुए हैं जिनके ऊपर पचास करोड़ रुपया लेकर पार्टी बदलने का आरोप है ऐसा वहाँ के समाचार पत्रों में निकला। इतना ही नहीं 1988 से अब तक 42 से अधिक सांसदों की सदस्यता विभिन्न कारणों से समाप्त हो चुकी है। इसमें गंभीर आपराधिक मामलों पर दो वर्ष से अधिक सज़ा होने पर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 के तहत सदस्यता रद्द की जाती है। तो क्या यह समझा जाय कि विधायिका भ्रष्ट हो चुकी है।
इसी प्रकार कार्यपालिका में भी कई ऐसे मौके आए हैं जब विभागीय मंत्रियों को उनकी लापरवाही के कारण या गंभीर अपराध होने पर पद से त्यागपत्र देना पड़ा है। अनेकों वरिष्ठ अधिकारियों यहाँ तक कि प्रदेश के मुख्य सचिव एवं भारत सरकार के सचिव और मंत्री तक को उनका दोष सिद्ध होने पर न्यायालय द्वारा सज़ा दी गई। कई प्रधानमंत्री तक को उनके ऊपर दोषारोपण होने पर न्यायालय का सामना करना पड़ा तो क्या यह समझा जाय कि कार्यपालिका पूरी भ्रष्ट हो चुकी है?
न्यायाधीशों को हटाने का भी प्रावधान है । उन्हें लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाने के साथ हटाया जा सकता है लेकिन आज तक स्वतंत्रता के बाद से एक भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया गया है। 1993 में जस्टिस बी रामास्वामी और 2011 में जस्टिस सौमित्र सेन के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई परंतु उसके पहले उन लोगों ने अपना त्यागपत्र दे दिया था। इसी प्रकार जस्टिस वर्मा के घर से जले नोट बरामद हुए थे जिसका केस अभी अदालत में चल रहा है मगर इसका यह तात्पर्य तो नहीं होना चाहिए कि समस्त न्यायपालिका भ्रष्ट है। क्या यह समझा जाय कि यह कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका को कण्ट्रोल करने की चाल है। यह तो सच है कि भ्रष्टाचार बुरी तरह से फैला है पर इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है। उसको समाप्त करने की आवश्यकता है न कि एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की। व्यक्ति भ्रष्ट होता है संस्था नहीं। व्यक्ति से संस्था मज़बूत होती है जैसे टी एन सेशन जिन्होंने चुनाव आयुक्त का जब पदभार ग्रहण किया तो उन्होंने उसकी महत्ता को बहुत ऊंचा किया था और व्यक्ति से ही संस्था का गौरव गिरता है जैसे आज के चुनाव आयुक्त को लोग सरकार के कंट्रोल में देखते हैं जिसे निष्पक्ष दिखना चाहिए।
इसमें कोई शक नहीं कि प्रशासन के तीनों अंग अपने क्षेत्र में स्वतंत्र है मगर जब संस्थाएं दूसरे के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करना चाहती हैं तो भ्रष्टाचार की शुरुआत वही से होती है। कार्यपालिका अपनी स्थित को मज़बूत करना चाहती है क्युकी प्रशासन उसके हाथ में होता है इसलिए जब कभी स्थितियां उसके हिसाब से नहीं होती हैं तब वह संविधान के विरुद्ध भी काम करती है जिससे परिस्थितियों को अपने अनुरूप बना सके । राज्य सरकारें आजकल अपराध पर कंट्रोल करने के बहाने फेक एनकाउंटर कर स्वयं ही सज़ा दे रही हैं जबकि उनका काम अपराधियों को पकड़ने का है और सज़ा देने का काम न्यायालय का है । आज जनता का अगर किसी पर विश्वास है तो वह न्यायपालिका ही है । अंत में सब वही जाते हैं । ऐसे में शिक्षा विभाग ने न्यायपालिका को भ्रष्ट कहकर घोर अपराध किया है।

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