ओंकार नाथ सिंह
केंद्र सरकार आगामी 16 अप्रैल से 18 अप्रैल तक संसद का दो दिन का विशेष अधिवेशन बुला रही है जिसमे महिलाओं का कोटा निर्धारित करने की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कानून बनाएगी। जिसके लिए लोक सभा और विधान सभा के निर्वाचन क्षेत्रों का पुनः परिसीमन करना पड़ेगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पी चिदंबरम और जयराम रमेश ने सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार इस बिल को हड़बड़ी में इसलिए लाना चाह रही है जिससे उसे राज्य विधान सभाओं में होने वाले चुनावों में लाभ मिल सके। साथ ही जिन राज्यों को इसमें नुकसान होगा उनके सदस्य अपने राज्य के चुनाव में व्यस्त होने के कारण चर्चा में भाग नहीं ले सकते हैं जिसका फ़ायदा सरकार को बिल पास कराने में मिलेगा। 16 और 18 अप्रैल को पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव होने हैं इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस अधिवेशन को 29 अप्रैल को बुलाने की माँग की है जिससे सभी राज्यों के सदस्य चर्चा में भाग ले सकें। इस बिल को पास करने के लिए एक विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है यह सामान्य बहुमत से पास नहीं किया जा सकता है और सरकार इसे इसीलिए उन तारीखों में अधिवेशन कर रही है जिससे उन्हें बिल पास कराने में सहूलियत हो। इस बिल के पास होने पर लगभग पचास फ़ीसदी सीटें लोकसभा में बढ़ने की संभावना है। कांग्रेस पार्टी और सभी विपक्षी नेताओं और सभी उन राज्यों का कहना है कि सरकार को इस बिल के ज़रिए जो सीट बढ़ाने की प्रक्रिया है उसमें छोटे राज्यों की अनदेखी नहीं की जाय।जैसे उत्तर प्रदेश में अस्सी सीटें है जो बढ़ने के बाद लगभग 120 सीटें हो जाने की संभावना है और दक्षिण में केरल में बीस सीटें हैं जो बढ़ कर तीस सीट तक हो सकती है ।read more:https://worldtrustednews.in/initiative-of-smile-of-the-poor-is-my-identity-mission-in-sukhan-of-nighasan-nagar-panchayat-relief-material-provided-to-fire-victims/ इस प्रकार उत्तर प्रदेश और केरल में लगभग नब्बे सीटों का अंतर आ जाएगा जो अभी तक साठ सीटों तक ही सीमित था जो भी बहुत अधिक था। इसी प्रकार उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, गोवा, अरुणाचल प्रदेश सहित सभी पूर्वोत्तर राज्यों की, जिनकी सीटें बड़े राज्यों के मुक़ाबले कम ही रहेंगी वह संसद में अपने राज्य के हित की बात पर कैसे दबाव बना पायेंगे। इसको सरकार को गंभीरता से सोचना और समझना होगा। लोकतांत्रिक प्रणाली में जितने भी देश हैं उनके यहाँ सीटों की संख्या जनसंख्या के आधार पर ही निर्धारित होती है । परंतु यहाँ यह विचार करना आवश्यक है कि लोकसभा में सांसदों की इतनी बड़ी सख्या क्या देश हित में है या सांसदों के व्यक्तिगत लाभ के लिए है। सबसे पहले हमे समझना होगा कि सांसदों का प्रमुख कार्य क्या है- 1-सांसद का प्रमुख कार्य कानून बनाना है और पुराने कानूनो में संशोधन करना है। 2- सरकार पर निगरानी करना कि वह देश का शासन विधि सम्मत कर रहे हैं या नहीं। उनकी कमियों पर सदन में सरकार से प्रश्न पूछना और दोषी पाए जाने पर सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए उन्हें सत्ता से हटाना है अर्थात् सरकार के कार्यों पर नियंत्रण करना भी है। 3- सांसद सरकार के बजट को स्वीकृत करते हैं जो वह देश के विकास में खर्च करती है। बिना सदन की अनुमति के सरकार एक पैसा भी खर्च नहीं कर सकती। सांसद देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा के स्पीकर, उप स्पीकर और राज्यसभा के उप नेता के चुनाव में वोट करते हैं। 4- राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति,मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश जैसे अनेक संवैधानिक पदों पर कार्य करने वालों के विरुद्ध महाभियोग लाकर उन्हें हटाने का अधिकार भी सांसदों को है। 5- सांसद सपने क्षेत्र में होने वाले विकास पर भी सरकार से प्रश्न पूछते हैं। अगर आप सब लोग संसद की कार्यवाही संसद टी वी पर देखते हैं तो ईमानदारी से बतायें कि कितने सांसद पार्लियामेंट की कार्यवाही में गंभीरता से हिस्सा लेते हैं । प्रत्येक दिन एक घंटे का प्रश्नकाल निर्धारित होता है।read more:https://worldtrustednews.in/the-excise-department-raided-illegal-liquor-in-lahbari-dhaurahra-20-liters-of-raw-liquor-200-liters-of-raw-liquor-and-a-distillery-were-destroyed/ उस निर्धारित समय में कितने सांसद एक वर्ष में उस कार्यवाही में हिस्सा लेते हैं। बजट , संविधान संशोधन या नए क़ानून को बनाने में स्पीकर द्वारा एक निश्चित समय निर्धारित किया जाता है और उस समय को पार्टी की संख्या के हिसाब से बहस करने का समय निर्धारित होता है। यदि कोई व्यवधान नहीं हुआ और सारी पार्टियां बहस में हिस्सा लें तो भी सब दल के सभी सदस्य उस विषय पर अपने विचार समयाभाव के कारण नहीं रख पाते हैं। यदि इनकी संख्या बढ़ती है तो यह अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कैसे करेंगे। वैसे साल में तीन सेशन संसद के होते ही होते है। बजट सेशन जो लगभग दो माह चलता है। परंतु दो माह में कितने दिन चलता है यह आप भी जानते है। फिर एक बार संसद वर्षा काल और एक शीत काल में होता है। लेकिन एक अनुमान के अनुसार सबसे अधिक सदन की बैठक 1956 में 157 दिन चली और सबसे कम सदन की बैठक 2020 में 33 दिन चली। 2014 से 2026 तक सदन के लगभग पचास दिन प्रति वर्ष चलने का अनुमान है। ऐसे में जो सांसदों की संख्या में जो तीन सौ के लगभग इज़ाफ़ा होने की बात है, कहाँ तक न्यायोचित होगा। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि वर्ष 2026-27 का लगभग 57 लाख करोड़ का बजट बिना पूरी बहस के ही पारित हो गया । लोकसभा महिला आरक्षण कानून तो बन चुका है केवल लागू नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री जी का कहना है विपक्ष इसमें अड़ंगा लगा रहा है। आरक्षण तो सरकार तुरंत कर सकती है ।लोकसभा में जितनी सीटें हैं उसी में उनका भी आरक्षण किया जाय जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण है। इसके लिए अतिरिक सीटों की क्या आवश्यकता है। जब संविधान सभा का गठन हुआ था तब इसमें 389 सदस्य चुने गए थे । बाद में जब पाकिस्तान बन गया था तो 299 सदस्य रह गए थे। 1952 में 489 सदस्य थे जो धीरे धीरे 1975 में 42 वें संशोधन के बाद 543 हो गए जो आज तक हैं । सांसदों की इतनी बड़ी संख्या होने पर सरकार के ऊपर अतिरिक्त खर्च भी बढ़ेगा । उनके लिए दिल्ली में आवास, वेतन, यातायात , चिकित्सा आदि पर एक भारी बोझ सरकार के कंधों पर पड़ेगा। घाटे के बजट पर चलने वाली सरकार को एक अच्छा खासा आर्थिक बोझ उठान पड़ेगा। जबकि एक सर्वे में यह पाया गया है कि औसतन एक सांसद अपने पूरे कार्यकाल में लगभग पंद्रह मिनट ही सदन में बोल पाता है। लोक तांत्रिक प्रणाली पर चलने वाले किसी भी देश की सरकार ने अपने निचले सदन में इतनी बड़ी संख्या में कभी भी इज़ाफ़ा नहीं किया है। यूनाइटेड किंगडम में 1721 से प्रधानमंत्री पद का गठन हुआ और उस समय हाउस ऑफ़ कॉमन्स में 558 सदस्य थे जो आज लगभग तीन सौ सालों में उनकी संख्या 650 हुई है। 1789 में संयुक्त राज्य अमेरिका में लोकतंत्र की स्थापना हुई ।read more:https://worldtrustednews.in/illegal-diagnostic-centres-are-spreading-like-a-spider-web-in-nighasan/ उस समय अमेरिका में कुल ग्यारह राज्य थे और लोअर हाउस में 59 सदस्य थे । जैसे जैसे और राज्य अमेरिका में सम्मिलित होते गए लोवर हाउस के सदस्यों की संख्या बढ़ती गई और 1959 में पचास राज्य हो गए थे और सदस्यों की संख्या 435 हो गई थी । 1960 के जन गणना में अमेरिका ने सदस्यों की संख्या 437 कर दी थी लेकिन 1963 में उन्होंने सदस्यों की संख्या 435 फिर कर दी मतलब की 435 के ऊपर लोअर हाउस की संख्या नहीं बढ़ेगी। इसी प्रकार फ़्रांस में 1848 में लोअर हाउस में सदस्यों की संख्या 459 थी जो अब लगभग पौने दो सौ वर्षों में बढ़कर 577 हुई । पहले फ़्रांस में वोट देने का अधिकार केवल पुरुषों को था 21 अप्रैल 1944 को यह ऐतिहासिक फ़ैसला फ़्रांस की सरकार ने जनरल चार्ल्स डी गाल के नेतृत्व में किया। पहली बार फ्रांस की महिलाओं ने 29 अप्रैल 1945 में नगर पालिका के चुनावों में वोट डालने का गौरव प्राप्त किया। भारत में यह अधिकार देश के प्रत्येक नागरिक को देश के संविधान बनने के प्रथम दिन से मिला है। सांसद का पद बहुत ही गरिमा मय है । जिस प्रकार से प्रधान मंत्री और प्रत्येक विभाग के एक केंद्रीय मंत्री होते हैं उसी प्रकार सांसद भी होते हैं क्युकी यह सरकार के कार्यों को बारीकी से जांच करते हैं । दूसरी समस्या ज़िला प्रशासन के समक्ष होगी। अभी तक सांसद ज़िला के विकास कार्यों की समीक्षा में बैठक की अध्यक्षता करता या करती हैं मगर जब संख्या बढ़ेगी तो समीक्षा बैठक करने में अध्यक्षता करने को लेकर विवाद होगा। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि जो भी सांसद लोक सभा और राज्य सभा में हैं उनके काम करने का समय बढ़ाया जाय सदन कम से कम पौने दो सौ दिन चले । सदन की संख्या बढ़ाना बिल्कुल उचित नहीं है।