ईरानी कबाब: 165 कलियों का दम

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा –‘डॉन अंकल’ की मेज़ पर आज दुनिया का सबसे ताज़ा और ‘ऑर्गेनिक’ मेन्यू परोसा गया है। इस बार डिश का नाम है— “ईरानी कबाब: 165 कलियों का दम।”अंकल बड़े सलीके वाले आदमी हैं। वे जब काँटा और छुरी हाथ में लेते हैं, तो उनके सफ़ेद कॉलर पर खून का एक भी धब्बा नहीं पड़ता, क्योंकि उन्होंने मानवाधिकारों का एक ऐसा ‘डिटर्जेंट’ ईजाद किया है जो लाल रंग को भी ‘फ्रीडम ब्लू’ में बदल देता है। अंकल का किचन सीधे व्हाइट हाउस की चिमनी से जुड़ा है, जहाँ से निकलने वाला धुआं ईरान की गलियों में लोरी बनकर नहीं, बल्कि मौत की सिसकारी बनकर उतरता है।’डॉन अंकल’ की मोहब्बत भी बड़ी निराली और कातिलाना है। वे पहले पाबंदियों की ज़हरीली ज़ंजीरों से बच्चों के दूध और दवाइयों के डिब्बे सील करते हैं, और जब कुपोषण या मिसाइल के छर्रों से कोई नन्हा फेफड़ा फूलना बंद कर देता है, तो वे बड़े ‘अफ़सोस’ के साथ अपनी डायरी में नया टारगेट लिखते हुए बुदबुदाते हैं—”मिशन अकंप्लिश्ड: लोकतंत्र की एक और पवित्र जीत!” यह कत्लखाना बड़ा नफीस है साहब, यहाँ कसाई के हाथ में कोई मामूली खंजर नहीं, बल्कि ‘शांति पुरस्कार’ की चमचमाती ट्रॉली होती है। वे मासूमों की छोटी-छोटी लाशों को सीढ़ी बनाकर सत्ता के शिखर पर चढ़ते हैं और ऊपर पहुँचकर ‘लिबर्टी’ की वह मशाल जलाते हैं जिसकी आग में पूर्व की सभ्यताएं भस्म होती आई हैं। उन्हें फूलों को मसलकर अपना खास ‘इम्पीरियल इत्र’ बनाने का पुराना शौक़ है, और इस बार ईरान की मज़लूम मिट्टी ने उन्हें वह लाल इत्र भरपूर मात्रा में मुहैया कराया है। सच तो यह है कि अंकल अकेले आदमखोर नहीं हैं, असली आदमखोर तो हम हैं जो इस खूनी सर्कस की अगली कतार में बैठकर ‘मानवीय मूल्यों’ की तालियां बजा रहे हैं। अंकल को पूरा भरोसा है कि दुनिया की तथाकथित अदालत उनकी जेब में पड़े सिक्कों की खनक पर वफ़ादारी से नाचती है। वे जानते हैं कि जब 165 नन्हे कफ़न ईरान की कोख में दफन किए जा रहे होंगे, तब दुनिया के बड़े अखबारों के दफ्तरों में ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ पर कोई भारी-भरकम और उबाऊ सेमिनार चल रहा होगा।अंकल का लोकतंत्र दरअसल उस सेल्समैन की तरह है जो श्मशान के बाहर खड़े होकर ‘लंबी उम्र’ का बीमा बेचता है। उन्हें पता है कि जब तक पूर्व में मातम का शोर रहेगा, पश्चिम के बारूद के कारखानों में दिवाली मनेगी। इन 165 बच्चियों की मौत पर अंकल ने जो शोक-संदेश जारी किया है, उसे पढ़कर यमराज भी अपनी नौकरी छोड़ने की सोच रहे होंगे कि इतना ‘परफेक्शन’ भला कोई इंसान कैसे ला सकता है? अंकल पहले आग लगाते हैं, फिर फायर ब्रिगेड का ठेका भी खुद ही लेते हैं और अंत में धुएँ की सड़ांध को ‘आज़ादी की खुशबू’ कहकर डकार मार जाते हैं। दुनिया का कानून भी अंकल की गोदी में बैठा वह पालतू कुत्ता है, जो सिर्फ उन पर भौंकता है जिन्हें अंकल ‘हड्डी’ नहीं डालना चाहते। गजब का सर्कस है, जहाँ शेर मर रहे हैं और रिंग मास्टर अपनी वाइन का गिलास घुमाते हुए ‘अहिंसा’ पर स्पीच दे रहा है।आखिरी बात ये कि अंकल की सफेद कमीज पर लगे ये लाल धब्बे कोई एक्सीडेंट नहीं, बल्कि उनका लेटेस्ट ‘फैशन स्टेटमेंट’ हैं। जब इन मासूमों की रूहें स्वर्ग के गेट पर अंकल का ‘वीजा’ चेक करेंगी, तब अंकल वहां भी मानवाधिकारों का कोई ऐसा क्लॉज निकाल लेंगे जिससे नर्क को भी ‘डेमोक्रेटिक हेवन’ घोषित कर दिया जाए। मंटो आज होते तो अपनी जेब से रुमाल नहीं, बल्कि एक बड़ा आईना निकालते और अंकल के सामने रखकर कहते— “हुजूर, अपनी शक्ल मत देखिये, ये देखिये कि आपके पैरों के नीचे जो ईरान की चप्पलें दबी हैं, उनकी बदबू आपके महंगे परफ्यूम से ज्यादा तेज है।” असल में हम सब उस खूनी तमाशे के टिकट होल्डर हैं, जहाँ अंकल कसाई बनकर ‘ईसा मसीह’ जैसा दिखना चाहते हैं और हम ‘ग्रेटर गुड’ के नाम पर अपनी अक्ल को गिरवी रखकर तालियां पीट रहे हैं।

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