भारतीय मछुआरे के लिए बड़ा संकट, तटों पर ठहर गईं नौकाएं, अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा बड़ा असर

नई दिल्ली।ईरान में जारी युद्ध के वैश्विक प्रभाव अब भारतीय तटों तक पहुँच चुके हैं, जिससे देश का मत्स्य पालन क्षेत्र गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। युद्ध के कारण ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने से न केवल ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आया है, बल्कि रसोई गैस (एलपीजी) की भारी किल्लत ने मछुआरों के सामने आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है। विशेष रूप से महाराष्ट्र और गोवा के मछुआरे इस स्थिति की सबसे बड़ी मार झेल रहे हैं, जहाँ सैकड़ों नौकाएं समुद्र किनारे खड़ी रहने को मजबूर हैं। ईंधन और गैस की इस कमी ने मछुआरों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह प्रभावित किया है। एलपीजी सिलिंडर की किल्लत इतनी बढ़ गई है कि काले बाजार में एक सिलिंडर की कीमत 10,000 रुपये तक पहुँच गई है। गहरी समुद्री यात्राओं पर जाने वाले मछुआरों के लिए नावों पर खाना बनाना एक चुनौती बन गया है। जहाँ छोटी नावों को 4-5 दिनों के सफर के लिए एक सिलिंडर चाहिए होता है, वहीं बड़ी नावों पर 30 से 40 लोग सवार होते हैं जिन्हें 15 दिनों की यात्रा के लिए कम से कम 3 से 4 सिलिंडर की आवश्यकता होती है।read more:https://khabarentertainment.in/the-wedding-party-and-the-grooms-side-clashed-when-the-dj-stopped-working/ इस अभाव के कारण कई मछुआरे अब पुराने स्टोव के भरोसे हैं या अपनी समुद्री यात्राओं की अवधि कम कर रहे हैं। डीजल की कीमतों में हुई बेतहाशा वृद्धि ने इस समस्या को और विकराल बना दिया है। मुंबई के कोली समुदाय के अनुसार, एक बड़ी नाव 15 दिनों में लगभग 2000 से 3000 लीटर डीजल की खपत करती है। पहले जो बल्क डीजल 70 से 80 रुपये प्रति लीटर मिलता था, उसकी कीमत अब 122 रुपये से लेकर 138 रुपये प्रति लीटर तक पहुँच गई है। तेल विपणन कंपनियों द्वारा बल्क डीजल के दामों में हालिया बढ़ोतरी ने सब्सिडी के बावजूद मछुआरों की कमर तोड़ दी है।यह संकट केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। मत्स्य पालन क्षेत्र तटीय राज्यों की जीडीपी में लगभग 2.5 प्रतिशत का योगदान देता है। आंकड़ों के अनुसार, गोवा में मत्स्य पालन से होने वाली कमाई करोड़ों में है और यहाँ की मछलियां अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात की जाती हैं। वहीं महाराष्ट्र में इस क्षेत्र से करीब 3.65 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। यदि स्थिति अगले कुछ दिनों तक ऐसी ही बनी रही, तो दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा नकारात्मक असर पड़ना तय है। मछुआरों का कहना है कि यदि लागत कम नहीं हुई, तो उन्हें मजबूरन अपना काम पूरी तरह बंद करना पड़ेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *